भारत की सरकारी एयरोस्पेस कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) और रूस की यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन (UAC) ने अपनी करीब तीन दशक पुरानी साझेदारी को और मजबूत करते हुए एक बड़ा समझौता किया है इस समझौते के तहत भारत में सुखोई सुपरजेट-100 (SJ-100) पैसेंजर विमान का लाइसेंस प्रोडक्शन किया जाएगा।
इस डील के तहत HAL को SJ-100 विमान के प्रोडक्शन और उसकी बिक्री का लाइसेंस मिलेगा। इस समझौते में विमान के पुर्जे और स्पेयर पार्ट्स का निर्माण भी शामिल होगा, जो कि इनकी मेंटेनेंस और रिपेयर के लिए जरूरी होते हैं।
वहीं UAC, HAL को अपनी प्रोडक्शन फैसिलिटीज को SJ-100 के लिए तैयार करने में मदद करेगा। इसके लिए डिजाइन सपोर्ट, कंसल्टिंग और रूसी एक्सपर्ट्स की सेवाएं दी जाएंगी।
क्या SJ-100 का सौदा Su-57 के लिए रास्ता खोल सकता है?
UAC- HAL की इस डील के बाद अब एक बार फिर Su-57 को लेकर बात शुरू हो गई है। क़यास लगाए जा रहे हैं कि क्या SJ-100 की तरह इस फाइटर प्लेटफॉर्म को लेकर भी बात आगे बढ़ेगी?
दरअसल इसी साल नवंबर में HAL और सुखोई की साझेदारी के 30 साल पूरे होने जा रहे हैं। 30 नवंबर 1996 को भारत ने सुखोई और रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के साथ 50 Su-30MKI फाइटर जेट्स खरीदने की डील की थी, ये सभी फाइटर जेट हमें “फ्लाई-अवे कंडीशन” में मिले थे। इसके चार साल बाद, 2000 में, HAL ने Su-30MKI के लाइसेंस प्रोडक्शन का समझौता किया था और अब तक HAL नासिक में 222 Su-30MKI फाइटर जेट्स बना चुका है। वहीं दिसंबर 2024 में HAL को 12 अतिरिक्त Su-30MKI बनाने का ऑर्डर भी मिल चुका है।
यानी रशियन प्लेटफॉर्म्स को लेकर HAL की अंडरस्टैंडिंग काफी बेहतर है और इसीलिए रिपोर्ट्स आ रही हैं कि राफेल के अलावा भारत दो से तीन स्क्वाड्रन Su-57 को भी भारत में बना सकता है।
लेकिन इन रिपोर्ट्स में कितना दम है और ये हकीकत के धरातल पर कहां ठहरती हैं, ये समझना जरूरी है।
दरअसल UAC की एक एक्सपर्ट टीम ने कुछ वक्त पहले नासिक में मौजूद Su-30MKI की असेंबली लाइन का दौरा किया था। इस दौरान एक तकनीकि आकलन के बाद रूस की तरफ़ से कहा गया था कि HAL नासिक की इस एसेंबली लाइन का Su-57 के प्रोडक्शन के लिए आसानी से इस्तेमाल कर सकता है, क्योंकि यहां इससे जुड़ी 50 प्रतिशत क्षमताएं पहले से ही मौजूद है।
ज़ाहिर है अगर भारत इसे लेकर आगे बढ़ता है तो HAL के लिए इस प्रोजेक्ट को संभालने में उतनी मुश्किलें नहीं आएंगी।
इसके अलावा ऐसी रिपोर्ट निकल कर भी सामने आईं हैं, जिनमें बताया गया है कि HAL द्वारा रूस से SU-57 के प्रोडक्शन की प्राइस रिपोर्ट मांगी गई है।
वहीं SJ100 की डील के बाद रूस Su-57 को लेकर भी काफी होपफुल है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या ये डील किसी नतीजे तक पहुंचेगी ?
हालांकि टेक्निकल इवैल्युएशन से लेकर प्राइस इवैल्युएशन तक की जो प्रक्रिया अभी दिख रही है, उससे ये तो स्पष्ट ही है कि कहीं न कहीं HAL भी Su-57 को लेकर रुचि दिखा रहा है।
Su-57 को लेकर बातचीत कितनी गंभीर है?
दरअसल पाकिस्तान और चीन से हमें जिस प्रकार की चुनौती मिल रही है साथ ही जिस प्रकार के वैश्विक हालात हैं, उसे देखते हुए हमें पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट्स की सख्त ज़रूरत है।
वहीं भारत के अपना AMCA जो एक पांचवी पीढ़ी का फाइटर जेट होने वाला है, अभी प्रोटोटाइप फेज़ में ही है और सब कुछ बहुत तेज़ी से चला तो भी ये एयरक्राफ्ट किसी भी क़ीमत पर 2035 -36 से पहले उपलब्ध नहीं होगा।
ये एक दशक का लंबा गैप है और ऐसे में इंपोर्ट को एक ऑप्शन की तरह देखा जा रहा है, ताकि इस गैप को तत्कालिक रूप से भरा जा सके। लेकिन इत्तेफाक से इस दिशा में भी विकल्प बेहद सीमित हैं – या तो अमेरिका, या फिर रूस। फ़िलहाल USA के साथ हमारे जैसे रिश्ते हैं, और जैसा उनका रवैया रहा है, उसे देखते हुए अमेरिकी विकल्प (F-35) को चुनना तलवार की धार पर चलने जैसा है। ऐसे में रेस में सिर्फ Su-57 ही बचता है।
लेकिन Su-57 को लेकर कई सवाल हैं। अव्वल तो एक्सपर्ट इसे पांचवी पीढ़ी का फाइटर जेट मानने से ही इनकार करते हैं। (SU-57 की स्टेल्थ क्षमताएं F-35 के मुकाबले काफी सीमित हैं)
दूसरा – रूस की तरफ़ से भारत को जो फाइटर जेट ऑफ़र किया जा रहा है वो इसका एक्सपोर्ट वेरिएंट है, जिसमें आधुनिक AL-51 इंजन नहीं होंगे। हालांकि खबरों की मानें तो रूस इस विमान के लिए Izdelie-177 इंजन का ऑफ़र ज़रूर दे सकता है, जो कि Su-35 में इस्तेमाल होने वाले AL-41 का ही एक आधुनिक और मॉडिफाइड वर्जन है। लेकिन सही मायनों में ये पांचवी पीढ़ी का इंजन नहीं है।
तकनीकि और क्षमताओं के अलावा एक बड़ा प्रश्न ये भी है कि इस एयरक्राफ्ट में मेक-इन-इंडिया का हिस्सा कितना होगा और उससे भी ज्यादा जरूरी कि इस पर हमारा नियंत्रण कितना होगा?
यहां ये समझना जरूरी है कि प्लेटफ़ॉर्म पर 100 प्रतिशत नियंत्रण या तकनीकी हस्तांतरण तो कोई भी विदेशी निर्माता नहीं प्रदान करेगा। लेकिन अलग-अलग रिपोर्ट्स और बयानों से ये संकेत ज़रूर मिल रहे हैं कि हमें रूस के द्वारा Su-57 प्रोजेक्ट पर अच्छा खासा कंट्रोल दिया जा सकता है, जहां हम इनमें अपने स्वदेशी हथियार और डेटा लिंक को इंटीग्रेट कर पाएंगे, साथ ही कुछ जरूरी बदलाव भी कर सकेंगे। यानी जो आज़ादी हमें Su- 30MKI के साथ मिली है, कमोबेश वही हमें SU-57 के साथ भी मिल सकती है।
यानी कंट्रोल और तकनीकि ट्रांसफ़र को लेकर ख़ास दिक्कतें नहीं हैं, लेकिन असली परेशानी क्षमताओं को लेकर है। वैसे परफ़ॉर्मेंस के लिहाज़ से तो ये काफी प्रभावशाली और सक्षम एयरक्राफ्ट है – जिसमें ज्यादा हथियार लगाए जा सकते हैं, लंबी दूरी की क्रूज़ मिसाइल भी जोड़ी जा सकती हैं, साथ ही इसकी फायर पॉवर और रेंज भी अन्य विमानों के मुकाबले बेहतरीन है।
लेकिन पांचवी पीढ़ी के जेट के लिए सबसे बड़ी शर्त उसकी अदृश्य होने और रडार को चकमा देने की क्षमता है (स्टेल्थ कैरेक्टर) और इसमें ये विमान अमेरिकी विमानों के मुकाबले काफी पीछे है। यानी वास्तव में 4.5+ जेनरेशन का फाइटर जेट कहा जा सकता है, जो थोड़ा बहुत स्टेल्थी भी है और ज्यादा शक्तिशाली भी है। इसलिए अगर एयरफोर्स इसे लेकर विचार कर भी रही है तो उसके पीछे इसकी स्टेल्थ कैपेबिलिटी नहीं, बल्कि इसकी फायरपावर और इसकी ओवरऑल क्षमता है।
भारत की रणनीति में Su-57 कहां फिट बैठता है?
असली प्रश्न यहीं खड़ा होता है, वो ये कि- क्या एयरफोर्स और सरकार किसी 4.5+ जेनरेशन प्लेटफॉर्म पर इतना सारा पैसा लगाना चाहेगी, वो भी तब जबकि क़रीब तीन लाख करोड़ रुपये की राफेल डील लगभग तय बताई जा रही है और ये फाइटर जेट भी 4.5 जेनरेशन के ही विमान हैं।
तो ऐसे में SU-57 की जगह कहां बचती है और क्या इनके लिए सरकार इतना पैसा खर्च करने को तैयार होगी ?
क्षमता बनाए रखने के लिए ‘स्टॉपगैप’ के तौर पर दो या तीन स्कॉड्रन भले ही ली जा सकती हों, जिन्हें ज़रूरत पड़ने पर ‘टिप ऑफ द स्पियर’ की तरह इस्तेमाल किया जा सके।
वहीं अगर इन्हें तकनीकि हस्तांतरण के तहत देश में ही बनाना है तो इसके लिए इनके बड़े ऑर्डर जरूरी होंगे, नहीं तो ये सौदा आर्थिक लिहाज़ से मुफीद साबित नहीं होगा।
लेकिन जिस तरह से 114 राफेल को लेकर बात चल रही है, Su-57 के ये बड़े नंबर्स फ़िलहाल मुमकिन नज़र नहीं आते। पूर्व एयरफोर्स चीफ बी.एस धनोआ ने भी लल्लन टॉप को दिए एक इंटरव्यू में Su-57 को लेकर कुछ यही संकेत दिए थे और इससे साफ़ हो जाता है कि फ़िलहाल एयरफोर्स इन्हें लेकर क्या सोच रही है।
