आज के समय में इज़राइल और ईरान के बीच की दुश्मनी साफ देखी जा रही है, लेकिन इतिहास बताता है कि दोनों देशों का रिश्ता पहले इतना सरल नहीं था। एक समय ऐसा भी था, दुश्मन बनने से पहले इज़राइल और ईरान एक समय में एक-दूसरे के सहयोगी थे उस समय दोनों देशों की एक साझा चिंता थी—इराक के नेता Saddam Hussein की विस्तारवादी नीतियाँ।
इसलिए इज़राइल और ईरान की कहानी सिर्फ दुश्मनी की नहीं है, बल्कि समय के साथ बदलते रिश्तों, विचारधाराओं और क्षेत्रीय ताकत के संघर्ष की कहानी भी है।
शाह के समय इज़राइल-ईरान के रिश्ते
ईरान के शाह Mohammad Reza Pahlavi के शासन के दौरान ईरान और इज़राइल के बीच गुप्त लेकिन महत्वपूर्ण संबंध थे।
दोनों देश ऐसे क्षेत्र में थे जहाँ ज्यादातर अरब देश थे, और उनमें से कई इज़राइल के खिलाफ थे। इस वजह से दोनों देशों के बीच समझदारी और सहयोग का रिश्ता बना।
उस समय Saddam Hussein के नेतृत्व में इराक अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा था और क्षेत्र में प्रभुत्व स्थापित करना चाहता था। इसी कारण इज़राइल और ईरान ने खुफिया जानकारी साझा करने, आर्थिक सहयोग और सीमित सुरक्षा सहयोग जैसे कदम उठाए।
1979 की इस्लामी क्रांति
साल 1979 में ईरान में Iranian Revolution हुई, जिसने देश की राजनीति पूरी तरह बदल दी। क्रांति के बाद Ayatollah Ruhollah Khomeini सत्ता में आए और उन्होंने आधिकारिक रूप से इज़राइल को दुश्मन घोषित कर दिया। लेकिन इसके बाद भी इज़राइल और ईरान के रिश्ते उतने सीधे नहीं थे जितना सार्वजनिक बयानबाजी में दिखाई देता था।
ईरान-इराक युद्ध और फिर से सहयोग
1980 में इराक ने ईरान पर हमला किया और Iran–Iraq War शुरू हो गया। यह युद्ध बहुत लंबा और विनाशकारी था। इराक की सैन्य ताकत ईरान के लिए बड़ा खतरा बन गई थी। इसी समय इज़राइल और ईरान एक बार फिर रणनीतिक रूप से एक ही पक्ष में दिखाई दिए। हालाँकि ईरान सार्वजनिक रूप से इज़राइल की आलोचना करता था, लेकिन कई रिपोर्टों के अनुसार युद्ध के शुरुआती वर्षों में इज़राइल ने ईरान को सीमित सैन्य सहायता दी। इसका कारण साफ था—अगर इराक युद्ध जीत जाता तो Saddam Hussein और अधिक ताकतवर हो जाता, जिससे पूरे क्षेत्र की स्थिरता और इज़राइल की सुरक्षा को खतरा हो सकता था।
व्यावहारिक सहयोग, विचारधारा नहीं
इज़राइल और ईरान के बीच यह सहयोग किसी विचारधारा या दोस्ती पर आधारित नहीं था। यह पूरी तरह व्यावहारिक जरूरतों पर आधारित था।
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इज़राइल को डर था कि इराक की बढ़ती सैन्य शक्ति भविष्य में उसके लिए खतरा बन सकती है।
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दूसरी ओर, ईरान युद्ध के कारण अलग-थलग पड़ गया था और उसे हथियारों और सैन्य उपकरणों की जरूरत थी।
इन कारणों से दोनों देशों के हित कुछ समय के लिए एक जैसे हो गए।
युद्ध खत्म होने के बाद बढ़ी दुश्मनी
1988 में Iran–Iraq War खत्म हुआ। इसके बाद क्षेत्र की राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलने लगीं और इज़राइल-ईरान के बीच जो सीमित सहयोग था, वह धीरे-धीरे खत्म हो गया।
अगले वर्षों में दोनों देशों के बीच वैचारिक और राजनीतिक तनाव बढ़ता गया।
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ईरान ने इज़राइल के विरोधी समूहों का समर्थन किया।
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वहीं इज़राइल ने ईरान के सैन्य और परमाणु कार्यक्रम को अपने अस्तित्व के लिए खतरा माना।
बदलते रिश्तों की कहानी
इज़राइल और ईरान का रिश्ता यह दिखाता है कि मध्य पूर्व में अंतरराष्ट्रीय संबंध कितने बदलते रहते हैं। यहाँ कई बार देशों के बीच गठबंधन स्थायी विचारधारा के बजाय तत्काल खतरे के आधार पर बनते हैं।
Saddam Hussein के खिलाफ साझा विरोध ने कुछ समय के लिए दोनों देशों को करीब ला दिया था। लेकिन जब यह खतरा खत्म हुआ, तो उनके बीच के वैचारिक मतभेद फिर सामने आ गए।
आज की स्थिति
आज इज़राइल और ईरान के बीच खुली दुश्मनी है। फिर भी उनका पुराना सहयोग यह दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी दुश्मन बहुत कम होते हैं। अक्सर देशों के रिश्ते उनके रणनीतिक हितों के अनुसार बदलते रहते हैं।
इराक के खिलाफ सहयोग का वह दौर इस बात का उदाहरण है कि कैसे साझा खतरे कभी-कभी असामान्य साझेदारी पैदा कर सकते हैं।
