कर्नाटक विधानसभा में गुरुवार को उस समय बड़ा विवाद खड़ा हो गया, जब राज्यपाल थावरचंद गहलोत राज्य सरकार द्वारा तैयार किया गया पूरा भाषण पढ़े बिना ही सदन से बाहर चले गए। खबरों के अनुसार, संयुक्त सत्र के दौरान राज्यपाल ने अपने पारंपरिक भाषण की सिर्फ पहली और आखिरी पंक्तियां पढ़ीं और फिर विधानसभा छोड़ दी।
इस घटना के बाद कांग्रेस विधायकों और विधान परिषद (एमएलसी) सदस्यों ने राज्यपाल के खिलाफ नारेबाजी की और उनके कदम की कड़ी आलोचना की। कांग्रेस नेता बी.के. हरिप्रसाद ने विधानसभा के गेट पर राज्यपाल को रोकने की कोशिश की और उनसे पूरा भाषण पढ़ने का अनुरोध किया, लेकिन राज्यपाल ने मना कर दिया।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा कि राज्यपाल का यह रवैया संविधान के खिलाफ है और राज्य सरकार इसका विरोध करेगी। उन्होंने यह भी बताया कि सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जाने पर विचार कर रही है। सिद्धारमैया के अनुसार, हर साल नए सत्र की शुरुआत में राज्यपाल को कैबिनेट द्वारा तैयार भाषण पढ़ना होता है, जो एक संवैधानिक जिम्मेदारी है। लेकिन इस बार राज्यपाल ने सरकार का भाषण पढ़ने के बजाय अपना खुद का भाषण पढ़ा, जो संविधान का उल्लंघन है।
कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खड़गे ने भी राज्यपाल के फैसले पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि भाषण में जो बातें लिखी गई थीं, वे सभी तथ्यात्मक थीं और पहले ही प्रधानमंत्री और अन्य केंद्रीय मंत्रियों को सौंपी जा चुकी थीं। खड़गे ने पूछा कि अगर भाषण में कोई झूठ नहीं है, तो फिर उसे पढ़ने से इनकार क्यों किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि क्या अब राज्यपाल का कार्यालय भाजपा का कार्यालय बन गया है।
खड़गे ने जोर देकर कहा कि विधानसभा में भाषण पढ़ना राज्यपाल का संवैधानिक कर्तव्य है और यह भाषण राज्य के हितों से जुड़ा हुआ है। उन्होंने मांग की कि अगर राज्यपाल भाषण नहीं पढ़ना चाहते, तो इसे सार्वजनिक किया जाए ताकि लोग खुद तय कर सकें कि उसमें क्या गलत है।
राज्य के कानून मंत्री एच.के. पाटिल ने इस दिन को “लोकतंत्र के इतिहास का काला दिन” बताया। उन्होंने कहा कि जिस राज्यपाल को संविधान का रक्षक माना जाता है, वही अपने कर्तव्य निभाने में असफल रहा है।
हालांकि, विधानसभा अध्यक्ष यू.टी. खादर ने राज्यपाल और सरकार के बीच टकराव की बात को खारिज किया। उन्होंने कहा कि सभी संवैधानिक संस्थाएं मिलकर काम करती हैं और किसी तरह का टकराव नहीं है।
गौरतलब है कि हाल के दिनों में अन्य राज्यों में भी ऐसे मामले सामने आए हैं। तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि और केरल के राज्यपाल से जुड़े विवाद भी इसी तरह के संवैधानिक मतभेदों को लेकर चर्चा में रहे हैं।





























