बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने ढाका की मौजूदा स्थिति को लेकर सरकार पर कड़ा हमला किया है। उन्होंने कहा कि देश एक बेहद खतरनाक दौर से गुजर रहा है। लोकतंत्र और मानवाधिकारों पर आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए हसीना ने यह चेतावनी न सिर्फ बांग्लादेश के लोगों को, बल्कि पूरी दुनिया को दी। उनका कहना है कि मौजूदा सरकार के फैसले देश की बुनियाद को कमजोर कर रहे हैं और बांग्लादेश का भविष्य खतरे में डाल रहे हैं।
अपने भाषण की शुरुआत में शेख हसीना ने बांग्लादेश की आज़ादी और लोकतंत्र के लिए हुए लंबे संघर्ष को याद किया। उन्होंने कहा कि अंतरिम सरकार संविधान की अनदेखी कर रही है और विपक्ष की आवाज़ दबाई जा रही है। उनके मुताबिक, यह कोई सामान्य राजनीतिक बदलाव नहीं है, बल्कि एक गंभीर संकट है, जो अगर समय रहते नहीं रोका गया तो देश का भविष्य हमेशा के लिए बदल सकता है।
हसीना ने देश में बिगड़ती मानवाधिकार स्थिति पर भी चिंता जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि अंतरिम शासन के दौरान यातना, बिना वजह गिरफ्तारी और यौन हिंसा की घटनाएँ बढ़ी हैं। उनका कहना है कि महिलाएँ और बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। जो सरकारी संस्थाएँ लोगों की रक्षा के लिए बनी हैं, वे या तो नाकाम हो चुकी हैं या उनका गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे देश में डर और अस्थिरता बढ़ रही है, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
उन्होंने धार्मिक और सामाजिक अल्पसंख्यकों की स्थिति पर खास जोर दिया। शेख हसीना ने कहा कि कमजोर शासन के कारण अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ गए हैं। उनके अनुसार, ये घटनाएँ अकेली नहीं हैं, बल्कि अपराधियों को सज़ा न मिलने के माहौल का नतीजा हैं। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों पर अत्याचार से समाज में तनाव बढ़ता है और देश की एकता कमजोर होती है। अगर यह जारी रहा, तो बांग्लादेश का भविष्य और भी अंधकारमय हो जाएगा।
हसीना ने यह भी आरोप लगाया कि अंतरिम सरकार ने चरमपंथी ताकतों को बढ़ने दिया है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठाकर कट्टरपंथी लोग डर और नफरत फैला रहे हैं। इससे अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ रहे हैं और आम लोगों की आज़ादी कम होती जा रही है। उन्होंने बताया कि पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं को धमकाया जा रहा है और उनकी आवाज़ दबाई जा रही है। उनका कहना है कि ऐसा माहौल लोकतंत्र के खिलाफ है और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को नुकसान पहुँचा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील करते हुए शेख हसीना ने कहा कि बांग्लादेश में हो रही घटनाओं पर दुनिया को नज़र रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों पर अत्याचार और मानवाधिकार उल्लंघन को सिर्फ आंतरिक मामला मानकर अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, अन्याय के सामने चुप रहना भी गलत का साथ देने जैसा है। उन्होंने लोकतंत्र को बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को ज़रूरी बताया।
अपने भाषण में उन्होंने आगामी चुनावों पर भी सवाल उठाए। हसीना ने कहा कि उनकी पार्टी अवामी लीग को चुनावी प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया है, इसलिए ऐसे चुनाव निष्पक्ष नहीं हो सकते। उनके मुताबिक, बिना मजबूत विपक्ष के चुनाव जनता की असली राय नहीं दिखा सकते। इससे देश में और ज़्यादा तनाव और अस्थिरता बढ़ेगी।
पूरे भाषण में शेख हसीना ने जिम्मेदारी की बात कही—नेताओं की जनता के प्रति, संस्थाओं की संविधान के प्रति और दुनिया की मानवाधिकारों के प्रति। उन्होंने कहा कि जब अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं होते, तब कोई भी नागरिक सुरक्षित नहीं होता। अगर अन्याय को रोका नहीं गया, तो यह देश की नैतिक सोच को नुकसान पहुँचाएगा।
इस भाषण में राजनीतिक बातों के साथ-साथ भावनाएँ भी साफ़ दिखीं। शेख हसीना ने खुद को उन लोगों की आवाज़ बताया जो मौजूदा हालात से परेशान हैं—खासकर महिलाएँ, अल्पसंख्यक और आम नागरिक। उन्होंने लोकतंत्र के कमजोर होने और अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार को देश की गंभीर समस्या के रूप में पेश किया।
उनके भाषण के बाद दक्षिण एशिया में इस पर चर्चा तेज़ हो गई है। उनके समर्थक इसे जरूरी चेतावनी मानते हैं, जबकि आलोचक इसे राजनीति से प्रेरित बयान बताते हैं। लेकिन इसमें उठाए गए मुद्दे—लोकतंत्र, मानवाधिकार, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और शासन—बांग्लादेश के भविष्य के लिए बेहद अहम हैं।
कुल मिलाकर, भारत से दिया गया शेख हसीना का यह भाषण किसी समझौते की कोशिश नहीं, बल्कि एक सख्त चेतावनी था। उन्होंने ऐसे देश की तस्वीर दिखाई जो अपनी लोकतांत्रिक पहचान और सामाजिक एकता खोने के कगार पर है। आगे क्या होगा, यह देखना बाकी है, लेकिन यह साफ़ है कि आने वाले सालों में बांग्लादेश का भविष्य इन्हीं मुद्दों पर तय होगा।































