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संत दादू दयाल: एकात्म मानववाद और भक्ति आंदोलन के महान उन्नायक और समाज सुधारक

अपनी वाणी से समाज में वैराग्य, समरसता और सच्ची ईश्वर भक्ति का संदेश देने वाले संत

himanshumishra द्वारा himanshumishra
28 February 2025
in इतिहास
भक्ति आंदोलन के उन्नायक सन्त दादू

भक्ति आंदोलन के उन्नायक सन्त दादू

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भारत सदा से संतों और महापुरुषों की तपोभूमि रही है, जहाँ धर्म और संस्कृति को बचाने के लिए संतों ने अपने उपदेशों और भक्ति से समाज को सही दिशा दी। ऐसे ही एक महान संत थे संत दादू दयाल। संत दादू ने न केवल भक्ति आंदोलन के प्रमुख उन्नायक थे, बल्कि उन्होंने हिंदू समाज को आडंबर, पाखंड और जातिगत भेदभाव से मुक्त करने का संकल्प लिया। उनकी वाणी ने समाज में वैराग्य, समरसता और सच्ची ईश्वर भक्ति का संदेश फैलाया। उन्होंने हिंदू धर्म की उस शाश्वत परंपरा को आगे बढ़ाया, जहाँ केवल भक्ति, साधना और आत्मशुद्धि ही मोक्ष का मार्ग है। उनका जीवन राष्ट्र, धर्म और सनातन संस्कृति के पुनरुत्थान का प्रतीक है, जो आज भी हर भक्त के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।

संत दादू दयाल
संत दादू दयाल

शुरुआती जीवन: करुणा, भक्ति और संतत्व की ओर यात्रा

संत दादू दयाल का जन्म 28 फरवरी, 1601 ई. (फाल्गुन पूर्णिमा) को गुजरात प्रांत के कर्णावती (अहमदाबाद) में हुआ था। लेकिन किसी अज्ञात कारण से उनकी माता ने नवजात शिशु को एक लकड़ी की पेटी में रखकर साबरमती नदी में प्रवाहित कर दिया।

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संयोगवश, एक ब्राह्मण लोदीराम नागर की नजर उस बहती हुई पेटी पर पड़ी। जब उन्होंने उसे खोला, तो अंदर एक तेजस्वी बालक को देखकर दंग रह गए। इस बालक में अन्य बच्चों जैसी चंचलता की जगह दया, करुणा और भक्ति का भाव सहज ही झलकता था। इन्हीं गुणों के कारण लोग उन्हें “दादू दयाल” कहने लगे।

युवावस्था में उनका विवाह हुआ, जिससे उनके घर दो पुत्र और दो पुत्रियों का जन्म हुआ। लेकिन सांसारिक बंधनों में उनका मन ज्यादा देर तक नहीं लगा। वे धीरे-धीरे गृहस्थ जीवन से विरक्त होने लगे और जयपुर के निकट एकांत में भजन-साधना और सत्संग में समय बिताने लगे। हालांकि, परिवार उन्हें वापस बुला ले गया, जिसके बाद उन्होंने जीविका के लिए रुई धुनने का कार्य शुरू किया।

उनकी भक्ति और साधना से लोग प्रभावित होने लगे और धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। उनके अनुयायियों में न केवल हिंदू, बल्कि कई मुस्लिम भी शामिल हो गए। यह देखकर एक काजी ने उन्हें सजा देने का प्रयास किया, लेकिन कुछ समय बाद काजी की ही मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद लोग उन्हें एक दिव्य पुरुष मानने लगे और उनके प्रति श्रद्धा और सम्मान और भी बढ़ गया।

दादू पंथ

संत दादू दयाल ने धर्म में व्याप्त पाखंड और आडंबर का डटकर विरोध किया। वे कबीर की तरह पंडितों और मौलवियों की खोखली रूढ़ियों को चुनौती देते थे और लोगों को सच्चे धर्म की राह दिखाते थे। उनका मानना था कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए साधारण जीवन ही पर्याप्त है—इसके लिए न तो मौलवी बनने की आवश्यकता है और ना ही परिवार त्यागने की। उन्होंने सदैव निर्गुण भक्ति को अपनाने और सच्चे सद्गुणों को जीवन में उतारने पर जोर दिया।

उनके विचार इतने प्रभावशाली थे कि उनके अनुयायियों ने इसे “दादू पंथ” के रूप में संगठित कर लिया। उनके मुस्लिम अनुयायियों को “नागी” कहा जाता था, जबकि हिंदू अनुयायी चार भागों में विभाजित थे—वैष्णव, विरक्त, नागा और साधु। दादू की शिक्षाएँ “वाणी” के रूप में जानी जाती हैं, जिसमें भक्ति और समाज सुधार का गूढ़ ज्ञान समाहित है। वे कहते थे—

“दादू कोई दौड़े द्वारका, कोई कासी जाहि,
कोई मथुरा को चले, साहिब घर ही माहि।।”

वे कर्मकांड और बाहरी दिखावे की जगह सच्चे ईश्वर की भक्ति को अधिक महत्वपूर्ण मानते थे। साथ ही, जीव हिंसा के वे घोर विरोधी थे। उनके दोहे में इस विचार को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है—

“कोई काहू जीव की, करै आतमा घात,
साँच कहूँ संसा नहीं, सो प्राणी दोजख जात।।”

संत दादू दयाल कबीर, नानक और तुलसीदास जैसे महान संतों के समकालीन थे। जयपुर से लगभग 61 किलोमीटर दूर स्थित “नरेना” उनकी साधना स्थली रही, जिसे आज उनके पंथ का प्रमुख तीर्थ माना जाता है। यहाँ एक संग्रहालय भी है, जहाँ उनकी ऐतिहासिक धरोहर को संजोकर रखा गया है। इस संग्रहालय में गरीबदास जी की वाणी, अन्य संतों के हस्तलिखित ग्रंथ, सुंदर चित्रकारी, नक्काशी, रथ, पालकी, हाथियों के हौदे और स्वयं संत दादू की खड़ाऊँ सुरक्षित हैं।

फाल्गुन पूर्णिमा पर यहाँ विशाल उत्सव आयोजित किया जाता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु बिना किसी जाति, वर्ग या भेदभाव के एक ही पंगत में बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह आयोजन केवल एक धार्मिक समागम नहीं बल्कि समरसता और सामाजिक समता का जीवंत प्रमाण है।

निर्गुण भक्ति के मार्गदर्शक, समाज सुधारक और महान संत दादू दयाल ने अपने जीवन के साठ वर्ष समाज को प्रेम, भक्ति और एकता का संदेश देने में बिता दिए और 1660 ईस्वी में इस संसार को त्यागकर परमधाम को प्रस्थान कर गए। लेकिन उनकी शिक्षाएँ आज भी जीवित हैं, जो भक्ति आंदोलन को शक्ति प्रदान कर रही हैं और भारतीय आध्यात्म को अपने तेज से आलोकित कर रही हैं।

स्रोत: संत दादू,संत दादू दयाल, संत दादू के प्रवचन, दादू वाणी, भक्ति भक्ति आंदोलन के उन्नायक, भक्ति आंदोलन, Sant Dadu, Sant Dadu Dayal, Sant Dadu's Discourses, Dadu Vani, Pioneer of the Bhakti Movement, Bhakti Movement
Tags: Bhakti MovementDadu VaniPioneer of the Bhakti MovementSant DaduSant Dadu DayalSant Dadu's Discoursesदादू वाणीभक्ति आंदोलनभक्ति भक्ति आंदोलन के उन्नायकसंत दादूसंत दादू के प्रवचनसंत दादू दयाल
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