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कौन रच रहा है भारतीय ट्रेन के साथ साजिश? क्या शुरू हो गया है रेल जिहाद ?

कैसे निपटेगी सरकार ?

TFI Desk द्वारा TFI Desk
23 September 2024
in चर्चित, चर्चित
कौन रच रहा है भारतीय ट्रेन के साथ साजिश? क्या शुरू हो गया है रेल जिहाद ?
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आपने जिहाद से जुड़े कई नाम सुने होंगे। खासकर लैंड जिहाद, लव जिहाद, यहां तक कि फूड जिहाद और बाढ़ जिहाद भी, लेकिन अब इस शब्दकोश में एक नया शब्द जुड़ गया है, रेल जिहाद। दरअसल, बीते कुछ दिनों से भारतीय रेल के साथ साज़िश रचे जाने के सबूत मिल रहे हैं। कुछ तत्व ट्रेनों को पटरी से उतारने और जान-माल का नुकसान पहुंचाने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं।

भारत में रेलवे आज से नहीं बल्कि आजादी के वक्त से ही लोगों के गुस्से, प्रदर्शन और प्रतिरोध का आसान शिकार रही है। जॉर्ज फर्नांडीज की रेल हड़ताल रही हो, या फिर किसान आंदोलन से लेकर आरक्षण आंदोलन, रेल की पटरियां हमेशा से आंदोलनकारियों की पसंदीदा जगह रही हैं। दरअसल, इसकी वजह भी है और ये वजह है रेलवे की अहमियत। रेलवे भारत की लाइफ लाइन है। भारत में करीब 1.25 लाख किलोमीटर लंबे रेलवे ट्रैक हैं, जो मिलकर करीब 66 हजार किलोमीटर का रेल नेटवर्क तैयार करते हैं।

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यही नहीं भारतीय ट्रेनें रोजाना करीब 2.5 करोड़ लोगों को सफर पर लेकर निकलती हैं। यानी, जितनी ऑस्ट्रेलिया की कुल आबादी है, उससे ज्यादा लोग तो हमारे यहां रोजाना ट्रेन के अंदर होते हैं। इसीलिए, रेलवे सरकार की भी कमजोर नस है और हर कोई इसे दबा कर सरकार को झुकाना चाहता है, अपनी मांगें मनवाना चाहता है। लेकिन, अब बात इससे कहीं आगे निकल चुकी है, क्योंकि अब बात धरने-प्रदर्शन या हड़तालों से कहीं आगे ट्रेनों को पटरी से उतारने की साजिश रचने तक पहुंच चुकी है।

बीते कुछ हफ्तों से शायद ही ऐसा कोई दिन हुआ हो, जब कहीं न कहीं ट्रैक पर पत्थर, बोल्डर, लोहे के गर्डर, सरिया या सीमेंट ब्लॉक रखकर ट्रेन को पटरी से उतारने की कोशिश न की गई हो। कानपुर में तो बाकायदा गैस सिलेंडर, पेट्रोल और बारूद रखा गया था, ताकि ट्रेन पटरी से ही न उतरे, आग लग जाए और ज्यादा से ज्यादा नुकसान हो। हालांकि, यात्रियों की क़िस्मत से ऐसा नहीं हुआ और लोको पायलट ने समय रहते ट्रेन को रोक दिया।

जाहिर सी बात है, अगर सौ-डेढ़ सौ किलोमीटर की रफ्तार से गुजर रही ट्रेन बेपटरी होगी, तो कैसी तबाही मचेगी? आप सोच कर ही सिहर जाएंगे। यही नहीं, ट्रेन पलटाई जा सकें, इसके लिए बकायदा फिश प्लेट खोली जा रही हैं, सिग्नल जाम किया जा रहा है। कुल मिलाकर भारतीय रेलवे के खिलाफ एक तरह का युद्ध छेड़ दिया गया है। रविवार (22 सितंबर, 2024) को मध्य प्रदेश के खंडवा में जो हुआ, वो इसका जीता जागता उदाहरण है। वहां आर्मी स्पेशल ट्रेन गुजरने से पहले ट्रैक पर डेटोनेटर लगे मिले। इस ट्रेन में आर्मी के ऑफिसर्स और जवानों के साथ गोला बारूद और असलहा भी लदा हुआ था। वो तो किस्मत अच्छी थी कि कुछ डेटोनेटर समय से पहले ही फट गए और ट्रेन को कुछ मीटर पहले ही रोक दिया गया।

वैसे तो ये डेटोनेटर रेलवे के ही थे, लेकिन रेलवे का कहना है कि ये उसने लगाए नहीं थे, तो फिर ये किसने लगाए? क्या डेटोनेटर लगाने वालों को पता था कि यहां से आर्मी स्पेशल ट्रेन गुजरने वाली है? बात सिर्फ इतनी ही नहीं, पंजाब के बठिंडा में तो बाकायदा सरियों का पूरा बंडल ही ट्रैक पर रख दिया गया, वो तो भला हो लोको पायलट का, जिसने एमरजेंसी ब्रेक लगाकर ट्रेन को कुछ फीट की दूरी पर रोक लिया।

ये घटनाएं लोकोपायलट की सावधानी से टाल दी गईं। लेकिन, सोचिए अगर यही रात का वक्त होता और ट्रेन पूरी रफ्तार से दौड़ रही होती, तो क्या होता? आखिर ये घटनाएं अचानक से क्यों बढ़ गई हैं। और, जितने भी लोग रेलवे ट्रैक पर पत्थर, बोल्डर, फिशप्लेट, मोटरसाइकल या सिलेंडर रखते हुए पकड़े गए हैं, वो सब एक वर्ग विशेष के ही क्यों हैं? कई वीडियो तो ऐसे भी सामने आए हैं, जिसमें छोटे छोटे बच्चे औजारों की मदद से फिशप्लेट और पटरियों के नटबोल्ट खोलते नजर आ रहे हैं। आखिर ये सब उनसे कौन करवा रहा है? उनके घर वाले, – बड़े बुजुर्ग क्यों नहीं समझा रहे हैं कि बेटा इन सबसे मजहब का कोई भला नहीं होगा, इससे सिर्फ लोगों की जानें जाएंगी, और हर वर्ग, हर मजहब के लोगों का नुकसान होगा।

इससे भी ज्यादा चिंतित करने वाली बात ये भी है कि इन तमाम घटनाओं का एक पाकिस्तानी और आतंकी कनेक्शन भी है। कुछ दिन पहले की ही बात है, जब देश में एक ट्रेन हादसा होने के बाद पाकिस्तान में मौजूद एक आतंकी फरहतुल्लाह गोरी का वीडियो सामने आया था। टेलीग्राम के जरिए भेजे गए इस वीडियो में गोरी भारत में रहने वाले मुसलमानों से ट्रेनों को पलटाने की अपील कर रहा था, वो उनसे भारतीय सप्लाई लाइन पर हमला करने, रेलवे ट्रैक से छेड़छाड़ करने, ऑयल डिपो और दूसरे अहम सिविल ठिकानों पर हमला करने को उकसा रहा था। हैरानी की बात ये है कि अचानक से ऐसा होने भी लगा। रेलवे ट्रैक पर कुछ न कुछ मिलने की कम से कम 50 से ज्यादा ऐसी घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं, जबकि आधा दर्जन से ज्यादा ट्रेन डिरेलमेंट की घटनाएं भी हुई हैं। हालांकि ज्यादातर हादसे मालगाड़ियों के साथ हुए, इसलिए इंसानी जिंदगी का खास नुकसान नहीं हुआ।

लेकिन ये खतरे की घंटी है, क्योंकि भारत में सवा लाख किलोमीटर लंबे रेलवे ट्रैक की निगरानी करना लगभग असंभव सा काम है। ये ट्रैक गांव, देहातों, से लेकर जंगलों, पहाड़ों, निर्जन इलाकों से लेकर घनी बस्तियों के बीच से भी निकलते हैं। ऐसे में कौन सिरफिरा आतंकी क्या कर देगा, किसी को नहीं पता। आखिर रफ्तार से दौड़ रही ट्रेन को पटरी से उतारने के लिए सिर्फ एक ‘बोल्ट’ को ढीला करने या खोलने भर की ही जरूरत है, इसमें न तो बड़ी प्लानिंग की जरूरत है, और न ही गोला बारूद और ज्यादा पैसों की। शायद इसीलिए रेलवे भारत के दुश्मनों के निशाने पर है, क्योंकि वो सबसे आसान निशाना है।

लेकिन, सवाल ये भी है कि हमारी एजेंसियां क्या कर रही हैं। क्या ट्रेनों में चलने में करोड़ों लोग भगवान या यूं कहें कि इन आतंकियों के रहमो-करम पर ही सफर नहीं कर रहे हैं। रेलवे के साथ होने वाली ये घटनाएं ये भी बताती हैं कि देश में एक दो नहीं सैकड़ों, हजारों ऐसे मजहबी और कट्टर आतंकी पैदा हो चुके हैं, जो किसी गोरी, गजनवी या अपने किसी आइडल आतंकी के उकसाने-भड़काने पर ऐसे कामों को करने के लिए तैयार बैठे हैं। जिनके लिए फिशप्लेट खोलना देश विरोधी नहीं बल्कि धर्म-पुण्य का काम है। आज ये रेलवे को निशाना बना रहे हैं, कल को जिहादी तत्व सड़क पर चल रहे वाहनों को निशाना बनाया जाएगा। जल स्त्रोतों को कंटेमिनेटेड किया जाएगा, तब इन जिहादी तत्वों से कैसे निपटा जाएगा? क्योंकि 140 करोड़ के इस देश में न तो हर किसी पर नजर रखी जा सकती है और न ही सुरक्षा दी जा सकती है।

स्थितियां ही नहीं, ये सुरक्षा से जुड़े ये सवाल भी बहुत गंभीर है, लेकिन जवाब किसी के पास भी नहीं है।

Tags: #खतरा#भारतीयरेलवे#राजनीतिकविवाद#रेलजिहाद#रेलवे_सुरक्षाअवमाननाआतंकवादकट्टरवादजागरूकताप्रदर्शनभारतमीडियासमाजसंविधानसुरक्षा
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