जुंदिशापुर: ईरान का वो शहर जिसने भारतीय ज्ञान परंपरा को अरब और फिर यूरोप तक पहुंचाया, कभी वराहमिहिर ने स्थापित की थी वेधशाला

अब्बासी खलीफाओं के वक्त बग़दाद में स्थापित बैत-अल-हिकमा को इस्लामी ज्ञान और दर्शन का केंद्र माना जाता है, लेकिन ये ज्ञान वहां तक ईरान के रास्ते भारत से ही पहुंचा था

जुंदिशापुर, ईरान के 31 राज्यों में से एक, खुजेस्तान में हैं।

ईरान और अमेरिका / इजरायल के बीच युद्ध जारी हैं। दो सप्ताह से ज्यादा समय हो चुका हैं। एक दूसरे पर जबर्दस्त बमबारी हो रही हैं। विशेषतः अमेरिका, ईरान पर भयानक और विनाशक बम बरसा रहा हैं। ऐसे में, मैं खोज रहा था, ईरान के जुंदिशापुर के क्या हाल हैं?

सौभाग्य से जुंदिशापुर (ईरान में वर्तमान समय में इसका आधिकारिक नाम – Gundishapur), अभी भी बचा हुआ है, व सुरक्षित है। जिनेवा संधि / सम्मेलन (Geneva Convention) के अनुसार, युद्ध के प्रसंग में किसी भी देश के पुरातत्व महत्व के स्थान पर बमबारी करना, अपराध माना गया हैं। उस पर, जुंदिशापुर तो यूनेस्को द्वारा संरक्षित स्मारक हैं।

अर्थात, अमेरिका को जिनेवा संधि की बहुत कुछ पड़ी नहीं हैं। उसकी बमबारी के कारण गोलेस्तान पैलेस (तेहरान) और चेहेल सोटौन पैलेस (इस्फाहन) ऐतिहासिक महत्व के ये स्थान क्षतिग्रस्त हो गए हैं। यूनेस्को ने इस पर चिंता प्रकट की हैं। किंतु अमेरिका को इसकी परवाह हैं, ऐसा लगता नही।

अमेरिका जहां पर पूरी ताकत के साथ बमबारी कर रहा हैं, वो स्थान हैंइस्फहान (कहते हैं, इसके आसपास ईरान के मिसाइल्स और परमाणु हथियारों के ठिकाने हैं), कोम, करज, केरमान्शाह, लोरेस्तान, ताब्रिज, कनाराक के नौसैनिक अड्डे आदि। इनमें जुंदिशापुर का क्षेत्र नहीं हैं। जुंदिशापुर, ईरान के 31 राज्यों में से एक, खुजेस्तान में हैं। ईरान के बिल्कुल दक्षिणपश्चिम में, पर्शियन गल्फ से लगा हुआ। यूनेस्को के संरक्षण में हैं।

जुंदिशापुर का इतना महत्व क्यों..?

जुंदिशापुर ऐतिहासिक महत्व का स्थान हैं। किसी जमाने में यहां विश्वविद्यालय हुआ करता था। गणित और खगोल शास्त्र का यहां अभ्यास होता था। शोध होते थे। उन दिनों इरान में पारसी लोग थे। पारसी राजा थे। ये सारे ज्ञान के पूजक थे। हमारे देश में जब तक्षशिला पर हूणों के आक्रमण हो रहे थे, उन दिनों ईरान के राजा शापुरजी (प्रथम) ने यहां पर विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।

*किंतु इस जुंदिशापुर की एक और विशेषता हैं। इस विश्वविद्यालय पर भारतीय विद्वानों का गहन प्रभाव था। यहां अनेक भारतीय आचार्य विद्यादान करते थे। तीसरी शताब्दी से इस्लामी आक्रमण होने तक, अर्थात सातवीं शताब्दी तक, यह विश्वविद्यालय फलताफूलता रहा। छठवीं शताब्दी के पारसी राजा खोसरोव (प्रथम) ने इस विश्वविद्यालय को और सशक्त किया। अनेक नए पाठ्यक्रम प्रारंभ करने के लिए आचार्यों को प्रोत्साहित किया। आयुर्वेद, शरीरशास्त्र, खगोल शास्त्र, गणित आदि विषयों का यहा विस्तृत अभ्यास होता था। यह विश्वविद्यालय, संस्कृत के ग्रंथों को पहलवी और अरबी भाषाओं में अनुवाद करने का केंद्र था। अनेक आयुर्वेदिक ग्रंथों का मध्य पर्शियन (पहलवी) भाषा में अनुवाद किया गया।
पंचतंत्र का अनुवाद, ‘कलिला वा दिमनाके नाम से हुआ जो उन दिनों अत्यंत लोकप्रिय था। उन दिनों पारसी प्राध्यापक बोर्झुया, जो जीव विज्ञान / शरीर शास्त्र / आयुर्वेद का अध्यापन कर रहे थे, उन्होंने भारत का भ्रमण करके, अनेक भारतीय ग्रंथों का संग्रह किया था।

आर्यभट्ट और ब्रह्मगुप्त की पुस्तकों का जुंदिशापुर विश्वविद्यालय में अध्यापन

जुंदिशापुर के इस विश्वविद्यालय में आर्यभट्ट और ब्रह्मगुप्त की पुस्तकों का अध्यापन होता था। बाद में इन पुस्तकों का अरबी और पहलवी भाषा में भी अनुवाद हुआ।

प्राचीन पर्शियन ग्रंथों में, अनेकों बार भारतीय विद्वानों का, उनकी पुस्तकों का उल्लेख आता हैं। पर्शिया (प्राचीन ईरान) में इस्लामी शासन आने के बाद भी भारतीय प्रभाव बना रहा। पर्शिया के प्रख्यात गणितज्ञ अलख्वारिझ्मी ने भारतीय अंकगणित पर एक पुस्तक लिखी, जो आने वाले सैकड़ो वर्षों तक, ईरान मे गणितीय अध्ययन का आधार ग्रंथ रही।

अल् बरूनी (वर्ष 973 – वर्ष 1048) का तो अनेकों बार उल्लेख आता हैं। यह महमूद गजनी के साथ भारत आए। यहां की विद्वत्ता देखकर आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने संस्कृत का गहन अध्ययन किया।किताबउलहिंदनाम की पुस्तक लिखी, जिसमें भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रशंसा की हैं।तारीखअलहिंद‘ (भारत का इतिहास) यह उनकी भारतीय संस्कृति पर लिखी पुस्तक हैं।

वराहमिहिर और ईरान के जुंदिशापुर का रिश्ता

वराहमिहिर (वर्ष 505 – वर्ष 587) उज्जैन में खगोल शास्त्र और गणित के विद्वान के रूप में प्रस्थापित हो रहे थे। उन्ही दिनों पर्शिया (ईरान) के राजा खोसरोवप्रथम (वर्ष 531 – वर्ष 579), जुंदिशापुर को नया और विस्तारित रूप देने का प्रयास कर रहे थे। वराहमिहिर की ख्याति सुनकर, खोसरोव (प्रथम) ने उन्हें जुंदिशापुर आमंत्रित किया। वराहमिहिर ने जुंदिशापुर में खगोलीय वेधशाला स्थापित की। वहां के अध्यापकों को खगोल शास्त्र और गणित के बारे में नई जानकारी दी।

बाद में भारत लौटकर, वराहमिहिर ने भिन्नभिन्न देश की खगोलीय संकल्पनाओं पर आधारितपंच सिद्धांतिकाकी रचना की। यह पांच सिद्धांत थे

सूर्यसिद्धांत           भारतीय

वशिष्ठसिद्धांत        भारतीय

पितामहसिद्धांत     प्राचीन भारत

पौलिसासिद्धांत     ग्रीक (यूनानी)

रोमिकासिद्धांत      रोमन

इसका अर्थ स्पष्ट हैं, हमारे पूर्वज, हमारे पुरखे, अन्य देशों की ज्ञान परंपरा का सम्मान करते थे। उनका अध्ययन करते थे। वह कभी भी कूपमंडूक नहीं रहे।

भारतीय ज्ञान ईरान के रास्ते बग़दाद (बैतअलहिकमा’) और यूरोप पहुँचा

वर्ष 651 में, पर्शिया पर अरबों का आक्रमण हुआ। तब तक अरब, मुस्लिम बन गए थे। उन्होंने पर्शिया से पारसी लोगों को भगाया (उनमें से कुछ लोगों ने भारत में आश्रय लिया)। बाद में जुंदिशापुर तथा अन्य स्थानों के प्राध्यापक और विद्वानों ने बगदाद की ओर रुख किया। अगले सौडेढ़ सौ वर्षों में, बगदाद के खलीफा हारूनअलरशीद नेज्ञान का घर‘ (House of Wisdom. अरबी भाषा में – ‘बैतअलहिकमा‘) संस्थान खड़ा किया। इस पुस्तकालय / अनुसंधान केंद्र में, बड़े पैमाने पर अनुवाद का काम होता था। अनुवाद भी किसका? भारतीय ग्रंथों का, संस्कृत ग्रंथों का।

बाद में इटली के सिसिली और तोलेडो में इन अरबी ग्रंथों का लैटिन भाषा में अनुवाद किया गया। भारत का ज्ञान यूरोप पहुंचा, वो इस रास्ते से भी।

छठवीं से दसवीं शताब्दी के बीच अनेक भारतीय विद्वानों के ग्रंथों का अरबी में अनुवाद हुआ। इनमें आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, सुश्रुत आदि प्रमुख थे। ब्रह्मगुप्त केसिद्धांतका अरबी में अनुवादसिंधिंद‘ (Sindhind) नाम से हुआ। सुश्रुत की पुस्तक को अरबी मेंकिताबसुसरुदकहा गया।

पर्शिया पर इस्लाम मानने वाले अरबों का शासन आने के बाद भी, वे अरब भारत की ज्ञान परंपरा का अत्यंत सम्मान करते थे। हारूनअलरशीद ने अपने अधिकारियों को भारत के विश्वविद्यालयों में जाकर, प्रतिभावान छात्रों को पर्शिया (प्राचीन ईरान) में लाने का प्रयास करने के लिए कहा था। संभवत: यह विश्व का पहलाकैंपस इंटरव्यूथा..!

हारूनअलरशीदी की अपील पर अनेक प्रतिभावान भारतीय छात्र बगदाद गए। उनमें से अधिकतर, संस्कृत के विद्वान थे, जिन्होंने अनेक संस्कृत ग्रंथों का अरबी भाषा में अनुवाद किया।मनकाजैसा प्रसिद्ध राजवैद्य भी पर्शिया आया था। उसने सुश्रुत, चरक समवेत अनेक विद्वानों के संस्कृत ग्रंथों को अरबी में प्रस्तुत किया।

प्राचीन पर्शियन विद्वान अलजाहिज  (776 – 868) ने भारतीयों के बारे में लिख रखा है

‘The Indians are distinguished in the sciences of astronomy arithmetic and medicine.’

(भारतीय लोक, खगोल विज्ञान, अंक गणित और चिकित्सा के क्षेत्र में विशिष्ट स्थान रखते हैं)

दसवीं शताब्दी के ईरान के अलमसूरी ने लिखा है

‘Among the nations, the Indian excel in astronomy and mathematics.’

(अन्य देशों की तुलना में भारतीय, खगोल विज्ञान और गणित में उत्कृष्ट हैं)

ग्यारहवीं शताब्दी के अलबरूनी (973 – 1048) की पुस्तक, ‘किताबअलहिंद‘, भारतीयों के प्रशंसा से भरी पड़ी है वे लिखते हैं

‘The Hindus are very skilled in the science of numbers and calculations.’

(हिंदू, गणित और गणना विज्ञान में अत्यधिक कुशल हैं)

वे आगे लिखते हैं

‘The Hindu possess a great deal of scientific knowledge, particularly in astronomy, mathematics and the calculation of eclipses.’

(हिंदुओं के पास वैज्ञानिक ज्ञान का एक बड़ा भंडार हैं। विशेष रूप से खगोल विज्ञान, गणित और ग्रहणों की गणना का!)

संक्षेप में, आज का ईरान जब पर्शिया था, पारसी राजाओं की छत्रछाया में फलफूल रहा था, तब भारतीय विद्वानों को पर्शिया में बड़ा सम्मान था। उन्हें आदर पूर्वक पर्शिया बुलाया जाता था। वराहमिहिर ने पारसी राजा के अनुरोध पर वेधशाला और खगोलीय गणना केंद्र स्थापित किए। अनेक महत्वपूर्ण भारतीय ग्रंथों का पहलवी और अरबी भाषा में अनुवाद हुआ। यह श्रृंखला, पर पर्शिया पर मुस्लिम अरबों के कब्जे के बाद भी, ग्यारहवीं / बारहवीं शताब्दी तक चलती रही। बाद में, जब भारत पर ही मुस्लिम आक्रांता शासन करने लगे, तो भारतीयों के प्रति सम्मान जाता रहा और पर्शिया ने भारत के विद्वानों को बुलाने की प्रथा / परंपरा समाप्त की..

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