फ़िलहाल पूरा पश्चिमी एशिया जंग की चपेट में है और पूरे विश्व की एनर्जी सप्लाई पर इसका सीधा दिख रहा है, क्योंकि इस जंग की वजह से फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ने वाला होर्मुज स्ट्रेट फ़िलहाल बंद है। पूरी दुनिया में इस्तेमाल होने वाला क़रीब 25 प्रतिशत तेल 40 मील से भी संकरे इसी समुद्री रास्ते से होते हुए अरब सागर और फिर दुनिया के दूसरे देशों में पहुंचता है। ये दुनिया के लिए सिर्फ एनर्जी सप्लाई का ही नहीं इकॉनमी की रफ़्तार का भी रास्ता है। लेकिन अमेरिकी–इजरायली हमले में जबरदस्त नुक़सान झेलने के बाद ईरान ने इसी गलियारे को ठप कर दिया है।
ईरान की ये रणनीति अमेरिका को उसकी मिसाइलों से ज्यादा चोट पहुंचा रही है। वैसे कहने को तो राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ईरान की लगभग पूरी नेवी को तबाह करने का दावा कर रहे हैं, लेकिन जब बारी आई हॉर्मुज के इधर और उधर फंसे तेल के टैंकरों और कारोबारी जहाजों को सुरक्षा देने की, तो उन्होने मजबूरियां गिनाते हुए विनम्रता पूर्वक हाथ जोड़ लिए।
ट्रम्प दूसरों से हेल्प मांग तो रहे हैं, लेकिन जंग पूछ कर शुरू की थी क्या ?
दुनिया के सबसे ताक़तवर मुल्क का सबसे ताक़तवर शख्स कह रहा है कि वो दुनिया की सबसे ताक़तवर नेवी को वहां एस्कॉर्ट करने नहीं भेज सकता, जहां उसने ख़ुद लड़ाई शुरू की है।
हां अब ट्रम्प ने हॉर्मुज स्ट्रेट को खोलने के लिए अपने कट्टर प्रतिद्वंदी चीन से मदद ज़रूर मांगी है कि हम भले ही अपने जहाज़ नहीं भेज रहे हैं, लेकिन कृपा करके आप आएं और न सिर्फ तेल के टैंकरों को एस्कॉर्ट करें, बल्कि हॉर्मुज स्ट्रेट को खोलने का भी काम करें।
जरा सोचिए चीन से किसी प्रकार की मदद मांगना, वो भी सैन्य मदद मांगना, ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ की शान के कितना ख़िलाफ़ हो सकता है, लेकिन फ़िलहाल ज़रूरत रास्ता साफ़ करवाने की है तो दिल बड़ा करते हुए ट्रम्प साहब ने चीन ही नहीं– जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों से भी अपील कर डाली है कि वो सब आगे आगे चलें और अगर वो सब ईरानी समुद्री माइन्स, ड्रोन्स और मिसाइलों से बच बचा कर निकल गए, तो मौका देखकर पीछे से वो भी आ जाएंगे। वो तो ट्रम्प साहब ने इतनी मेहरबानी बरती कि इस लिस्ट में पाकिस्तान का नाम नहीं जोड़ा।
ट्रम्प मजबूरियां गिनाते रहे, इंडियन नेवी काम में जुट चुकी है
वैसे दिलचस्प बात ये है कि वॉशिंगटन डी.सी. में जब डॉनल्ड ट्रम्प महोदय ‘हॉर्मुज’ खोलने के लिए अपने वॉर शिप्स न भेज पाने की मजबूरियां गिना रहे थे, ठीक उसी वक्त इंडियन नेवी के जंगी जहाज़ हॉर्मुज जलडमरूमध्य के दूसरी तरफ़ ओमान में LPG गैस से लदे अपने दो जहाजों को सुरक्षा देने के लिए न सिर्फ पहुँच चुके थे, बल्कि अब जबकि ट्रम्प साहब चीन से नेवी भेजने की दरख्वास्त कर रहे थे, तब तक भारतीय नौसेना अपने इन टैंकरों को एस्कॉर्ट करते हुए सुरक्षित इस क्षेत्र से बाहर ला चुकी थी।
जानकारी के मुताबिक़ 40 हजार मीट्रिक टन से ज्यादा अधिक LPG लेकर जा रहा एक टैंकर (शिवालिक) भारतीय नौसेना की सुरक्षा में वहां से निकल कर भारत पहुंचने वाला है, जबकि उसके पीछे–पीछे एक दूसरा गैस टैंकर (नंदा देवी) भी चला आ रहा है। ज़ाहिर है कि ये एक योजनाबद्ध और संगठित मिशन है, जिसका मकसद भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना और सप्लाई लाइन को सुरक्षित बनाना है।समन्दर में भारत जैसे एक शांतिप्रिय देश की नेवी की सबसे जिम्मेदारी भी तो यही है।
इंडियन नेवी ढोल नहीं पीटती अपना काम करती है
वैसे भी भारत के लिए ये मिशन केवल प्रतीकात्मक नहीं हैं, बल्कि एक रणनीतिक अनिवार्यता है। भारत की ऊर्जा आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है और आयात होने वाली लगभग 90 प्रतिशत LPG (अधिकारियों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार) इसी होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होते हुए हम तक पहुंचती है।
इस संकरे मार्ग में किसी भी प्रकार की अस्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर ही नहीं करोड़ों लोगों के जीवन पर सीधा असर डाल सकती है। यही कारण है कि भारतीय नौसेना कई वर्षों से अरब सागर, ओमान की खाड़ी और पश्चिमी हिंद महासागर में लगातार अपनी मौजूदगी बनाए हुए है।
अब भले ही इसके लिए भारत सरकार या इंडियन नेवी डॉनल्ड ट्रम्प की तरह भारी भरकम माहौल न बनाया हो, लेकिन जो मिशन आपको सामान्य एस्कॉर्ट ऑपरेशन लग रहा है, वो दरअसल एक लंबे समय से गढ़ी गई समुद्री रणनीति का हिस्सा हैं।
पिछले क़रीब दशक में भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी नौसैनिक क्षमता और पहुंच को लगातार बढ़ाया है। भारतीय युद्धपोत अब महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर नियमित गश्त करते हैं, समुद्री डाकुओं से लेकर ड्रग्स पकड़ने और अवैध गतिविधियों को रोकने जैसे अभियानों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं और संकट के समय ‘फर्स्ट रिस्पॉंडर’ साबित होते हैं।
आज से क़रीब दो वर्ष पहले की घटना भी आपको याद ही होगी, जब इंडियन नेवी के मार्कोज कमांडो और INS कोलकाता ने MV रुइन नाम के एक कार्गो शिप को लाल सागर के क़रीब समुद्री लुटेरों से न सिर्फ बचाया था, बल्कि जहाज़ को बीते कई महीनों से कब्जे में ले चुके 35 समुद्री लुटेरों को गिरफ़्तार भी किया था। भारत ने तब भी इसका ढोल नहीं पीटा, जबकि उस वक्त जिबूती में चाइनीज़ नेवी और रेड सी में ही वेस्टर्न नेवी के कई वेसल्स न सिर्फ मौजूद थे, बल्कि काफी क़रीब भी थे, वहीं इंडियन नेवी ने ये मिशन भारत की समुद्री सीमा से क़रीब हज़ार मील दूर जाकर पूरा किया था।
वैसे ये भी याद रखिए कि डॉनल्ड ट्रम्प ने इस दौरान अपने प्रतिद्वंदी चीन से लेकर जापान और कोरिया तक से मदद माँग ली है, लेकिन भारत का नाम तक नहीं लिया है। शायद वो जानते हैं कि ईरान का एक जंगी जहाज़ अभी भी भारत के एक पोर्ट पर आराम फरमा रहा है और शायद तब तक वहीं रहे, जब तक कि ये जंग खत्म नहीं हो जाती।
फ़िलहाल तो आप इंडियन नेवी के साथ घर लौट रहे ‘नंदा’ और ‘शिवालिक’ का स्वागत कीजिए, क्योंकि आने वाले कुछ और दिनों में हमें ऐसे और बहादुरों की आवश्यकता होगी।
