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शताब्दी समारोह : मोहन भागवत ने दिखाई भारत की राह, गांधी-शास्त्री से हिंदू राष्ट्र तक

सरसंघचालक मोहन भागवत ने केवल परंपरा की बात नहीं की, बल्कि समकालीन वैश्विक और राष्ट्रीय चुनौतियों पर भी गहरी टिप्पणी की। उन्होंने पड़ोसी देशों नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका की ओर इशारा करते हुए जेन जी पर भी टिप्पणी की।

Vibhuti Ranjan द्वारा Vibhuti Ranjan
2 October 2025
in इतिहास, ज्ञान, धर्म, पर्यावरण, प्रीमियम, भारत, भू-राजनीति, रक्षा, राजनीति, विश्व, समीक्षा, संस्कृति
शताब्दी विजयादशमी : मोहन भागवत ने दिखाई भारत की राह, गांधी-शास्त्री से हिंदू राष्ट्र तक

मोहन भागवत ने कहा, मजबूत हिंदू समाज सुरक्षा की गारंटी है।

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2 अक्टूबर 2025, नागपुर, यह तिथि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि इतिहास और वर्तमान का संगम बन गई। इस दिन भारत ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती मनाई और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी शताब्दी विजयादशमी का भव्य आयोजन किया। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने अपने संबोधन की शुरुआत ही गांधी और शास्त्री को श्रद्धांजलि देकर की। उन्होंने कहा—“राष्ट्रपिता को याद करते हुए हमें संप्रदायवाद के खिलाफ समाज की रक्षा का स्मरण करना चाहिए। स्वतंत्रता की लड़ाई में गांधी जी का योगदान अविस्मरणीय है। स्वतंत्रता के बाद का जीवन कैसे चले, यह भी हमने उनसे सीखा है। हमारे उस समय के दार्शनिक नेता का योगदान कमाल का है। देश के लिए उन्होंने अपने प्राण भी दे दिए।”

यही नहीं, उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री को याद करते हुए “जय जवान, जय किसान” के नारे को आज के संदर्भ में और प्रासंगिक बताया। यह श्रद्धांजलि दिखाती है कि संघ का राष्ट्रवाद केवल संगठन तक सीमित नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता और विकास यात्रा की सम्पूर्ण धारा से जुड़ा है।

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समारोह की गरिमा को बढ़ाने के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थे। उनकी उपस्थिति एक प्रतीक थी, यह संदेश कि संघ का शताब्दी उत्सव केवल संघ की यात्रा नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक चेतना का उत्सव है। दलित समाज से आने वाले कोविंद ने लोकतंत्र के बल पर सर्वोच्च पद प्राप्त किया और उनकी मौजूदगी ने यह स्पष्ट कर दिया कि संघ और भारत की धारा अब हर वर्ग को साथ लेकर चल रही है।

पड़ोसी देशों में जेन जी के आंदोलनों का भी किया जिक्र

अपने संबोधन में सरसंघचालक मोहन भागवत ने केवल परंपरा की बात नहीं की, बल्कि समकालीन वैश्विक और राष्ट्रीय चुनौतियों पर भी गहरी टिप्पणी की। उन्होंने पड़ोसी देशों नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका की ओर इशारा करते हुए जेन जी पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कभी-कभी शासन प्रशासन जनता के प्रति संवेदनशील नहीं होता और उनकी मांगों को अनदेखा करता है। असंतोष रहता है, लेकिन इसे हिंसा और विनाश के रूप में व्यक्त करना किसी के हित में नहीं। हिंसा से केवल उथल-पुथल होती है, हालात नहीं बदलते। उन्होंने कहा कि परिवर्तन सिर्फ प्रजातांत्रिक मार्गों से ही आता है।

यह कथन नेपाल और बांग्लादेश की वर्तमान स्थिति पर बिल्कुल सटीक बैठता है। नेपाल में युवा बेरोज़गारी दर 20% से अधिक है। बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में विदेश जा रहे हैं। हाल ही में नेपाल की जेन जी सड़कों पर उतरी और प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन जैसा कि भागवत ने कहा, यह हिंसक रास्ता समाधान नहीं, केवल अराजकता के द्वार खोलता है। फ्रांस की क्रांति से नेपोलियन का तानाशाह बनना और साम्यवादी क्रांतियों का अंततः पूंजीवाद में ढल जाना इसी का उदाहरण है।

बांग्लादेश की तस्वीर भी इसी तरह की है। वहाँ 72% युवा इंटरनेट का उपयोग करते हैं, 86% के पास स्मार्टफोन है, लेकिन केवल 28% तकनीकी शिक्षा या कौशल विकास में रुचि रखते हैं। इसका नतीजा यह है कि सूचना तो है, पर दिशा नहीं है। यही कारण है कि वहाँ असंतोष और असुरक्षा बढ़ रही है। मोहन भागवत ने कहा—“अराजकता की स्थिति में देश के बाहरी ताकतों को अपने खेल खेलने का मौका मिल जाता है। ये हमारे पड़ोसी अपने देश हैं, इनसे हमारी आत्मीयता का संबंध है।”

इस संदेश के माध्यम से उन्होंने भारत की भूमिका को स्पष्ट किया—भारत को केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने पड़ोसियों के लिए भी स्थिरता का स्तंभ बनना होगा।

केवल भारत में बाकी है परिवार और समाज व्यवस्था

पर्यावरण पर भी उनका दृष्टिकोण उतना ही गहन था। उन्होंने कहा-विज्ञान और तकनीक की गति इतनी तेज है कि मनुष्य इसमें तालमेल नहीं बिठा पा रहा। प्रकृति के प्रकोप और युद्ध की विभीषिका तो हम झेल ही रहे हैं, लेकिन परिवारों और समाज में भी समस्याएं बढ़ रही हैं। दुनिया में परिवार और समाज की व्यवस्था भंग हो चुकी है। केवल भारत में बाकी है। इसे संजोकर रखना है। समाज का परिवर्तन ही व्यवस्था परिवर्तन हो सकता है।

आज जब पूरी दुनिया जलवायु संकट और पर्यावरणीय आपदाओं से जूझ रही है, तब यह दृष्टिकोण केवल वैज्ञानिक चेतावनी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मार्गदर्शन है। गांधी जी की सादगी और स्वदेशी जीवन शैली इसी का उत्तर है, और संघ प्रमुख ने उसी को आधुनिक भाषा में दोहराया।

सुरक्षा और आतंकवाद पर भागवत का स्वर दृढ़ था। पहलगाम में आतंकियों द्वारा धर्म पूछकर 26 भारतीयों की हत्या पर उन्होंने कहा कि इसके कारण देश में दुख की लहर पैदा हो गई। पूरी तैयारी करके सेना और सरकार ने पुरजोर जवाब दिया। सेना का शौर्य और समाज की एकता का उदाहरण स्थापित हुआ। यह आतंकी घटना हमें सिखा गई कि हम सबके लिए दोस्ताना व्यवहार रखेंगे, लेकिन अपनी सुरक्षा को और मजबूत बनाना होगा। इसी तरह, नक्सली आंदोलन की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि समाज ने उनकी खोखली विचारधारा को नकार दिया है।

वैश्विक राजनीति पर उन्होंने अमेरिका के टैरिफ युद्ध का उदाहरण दिया। कहा कि अमेरिका ने जो नीति टैरिफ की अपनाई, वह अपने हित की सोचकर बनाई होगी। लेकिन उसकी मार पूरी दुनिया पर पड़ी है। कोई भी राष्ट्र अलगाव में नहीं जी सकता। लेकिन यह निर्भरता मजबूरी में न बदल जाए। इसके लिए हमें आत्मनिर्भर बनना होगा। स्वदेशी का उपयोग मजबूरी नहीं, हमारा अधिकार है।

मजबूत हिन्दू समाज सुरक्षा की गारंटी

अंत में उनका सबसे सशक्त संदेश हिंदू समाज की एकता पर था। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज को जिम्मेदार और जवाबदेह बनना होगा। हमें हिंदू राष्ट्र बनाना होगा। हिंदू समाज ने दुनिया को बहुत कुछ दिया है। भारत प्राचीन हिंदू राष्ट्र है। मजबूत हिंदू समाज सुरक्षा की गारंटी है। जो दूसरे धर्म ने नहीं दिया, वह हिंदू ने दिया है। भागवत का यह उद्घोष केवल धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक है।

इस प्रकार, नागपुर का शताब्दी विजयादशमी उत्सव संघ की सौ साल की यात्रा का संक्षेप भी था और आने वाले सौ वर्षों का घोषणापत्र भी। गांधी और शास्त्री को नमन, रामनाथ कोविंद की उपस्थिति, नेपाल-बांग्लादेश की जेन जी को चेतावनी, पर्यावरणीय संकट पर समाधान, अमेरिकी टैरिफ वार से मिली सीख, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का आह्वान, आतंकवाद और नक्सलवाद पर सख्त रुख, और हिंदू एकता का संकल्प-इन सबने मिलकर इसे ऐतिहासिक बना दिया।

आरएसएस की स्थापना 1925 में हुई थी। आज 100 वर्ष पूरे होने के बाद मोहन भागवत का यह संदेश केवल संघ के स्वयंसेवकों के लिए नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र और पड़ोसी देशों के लिए भी दिशा है। नेपाल और बांग्लादेश की जेन जी को देखकर यह स्पष्ट है कि अगर युवाओं को मार्गदर्शन न मिले तो अराजकता फैलती है। लेकिन भारत, अपनी संस्कृति, समाज और परिवार व्यवस्था के बल पर, विश्व को स्थिरता और आशा दे सकता है। यही है शताब्दी वर्ष का सबसे बड़ा संदेश।

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