बॉलीवुड के दिग्गजों के लिए यही समय है हिन्दुत्व का दामन पकड़ने का!

जनता ही सर्वशक्तिशाली है!

बॉलीवुड हिन्दुत्व: पता है “द केरल स्टोरी” और “द कश्मीर फाइल्स” में क्या बात समान है? दोनों ही फिल्में वामपंथियों द्वारा लताड़ी गई, दोनों ही फिल्मों को प्रतिबंधित करने के प्रयास किये गए, और दोनों ही फिल्में अपेक्षा के विपरीत बॉक्स ऑफिस पर गर्दा उड़ा दिए।

सशक्त विषय, दमदार अभिनय का बेजोड़ फार्मूला

परंतु आपको पता है कि इन दोनों फिल्मों में एक और बात समान है, जो भारतीय सिनेमा, विशेषकर बॉलीवुड को विशेष रूप से ध्यान में रखना चाहिए। दोनों ही फिल्में विशुद्ध रूप से हिन्दू समर्थक थी, और दोनों ही फिल्मों में कोई बड़े स्टार नहीं थे। सच बताइए, दर्शन कुमार या अदा शर्मा ने इससे पूर्व कितने फिल्मों में बतौर प्रमुख अभिनेता काम किया था? अगर कोई स्टार था, तो केवल कॉन्टेन्ट। इसके बाद भी दोनों फिल्मों ने अपने मूल बजट का पाँच गुना से भी अधिक बॉक्स ऑफिस पर कमाया है।

उदाहरण के लिए द कश्मीर फाइल्स की स्थिति देखिए। लाख कठिनाइयों के बाद बनी इस फिल्म को पर्याप्त स्क्रीन भी नहीं मिल रहे थे। इस फिल्म को देखके कौन कहता कि ये मात्र 15 करोड़ के बजट में बनी है? इसके ऊपर इस फिल्म के सामने प्रभास की फिल्म “राधे श्याम” प्रदर्शन को तैयार थी, और “द कश्मीर फाइल्स” को मात्र कुछ 400 स्क्रीन मिले।

परंतु 11 मार्च को क्रांति आ गई। जिस “द कश्मीर फाइल्स” को डिस्ट्रीब्यूटर स्क्रीन देने को तैयार नहीं थे, उसने ऐसा प्रभाव डाला कि एक के बाद एक कई दर्शक इस फिल्म को देखने के लिए टूट पड़े। प्रथम हफ्ता खत्म होते होते ये फिल्म अपने बजट से छह गुना से भी अधिक, 97 करोड़ रुपये कमा चुकी थी, वो भी बॉलीवुड बॉक्स ऑफिस पर। अब द केरल स्टोरी ने वही राह पकड़ते हुए दो हफ्ते से भी कम अंतराल में लगभग 150 करोड़ रुपये का कीर्तिमान प्राप्त किया है।

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क्या बड़े स्टार से कोई अंतर पड़ेगा?

अब प्रश्न ये उठता है, क्या किसी बड़े स्टार के ऐसी फिल्मों में होने से कोई अंतर पड़ता? हो भी सकता है, और नहीं भी। “सम्राट पृथ्वीराज” जैसी स्क्रिप्ट और सेटअप हो, तो फिर ये प्रश्न शायद हास्यास्पद लगे, परंतु अगर स्क्रिप्ट चौकस हो, और ये सीमित संसाधन में भी भीमकाय कलेक्शन प्रदान कर सके, तो क्यों नहीं?

“उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक” को देख लीजिए। जिस प्रकार से उरी के हमले और उसके बाद के प्रत्युत्तर को चित्रित किया गया, उसे देखकर कौन कहेगा कि ये फिल्म मात्र 25 करोड़ में बनी थी। चलिए, नाथुराम गोडसे, डायरेक्ट एक्शन डे जैसे विषयों का चित्रण इत्यादि कुछ लोगों के लिए विवादित हो सकता है। परंतु मराठा गौरव या भारतीय क्रांतिकारियों का चित्रण तो विवादास्पद नहीं होगा न। सुनने में आ रहा था कि अजय देवगन और नीरज पांडे ने “चाणक्य” के लिए लगभग सभी तैयारियां प्रशस्त कर ली थी। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, इस प्रोजेक्ट को उसका मूर्त रूप देकर असंभव भी संभव हो सकता है। कल्पना कीजिए, अजय देवगन, आचार्य चाणक्य के वेशभूषा में वो अखंड प्रतिज्ञा ऑन स्क्रीन लें! विश्वास मानिए, बाहुबली का रिकॉर्ड भी पीछे छूट जाएगा।

यही बात अजय देवगन ने सिद्ध भी की है, “तान्हाजी : द अनसंग वॉरियर”। ऐसी बॉलीवुड फिल्में 200 करोड़ से कम में नहीं बनते। परंतु 125 करोड़ में अजय देवगन ने एक ऐसा संसार रचा, कि कोई भी एजेंडावादी सूबेदार तानाजी मालुसारे और उनके मराठा मावड़ों की राह न रोक पाए, दीपिका पादुकोण की फेमिनिस्ट “छपाक” भी नहीं! तो बाकियों को क्या रोक रहा है भाई?

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सबसे बड़ा रुपैया का सदुपयोग

ऐसा भी नहीं है कि विषय भी नहीं है। उदाहरण के लिए आप दुर्गा भाभी पर एक दमदार प्रोजेक्ट बनाइये, जिसमें एजेंडावाद की बू तक न हो, और कियारा आडवाणी या यामी गौतम जैसी नायिका मुख्य भूमिका में हो। ऐसे ही सनी देओल जैसे एक्टर से तनिक महाराणा प्रताप जैसे रोल करवाके देखिए, जिसमें स्क्रिप्ट में किसी प्रकार की कमी न हो। बाहुबली के रिकॉर्ड तक छोटे पड़ने लगेंगे, ट्राई तो करके देखिए।

परंतु बॉलीवुड के प्रोड्यूसर ऐसा नहीं करेंगे। ये ख्याल ही अपने आप में हास्यास्पद है, क्योंकि घूम फिरके सभी प्रोड्यूसर का एक ही उद्देश्य है, “बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया”। “द कश्मीर फाइल्स” और अब “द केरल स्टोरी” ने सिद्ध भी किया है कि आपका उद्देश्य नेक हो, तो आपकी फिल्म को सफल होने से जॉर्ज सोरोस भी नहीं रोक सकता। बस, एक सशक्त प्रयास की देरी है।

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