आज से ही के दिन तालिबान ने तोड़ी थीं बुद्ध की 2 हजार वर्ष पुरानी प्रतिमाएं, लेकिन भीम-मीम एकता के अनुयायी इस कृत्य पर 25 वर्ष बाद भी कुछ लिख बोल नहीं सकते

12 मार्च 2001 को बामियान की शांत घाटी में बंदूकों और तोप के गोलों की आवाज़ें गूंज उठीं। तालिबान का निशाना कोई फौज नहीं बल्कि भगवान बुद्ध की दो हजार वर्ष पुरानी प्रतिमाएं थीं, जो बकौल तालिबान इस्लामी भावनाओं को आहत कर रही थीं

अफ़ग़ानिस्तान की शांत बामियान घाटी में इस दिन बंदूक की गोली और मोर्टार विस्फोट की आवाज़ें गूंज उठीं थीं। तालिबान के लंबी दाढ़ी वाले सैनिक, ढीले सलवार-कुर्ते पहने, अपने रॉकेट लॉन्चर बार-बार लोड और फायर कर रहे थे। उनका लक्ष्य लगभग 2,000 साल पुरानी दो विशाल बौद्ध मूर्तियाँ थीं। ये मूर्तियाँ केवल पत्थर की संरचनाएँ नहीं थीं, बल्कि अफ़ग़ानिस्तान की प्राचीन गैर-इस्लामी संस्कृति और बौद्ध विरासत का प्रतीक थीं।

तालिबान के स्थानीय कमांडरों ने अपने निर्णय से मूर्तियों पर लगातार गोलियाँ चलाईं और टैंक के गोले दागे। विपक्षी समूहों और मिलिशिया स्रोतों ने पुष्टि की कि सैनिक पूरे दिन इन मूर्तियों को तोड़ने में लगे रहे।

कमांडरों ने मूर्तियों पर हमला किया 
पश्चिमी राजनयिकों ने आशा जताई थी कि तालिबान के आध्यात्मिक नेता मुल्ला मोहम्मद उमर अपने आदेश पर पुनर्विचार करेंगे, जिसमें उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान की सभी मूर्तियों को नष्ट करने का निर्देश दिया था। लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी, रूस, भारत, यूरोपीय संघ और यहां तक कि तालिबान के करीबी सहयोगी पाकिस्तान की कड़ी निंदा का कोई असर नहीं हुआ। स्थानीय कमांडरों ने मूर्तियों पर हमला पहले ही शुरू कर दिया था।

सांस्कृतिक विनाश और धार्मिक कट्टरता के प्रतीक

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व 
बामियान की घाटी सैकड़ों वर्षों से बौद्ध तीर्थयात्रियों का केंद्र रही थी। ये मूर्तियाँ अफ़ग़ानिस्तान की सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से थीं। पश्चिमी विशेषज्ञों के अनुसार, लगभग 6,000 बौद्ध पुरातात्विक वस्तुएँ, जिनमें से कुछ तालिबान के सूचना मंत्रालय के तहखानों में रखी थीं, पहले ही नष्ट हो चुकी हैं। यूनेस्को के महानिदेशक कोइचिरो मात्सूरा ने कहा:
“मुझे शब्द नहीं मिल रहे कि मैं अपनी भावनाओं और असहायपन को व्यक्त कर सकूँ, जब मैं अफ़ग़ानिस्तान की असाधारण सांस्कृतिक विरासत को हो रहे अपरिवर्तनीय नुकसान की रिपोर्ट देखता हूँ।”

धार्मिक आदेश के तहत मूर्तियां उड़ाई
तालिबान ने इसे धार्मिक आदेश के तहत मूर्तिपूजा का प्रतीक मानते हुए नष्ट किया। यह कार्रवाई केवल मूर्तियों को तोड़ने तक सीमित नहीं थी; यह अफ़ग़ानिस्तान की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को मिटाने का प्रयास थी। इसे कई विशेषज्ञों ने आइकोनोक्लास्टिक कार्रवाई यानी धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के विनाश के रूप में देखा।

तालिबान द्वारा मूर्तियों के विनाश के समय

सामाजिक और मानवीय स्थिति थी खराब 
तालिबान द्वारा मूर्तियों के विनाश के समय, अफ़ग़ानिस्तान पहले से ही 30 वर्षों के सबसे भयंकर सूखे और अकाल की चपेट में था। लगभग 1.2 करोड़ लोग प्रभावित थे, जिनमें से 30 लाख लोग भूख के कगार पर थे। इस साल लगभग 5 लाख अफ़ग़ान अपने घर छोड़ चुके थे, अधिकांश पाकिस्तान की ओर पलायन कर रहे थे। हालात इतने खराब थे कि राजधानी काबुल में, चैरिटी फूड कूपन के लिए मची भगदड़ में  एक महिला, दो महीने का शिशु और चार साल का बच्चा कुचल कर मर गए। लेकिन तालिबान बुद्ध की मूर्तियां तोड़़ने में जुटे रहे।

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