भारत की सामरिक समुद्री क्षमता को लेकर एक बड़ी और महत्वपूर्ण ख़बर सामने आई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय नौसेना अपनी तीसरी न्यूक्लियर-पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन INS अरिदमन (S4) को सेवा में शामिल करने की तैयारी में है और ये जल्द ही नेवी के बेड़े का हिस्सा बन सकती हैं।
समन्दर की गहराई में तैनात बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियाँ किसी भी परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र के लिए अंतिम सुरक्षा कवच मानी जाती हैं, जो निर्णायक ‘सेकेंड स्ट्राइक’ क्षमता प्रदान करती हैं। यानी यदि किसी संघर्ष में जमीन आधारित मिसाइल ठिकाने और एयरबेस निष्क्रिय भी हो जाएँ, तब भी समुद्र में छिपी पनडुब्बियाँ प्रभावी जवाबी परमाणु हमला करने की क्षमता बनाए रखती हैं। यही क्षमता “सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी” कहलाती है और परमाणु संतुलन बनाए रखने में इसकी निर्णायक भूमिका होती है। INS ‘अरिदमन’ के शामिल होने से भारत की यह क्षमता अधिक भरोसेमंद और अधिक अचूक हो जाएगी।
‘अरिहंत’ से ‘अरिदमन’ तक: पलटवार की प्रभावी क्षमता का विस्तार
भारत ने अपना न्यूक्लियर ट्रायड पूरा करने के लिए ‘अरिहंत’ प्रोग्राम पर काफी पहले काम शुरू किया था। रिपोर्ट्स के मुातबिक इस प्रोग्राम की पहली सबमरीन का निर्माण 2004 में शुरू हुआ था और 2009 में ये बनकर तैयार हो गई, लेकिन इसके बाद इन्हें कई तरह की टेस्टिंग और ‘सी ट्रॉयल्स’ में भेजा गया जहां लगभग 7 साल लगाने के बाद इसे आधिकारिक रूप से भारतीय नौसेना में शामिल किया गया।
भारतीय नौसेना की पहली सबमरीन INS अरिहंत थी। यह चार K-4 बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम्स ले जा सकती है।
K-4 के लिए बने साइलो में K-15 सागरिका भी रखी जा सकती है और एक K-4 साइलो में तीन सागरिका मिसाइलें फिट होती हैं। यानी एक अरिहंत 12 K-15 या 4 K-4 मिसाइल ले जा सकती है।
इसी क्लास की दूसरी सबमरीन INS अरिघात है। यह भी काफी पहले बन गई थी लेकिन सर्विस में 2024 में इंडक्ट हुई। माना जाता है कि इसे लगभग 2017 के आसपास लॉन्च किया गया था, यानी इसके इंडक्शन में भी करीब 7 साल लगे।
इसके बाद भारत ने एक नई क्लास S4 और S4* विकसित कीं जो ‘अरिहंत’ से दुगना पेलोड ले जा सकती थी। इसमें उसी रिएक्टर का इस्तेमाल होता है, लेकिन इसकी हथियार ले जाने की क्षमता काफी ज्यादा है। अरिहंत के मुकाबले इसमें दुगने साइलोज़ हैं और यह 8 K-4 या 24 K-15 सागरिका ले सकती है। INS अरिदमन इसी S4 क्लास की ही सबमरीन है,
जबकि S4* यानी INS अरिसुदन (शत्रुओं की संहारक) के भी सी ट्रॉयल्स जारी हैं और इसे भी अगले साल तक सर्विस में इंडक्ट किया जा सकता है।
कुल मिलाकर मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो अब भारतीय नौसेना के पास तीन SSBN हो गई हैं और सबकुछ ठीक रहा तो अगले साल तक ये संख्या बढ़ कर चार होने वाली है।
परमाणु पनडुब्बी: ‘अनलिमटेड’ रेंज और जबरदस्त ताकत
चूंकि ये न्यूक्लियर पॉवर्ड सबमरीन्स हैं, ऐसे में कंवेंशनल डीज़ल-इलेक्ट्रिक सबमरीन्स की तरह इन्हें जेनरेटर चलाने के लिए बार-बार सतह पर आने की ज़रूरत नहीं पड़ती और ये लंबे समय तक पानी के अंदर रह सकती हैं। इस लिहाज़ से इनकी रेंज व्यावहारिक रूप से अनलिमिटेड है।
इसका मुख्य उद्देश्य भारत की ‘सेकंड स्ट्राइक’ कैपेबिलिटी को मजबूत करना है। यानी पहला हमला हमारा नहीं होगा, लेकिन अगर हम पर हमला हुआ तो दूसरा और जवाबी हमला हमारा होगा और निर्णायक होगा। इसीलिए ‘अरिदमन’ की हथियार ले जाने की क्षमता पहले की ‘अरिहंत’ और ‘अरिघात’ से दुगनी है। यह सबमरीन स्ट्रेटेजिक फोर्सेस कमांड के अंतर्गत जाएगी जो भारत के ‘न्यूक्लियर आर्सेनल’ को संभालती है।
इनमें फिलहाल K-सीरीज़ की K-15 (सागरिका) और K-4 मिसाइलें तैनात की जाएंगी। K-15 पानी के अंदर से लॉन्च हो सकने वाली बैलिस्टिक मिसाइल है जिसकी रेंज लगभग 750 किमी है — जो पाकिस्तान के किसी भी हिस्से को निशाना बना सकती है। वहीं K-4 मिसाइल की रेंज लगभग 3500 किमी है और समुद्र की गहराई से लॉन्च होने के बाद यह चीन के प्रमुख शहरों तक पहुंच सकती है।
S5 क्लास पर काम शुरू: यानी भारत के पास होगी दुनिया के किसी भी कोने में प्रहार की क्षमता
इसके अलावा, इससे बड़ी और अधिक शक्तिशाली S5 क्लास पर काम शुरू हो चुका है और माना जा रहा है कि 2030 के आसपास इन्हें बेड़े में शामिल किया जा सकता है। लगभग 13,000–15,000 टन डिस्प्लेसमेंट वाली ये सबमरीन वर्तमान प्लेटफॉर्म से लगभग दुगनी होंगी और इनमें ऊर्जा के लिए 200 मेगावॉट का रिएक्टर होगा।
जानकारी के मुताबिक इन पर और लंबी दूरी की K-5 और K-6 मिसाइलें लगेंगी। K-5 की रेंज 5,000 से 8,000 किमी और K-6 की लगभग 9,000 किमी बताई जाती है। इन मिसाइलों से लैस न्यूक्लियर सबमरीन्स भारत को कहीं अधिक मजबूत सेकेंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी देंगी और आवश्यकता पड़ने पर दुनिया के किसी भी कोने में स्ट्राइक करने की क्षमता प्रदान करेंगी।
इसके अलावा प्रोजेक्ट-77 के तहत न्यूक्लियर अटैक सबमरीन भी विकसित की जा रही हैं, जिनका उद्देश्य दुश्मन की पनडुब्बियों और युद्धपोतों को ट्रैक करना और आवश्यकता पड़ने पर नष्ट करना होगा।
ऐसी 6 सबमरीन्स बननी हैं, जिनमें से दो को मंजूरी मिल चुकी है। इनमें भी S5 जैसा रिएक्टर लगेगा और ये लगभग 10,000 टन क्लास की होंगी।
इस प्रकार नौसेना के बेड़े में एक ओर रणनीतिक सेकेंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी प्रदान करने वाली SSBN होंगी तो दूसरी ओर सक्रिय सुरक्षा प्रदान करने वाली SSN पनडुब्बियाँ मौजूद रहेंगी।
समग्र रूप से देखें तो INS अरिदमन का इंडक्शन केवल एक नई पनडुब्बी जोड़ना नहीं बल्कि भारत की परमाणु समुद्री रणनीति का क्रमिक परिपक्व होना है।
आने वाले वर्षों में S5 क्लास और नई मिसाइल प्रणालियों के साथ भारत हिंद महासागर क्षेत्र में एक स्थायी और विश्वसनीय समुद्री परमाणु शक्ति के रूप में उभरता दिखाई देता है। कुल मिलाकर न्यूक्लियर सबमरीन के क्षेत्र में भारत की प्रगति यह संकेत देती है कि दीर्घकालिक निवेश के साथ स्वदेशी रक्षा कार्यक्रम ठोस परिणाम दे सकते हैं।






























