नित्य, सनातन एवं शुभता की सारगर्भित चेतना हैं भगवान शिव; समझिए शिवरात्रि और महाशिवरात्रि का अंतर

सनातन परंपरा में यह स्वीकार किया जाता है कि रात्रि सृजनधर्मा होती है अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति के समय घना अंधकार ही था

महाशिवरात्रि सनातन संस्कृति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिवस है। शिवरात्रि और महाशिवरात्रि में अंतर होता है शिवरात्रि प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है जबकि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाने वाली शिवरात्रि को ही महाशिवरात्रि कहा जाता है। यह पर्व भगवान शिव के भक्तों की अटूट श्रद्धा एवं विश्वास का प्रतीक है। सनातन परंपरा में यह स्वीकार किया जाता है कि रात्रि सृजनधर्मा होती है अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति के समय घना अंधकार ही था। ऋग्वेद के दसवें मंडल में वर्णित नासदीय सूक्त (नासदीय सूक्त को वेदों का ब्रह्मांड विज्ञान भी कहा जाता है)  में सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन इसी रूप में प्राप्त होता है।

तम् आसीत्तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदं।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकं॥३॥(नासदीय सूक्त, ऋग्वेद)

अर्थात् प्रलय के समय सर्वत्र अंधकार ही था तथा जगत तमस रूप मूल कारण में विद्यमान था। यह संपूर्ण जगत सलिल अर्थात् परम कारण द्वारा ‘लीला’ के माध्यम से रचा गया था। उस समय कारण और कार्य दोनों मिले हुए थे। कारण से कार्य एक रूप होकर यह जगत ईश्वर के संकल्प तथा तप की महिमा से उत्पन्न हुआ।

महाशिवरात्रि इस रूप में विशेष महत्व रखती है क्योंकि साधक इस घड़ी में त्रिगुणात्मक एवं त्रिगुणातीत शिव की साधना द्वारा आंतरिक नव सृजन प्रारंभ करता है। एक रूपक से समझने का प्रयास करें तो फाल्गुन संवत्सर का अंतिम मास है। फाल्गुन में फल्गु का अर्थ है- व्यर्थ या बेकार। इस प्रकार यह निर्दिष्ट करता है कि जो साधक पूरे वर्ष अपनी साधना के द्वारा इस जगत की नि:सारता को समझ लेता है तथा स्वयं के चित्त (मन, बुद्धि एवं अहंकार) का शिव में विलीन कर देता है, वही महाशिवरात्रि का वास्तविक अर्थ समझ सकता है। इस फाल्गुन मास के पूर्व का मास माघ है। अघ का अर्थ है- पाप एवं मा का अर्थ है- नहीं। इस प्रकार माघ मास निर्दिष्ट करता है कि जिसने अपने सभी पापों के लिए प्रायश्चित कर लिया हो एवं अब कोई पाप न करने का व्रत धारण किया हो वही फाल्गुन मास में प्रवेश का अधिकारी हो सकता है।

माघ मास में गंगा स्नान की सनातन परंपरा रही है। गंगा स्नान को लेकर एक सामान्य धारणा है कि गंगा स्नान करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। पूर्ण वर्णित संवत्सर के महीनों के रूपकों से देखें तो स्पष्ट होता है कि माघ महीने में गंगा स्नान करना एवं पाप से मुक्त होना इस रूप में है कि गंगा स्नान करते समय व्यक्ति अपने सभी पापों का प्रायश्चित करे एवं भविष्य में कभी पाप ने करने का दृढ़ व्रत ले। इस रूप में गंगा स्नान का महत्व अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। भारतीय सनातन परंपरा में पंचमहाभूतों को साक्षी मानकर दृढ़व्रत करने की परंपरा सदा से रही है। अग्नि, आकाश, जल, वायु एवं पृथ्वी को साक्षी मानकर अनेकों व्रत एवं धर्म संपन्न किए जाते रहे हैं। संभव है कि जिस प्रकार विवाह संस्कार के दौरान अग्नि को साक्षी मानकर उसके समक्ष पति – पत्नी अगले सात जन्मों तक एक दूसरे के सुख-दुख में सहभागी होते हुए सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने का संकल्प लेते हैं, ठीक उसी प्रकार गंगा जल में खड़े होकर पूर्व किए गए पापों का प्रायश्चित एवं भविष्य में पाप ने करने का संकल्प भी गंगा को साक्षी मानकर दृढ़ व्रत लेना हो सकता है। 

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाए जाने वाले महाशिवरात्रि के पूरे दिन भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना एवं अभिषेक किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान शिव की पूजा प्रदोष काल में चार पहर की जाती है। शिव महापुराण के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ था। इस पवित्र तिथि को भगवान शिव ने वैराग्य का जीवन त्याग कर देवी पार्वती के साथ विवाह बंधन में बधकर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था। शिव महापुराण के अनुसार महाशिवरात्रि पर ही भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे। स्कंद पुराण में वर्णित है कि महाशिवरात्रि के दिन शिव की आराधना, पूजन जागरण एवं उपवास से पुनर्जन्म से मुक्ति मिलती है तथा मोक्ष प्राप्त होता है।

ऐसी भी मान्यता है कि देवासुर संग्राम के पूर्व समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष से जब देवता एवं दैत्यों दोनों पक्षों में हाहाकार मच गया तो सबके आह्वान पर भगवान शिव ने हलाहल विष का पान किया और इससे उनका कंठ नीला पड़ गया, इस प्रकार शिव नीलकंठ कहलाए। कहा जाता है कि यह दिन महाशिवरात्रि का ही दिन था। गोस्वामी तुलसीदास जी इस प्रसंग को लेकर लिखते हैं-

जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय। 
तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस॥ (किष्किन्धाकाण्ड, रामचरित मानस)

इस प्रसंग में शिव मानो यह संदेश देते हैं कि यदि कोई परोपकार भाव से नि:स्वार्थ दूसरों के हिस्से का विष पीने को तैयार हो जाता है तो वह विष ही उसे मृत्युंजय बना देता है। सनातन परंपरा में शिव शुभता के केंद्र हैं। समस्त कल्याण का अधिष्ठान होने से उनको शिव कहा जाता है- ‘शिवम् कल्याणम् विद्यतेऽस्य शिव:’। शिव की आराधना करते हुए कहा गया है-

ईशान सर्वविद्यानाम् ईश्वर सर्व भूतानाम्।
ब्रह्मादीपते ब्रह्मनोदिपते ब्रह्मा शिवोमें अस्तु सदा शिवोम्।। (शिव नमस्काराथा मंत्र) 

अर्थात्  जो संपूर्ण विद्याओं के ईश्वर, समस्त भूत पदार्थों के अधीश्वर, ब्रह्मा के अधिपति, ब्रह्मतेज के प्रतिपालक तथा साक्षात परमात्मा हैं, वे सच्चिदानंद शिव मेरे लिए नित्य कल्याण स्वरूप बने रहें।

जीवन अपने अस्तित्व के साथ ही कल्याण की अपेक्षा रखता है तथा कल्याण की यही सनातन आकांक्षा शिवत्व की ओर उन्मुख करती है। सामाजिक रूप से देखें तो शिव अर्धनारीश्वर के रूप में भी प्रकट हैं, अर्थात् यह स्वरूप निर्दिष्ट करता है कि अस्तित्व में स्त्री एवं पुरुष का अपना-अपना महत्व है। यह सामाजिक समानता का अनुपम प्रतीक है। रघुवंशम् में महाकवि कालिदास कहते हैं-

वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ। रघुवंश (1.1)

शंकर में पार्वती और परमेश्वर इस प्रकार समाहित हैं जैसे कविता में शब्द और भाव दोनों। जिस प्रकार अकेले शब्द एवं भाव से कविता नहीं होती उसी प्रकार परम तत्व में स्त्री और पुरुष का अपना महत्व है। ईशा फाउंडेशन के स्वामी जग्गी वासुदेव के अनुसार ‘शि’ का अर्थ शक्ति है तथा शिव में शक्ति भगवती बनाकर समाहित है। उनके अनुसार शिव में शि का मूल अर्थ है शक्ति या ऊर्जा। भारतीय परंपरा में स्त्रीत्व सदैव से शक्ति एवं ऊर्जा का प्रतीक रहा है। ‘व’ का अर्थ है – प्रवीणता या अधिकार। यह प्रवीणता संतुलन को निर्दिष्ट करता है। ‘शि-व’ मंत्र के रूप में एक ऊर्जा है तथा दूसरा उसे संतुलित करता है। इस प्रकार शिव विशेष ऊर्जा का विशेष लक्ष्य की तरफ निर्दिष्टीकरण है।

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