भारत के कई शहरों में एक दिलचस्प व्यवहार अक्सर देखने को मिलता है। मेट्रो स्टेशनों पर यात्री लाइन में शांति से खड़े रहते हैं, धैर्य दिखाते हैं और नियमों का पालन करते हैं। लेकिन यही लोग जब बसों, लोकल ट्रेनों या सड़क किनारे ऑटो की कतारों में होते हैं, तो अक्सर जल्दबाज़ी, धक्का-मुक्की और अव्यवस्था देखने को मिलती है।
भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 में इस अंतर को विस्तार से समझाया गया है। सर्वेक्षण के अनुसार, यह व्यवहार लोगों के नैतिक चरित्र से जुड़ा नहीं है, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि व्यवस्था कैसे बनाई गई है, नियम कितने साफ हैं, निगरानी कैसी है और लोगों की क्या उम्मीदें हैं।
पहला कारण है—स्पष्ट नियम और संकेत।
मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास के रास्ते साफ होते हैं, लाइनें बनी होती हैं, बोर्ड लगे होते हैं और यह साफ दिखता है कि कहाँ खड़ा होना है। इससे यात्रियों को समझ आ जाता है कि उन्हें क्या करना है। इसके उलट, बस स्टॉप या लोकल ट्रेन प्लेटफॉर्म पर अक्सर कोई तय व्यवस्था नहीं होती। जब नियम साफ नहीं होते, तो लोग अपनी जगह बनाने के लिए धक्का-मुक्की करने लगते हैं।
दूसरा कारण है—नियमों का पालन करवाना।
मेट्रो में सुरक्षाकर्मी, टिकट चेक करने वाले और कैमरे होते हैं। यात्रियों को पता होता है कि अगर वे नियम तोड़ेंगे तो कार्रवाई हो सकती है। इससे लोग लाइन में खड़े रहते हैं। दूसरी ओर, कई बस स्टॉप और रेलवे प्लेटफॉर्म पर निगरानी कम होती है या अनियमित होती है, जिससे लोग नियमों को हल्के में लेने लगते हैं।
तीसरा कारण है—सेवा की विश्वसनीयता।
मेट्रो समय पर आती है और ज्यादा देर इंतजार नहीं करना पड़ता। जब लोगों को भरोसा होता है कि ट्रेन जल्दी आ जाएगी, तो वे शांत रहते हैं। लेकिन बसों या दूसरी ट्रेनों में समय का भरोसा नहीं होता। देरी की आशंका से लोग घबराते हैं और आगे निकलने की कोशिश करते हैं।
चौथा कारण है—सामाजिक सीख और आदत।
मेट्रो में लोग दूसरों को लाइन में खड़ा देखकर वही व्यवहार अपनाते हैं। धीरे-धीरे यह एक सामाजिक नियम बन जाता है। लेकिन खुले और अव्यवस्थित स्थानों पर ऐसा कोई मजबूत सामाजिक नियम नहीं बन पाता, इसलिए लोग अपनी सुविधा के हिसाब से व्यवहार करते हैं।
पाँचवाँ कारण है—सम्मान और गर्व की भावना।
मेट्रो को लोग आधुनिक, साफ-सुथरा और शहर की पहचान मानते हैं। इससे लोग उसे सम्मान देते हैं और अच्छे से पेश आते हैं। वहीं, कई बसें या पुराने रेलवे सिस्टम गंदे या उपेक्षित लगते हैं, जिससे लोगों को उनसे जुड़ाव महसूस नहीं होता और व्यवहार भी लापरवाह हो जाता है।
इन सभी कारणों से यह साफ होता है कि लोगों का व्यवहार अच्छा या बुरा होने की वजह से नहीं, बल्कि माहौल और व्यवस्था की वजह से बदलता है। जहाँ नियम साफ हों, निगरानी हो, सेवा भरोसेमंद हो और जगह सम्मानजनक लगे—वहाँ अनुशासन अपने आप आता है।
आर्थिक सर्वेक्षण यह भी बताता है कि अगर मेट्रो जैसी व्यवस्था के अच्छे पहलुओं को बसों और दूसरी परिवहन सेवाओं में अपनाया जाए—जैसे साफ लाइनें, बेहतर सूचना, समय पर सेवा और नियमित निगरानी—तो वहाँ भी लोगों का व्यवहार सुधर सकता है।
अंत में, सवाल यह नहीं है कि लोगों में नागरिक समझ की कमी है, बल्कि यह है कि क्या व्यवस्था उन्हें सही व्यवहार करने का मौका देती है। अगर हालात सही बनाए जाएँ, तो मेट्रो जैसा अनुशासन हर सार्वजनिक परिवहन में देखा जा सकता है, जिससे सफर आसान, सुरक्षित और बेहतर हो सकेगा।































