भारतीय परंपरा में भगवान शिव का स्वरूप अत्यंत व्यापक, गूढ़ और बहुआयामी माना जाता है। वे केवल तप, त्याग, करुणा, संहार और सृजन के अद्भुत संतुलन के प्रतीक हैं। एक ओर वे कैलाशवासी योगी हैं, तो दूसरी ओर गृहस्थ रूप में माता पार्वती और पुत्रों के साथ विराजमान हैं। वे भस्मधारी भी हैं और विश्वनाथ भी; वे भोलेनाथ हैं, जो सरलता से प्रसन्न हो जाते हैं और महाकाल भी- जो समय के स्वामी हैं। यही विविधता शिव को अन्य देवताओं से अलग और विशिष्ट बनाती है।
शिव के स्वरूप को लेकर समाज में अनेक धारणाएँ प्रचलित हैं। कुछ धारणाएँ शास्त्रों पर आधारित हैं, तो कुछ लोककथाओं और परंपराओं से विकसित हुई हैं। ऐसे में शिव के वास्तविक स्वरूप, उनके प्रतीकों और उनके संदेश को सरल और स्पष्ट भाषा में समझाना आज की आवश्यकता है। इसी संदर्भ में‘द ऑथेंटिक कॉन्सेप्ट्स ऑफ शिव’जैसी पुस्तक के युवा लेखक अंशुल पाण्डेय द्वारा लिखित पुस्तक ‘शिवायण’प्राप्त हुई, जिसे देश के सुप्रसिद्ध प्रकाशक‘सुरुचि प्रकाशन’ने प्रकाशित किया है। 44 अध्यायों और 237 पृष्ठों में विस्तृत यह कृति भगवान शिव से जुड़े अनेक प्रमुख विषयों को स्पर्श करती है।
पुस्तक की शुरुआत ही एक महत्त्वपूर्ण और समकालीन प्रश्न से होती है, जैसे क्या शिव नशे का समर्थन करते हैं? आजकल शिव की छवि को कई बार नशे से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है। लेखक इस भ्रम को दूर करने का प्रयास करते हैं और बताते हैं कि शिव का विषपान त्याग और लोककल्याण का प्रतीक है, न कि व्यसन का। वे स्पष्ट करते हैं कि शिव संयम, साधना और आत्मनियंत्रण के प्रतीक हैं। इस प्रकार पुस्तक समाज में फैली गलत धारणाओं को चुनौती देती है।
शिव के स्वरूप और उनके आभूषणों का अर्थ भी पुस्तक में विस्तार से समझाया गया है। शिव के गले में सर्प क्यों है? वे भस्म क्यों धारण करते हैं? उनके मस्तक पर अर्धचंद्र का क्या महत्त्व है? हाथ में त्रिशूल और डमरू का क्या संदेश है? मुंडमाला का रहस्य क्या है? इन सभी प्रश्नों के उत्तर लेखक सरल और तर्कपूर्ण ढंग से देते हैं। इससे पाठक को यह अनुभव होता है कि शिव का प्रत्येक प्रतीक एक गहरा दार्शनिक संदेश देता है।
व्रत और पर्वों से जुड़े अध्याय भी अत्यंत उपयोगी हैं। महाशिवरात्रि का वास्तविक अर्थ क्या है? श्रावण मास शिव को प्रिय क्यों है? सोमवार व्रत की परंपरा कैसे प्रारंभ हुई? कांवड़ यात्रा की उत्पत्ति क्या है और उसे कंधे पर ही क्यों उठाया जाता है? इन सभी विषयों पर पुस्तक स्पष्ट और रोचक जानकारी देती है। धार्मिक परंपराओं को केवल आस्था तक सीमित न रखकर, उनके पीछे छिपे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व को समझाने का प्रयास इस पुस्तक की विशेषता है।
इतिहास और पुराणों से जुड़े प्रसंगों को भी पुस्तक में स्थान दिया गया है। त्रिपुरासुर का वध, दक्ष यज्ञ की कथा, मार्कण्डेय ऋषि का प्रसंग, अमरनाथ लिंग की उत्पत्ति औरमहाभारतमें शिव की भूमिका आदि, इन सभी कथाओं को सरल शैली में प्रस्तुत किया गया है। इससे पाठक को यह समझ में आता है कि शिव भारतीय संस्कृति और साहित्य के केंद्र में स्थित एक महान शक्ति हैं।
पुस्तक का एक विशेष पहलू यह भी है कि इसमें आधुनिक विषयों को भी शिव के संदर्भ में जोड़ा गया है। “आधुनिक अर्थशास्त्र के लिए शिव से सीख”, “योग के जनक के रूप में शिव”, “तंत्र में शिव का स्थान” जैसे अध्याय यह दर्शाते हैं कि शिव का संदेश केवल प्राचीन काल तक सीमित नहीं है, बल्कि आज भी उतना ही प्रासंगिक है। लेखक यह बताने का प्रयास करते हैं कि संतुलित जीवन, संयम, प्रकृति के प्रति सम्मान और आत्मचिंतन,ये सभी शिक्षाएँ शिव से प्राप्त की जा सकती हैं।
भाषा की दृष्टि से पुस्तक सरल, प्रवाहपूर्ण और सहज है। लेखक ने कठिन शास्त्रीय विषयों को भी आम पाठक के लिए समझने योग्य बनाया है। कहीं-कहीं विषय गहन हो जाते हैं, परंतु उदाहरणों और स्पष्ट व्याख्या के कारण पाठक को समझने में कठिनाई नहीं होती।
समग्र रूप से देखा जाए तो 44 अध्यायों में विभाजित यह 237 पृष्ठों का ग्रंथ शिव-तत्त्व को समझने का एक व्यापक और सराहनीय प्रयास है। यह पुस्तक केवल भक्तों के लिए ही नहीं, बल्कि उन जिज्ञासु पाठकों के लिए भी उपयोगी है जो शिव को तर्क, इतिहास और दर्शन की दृष्टि से समझना चाहते हैं। आस्था और विचार का संतुलन, सरल भाषा और विविध विषयों की प्रस्तुति इसे एक पठनीय और संग्रहणीय पुस्तक बनाती है। पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है।
पुस्तक का नाम: शिवायण
भाषा: अंग्रेजी
प्रकाशक: सुरुचि प्रकाशन, दिल्ली
पृष्ठ: 237
मूल्य: 349 (प्रिंट)
