14 मार्च 2005 को चीन ने ताइवान के खिलाफ एंटी-सेसेशन कानून पारित कर अलगाववाद रोकने की दी चेतावनी

14 मार्च 2005 का दिन एशिया की राजनीति में एक अहम मोड़ साबित हुआ। उस दिन चीन की संसद  नेशनल पीपल कांग्रेस ने एक अहम कानून पास किया, जिसे ऐंटी सेंशन लॉ कहा जाता है। इस कानून ने साफ कर दिया।

चीन ने ताइवान के खिलाफ एंटी-सेसेशन कानून पारित कर अलगाववाद रोकने की दी चेतावनी

चीन ने ताइवान के खिलाफ एंटी-सेसेशन कानून पारित कर अलगाववाद रोकने की दी चेतावनी

14 मार्च 2005 का दिन एशिया की राजनीति में एक अहम मोड़ साबित हुआ। उस दिन चीन की संसद  नेशनल पीपल कांग्रेस ने एक अहम कानून पास किया, जिसे ऐंटी सेंशन लॉ कहा जाता है। इस कानून ने साफ कर दिया कि चीन किन परिस्थितियों में  ताइवान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई कर सकता है।

क्या हुआ उस दिन?

बीजिंग में संसद के 2,896 प्रतिनिधियों ने इस कानून के पक्ष में वोट दिया। किसी ने विरोध नहीं किया और सिर्फ दो लोगों ने मतदान से दूरी बनाई। यह कानून बहुत तेजी से पास किया गया, जिससे साफ था कि यह एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने के लिए लाया गया है।

कानून की सबसे अहम बात

इस कानून का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसका आर्टिकल 8 था। इसमें कहा गया कि अगर ताइवान स्वतंत्रता की घोषणा करता है, या ऐसी कोई बड़ी घटना होती है जिससे वह चीन से अलग हो सकता है, या अगर शांतिपूर्ण समाधान की सारी उम्मीदें खत्म हो जाती हैं—तो चीन “गैर-शांतिपूर्ण तरीकों” यानी सैन्य बल का इस्तेमाल कर सकता है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि इन शर्तों की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई। इसका मतलब यह है कि फैसला चीन खुद करेगा कि कब कार्रवाई करनी है।

चीन ने यह कानून क्यों बनाया?

उस समय ताइवान के राष्ट्रपति चीन सुई बीयान ताइवान की अलग पहचान को लेकर बयान दे रहे थे। चीन को लगा कि ताइवान स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा है। इसलिए उसने यह कानून बनाकर अपनी “लाल रेखा” तय कर दी।

ताइवान की प्रतिक्रिया

ताइवान में इस कानून के खिलाफ भारी विरोध हुआ। लाखों लोग सड़कों पर उतर आए। उन्होंने कहा कि वे अपने भविष्य का फैसला खुद करना चाहते हैं और चीन के दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

अमेरिका, जापान और यूरोपीय देशों ने चिंता जताई, लेकिन किसी ने सीधे तौर पर कड़ी निंदा नहीं की। यह कानून आज भी लागू है।

आज क्यों महत्वपूर्ण है?

यह कानून आज भी चीन-ताइवान तनाव की जड़ बना हुआ है। पिछले 20 सालों में दोनों के बीच हर सैन्य गतिविधि और तनाव इसी कानून से प्रभावित रहा है।

सरल शब्दों में, 14 मार्च 2005 वह दिन था जब चीन ने सिर्फ ताइवान पर दावा ही नहीं किया, बल्कि यह भी तय कर लिया कि जरूरत पड़ने पर वह उसे बलपूर्वक हासिल करने के लिए तैयार है।

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