आदिगुरू शंकराचार्य की कामरूप (असम) यात्रा, तांत्रिकों से शास्त्रार्थ और उन पर मारण मंत्र का प्रयोग

अपनी असम यात्रा के दौरान आदिगुरू ने प्रख्यात तांत्रिक अभिनव गुप्त के साथ शास्त्रार्थ किया था, जिसमें उसकी हार हुई थी

आदिगुरू शंकराचार्य

आदिगुरू शंकराचार्य की कामरूप यात्रा की कथा माधवाचार्य द्वारा रचित ‘श्री शंकर दिग्विजय’ नामक ग्रंथ में वर्णित है

यह कथा संत श्री माधवाचार्य द्वारा रचितश्री शंकर दिग्विजयनामक ग्रंथ से ली गई है। गुरुदेव श्री गोविंद भगवत्पाद जी के आश्रम में शिक्षा पूर्ण होने के बाद उन्होंने शंकराचार्य जी को काशी जाने का आदेश दिया। उस समय शंकराचार्य जी बालक ही थे और काशी विद्वानों का प्रमुख केंद्र था, इसलिए वहाँ एक बालक विद्वान के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त करना आसान नहीं था। काशी पहुँचकर शंकराचार्य जी ने देखा कि वहाँ बौद्ध और तंत्रमार्गी प्रभाव के कारण वैदिक दर्शन का प्रभाव कम हो गया था और कई विद्वान अप्रमाणिक ग्रंथों के विचारों को ही सत्य मान रहे थे। तब उन्हें समझ में आया कि गुरुदेव ने उन्हें काशी क्यों भेजा था। उनका उद्देश्य अद्वैत दर्शन का प्रचार करना था, और इसकी शुरुआत के लिए काशी से उत्तम स्थान कोई नहीं था।
शीघ्र ही उनकी प्रभावशाली वाणी से काशी में अद्वैत दर्शन का प्रचार होने लगा। अवैदिक सिद्धांतों का खंडन हुआ और अनेक लोग उनके शिष्य बनने लगे। उनके प्रथम शिष्य चोल देश के सनंदन थे। समय के साथ उनकी शिष्य मंडली बढ़ती गई। इसी दौरान भगवान विश्वनाथ ने चांडाल रूप में उन्हें दर्शन देकर ज्ञान प्रदान किया, जिससे उनके जीवन में कथनी और करनी का अंतर समाप्त हुआ।

आदि शंकराचार्य का बद्रीनाथ आगमन
इसके बाद शंकराचार्य जी काशी छोड़कर एकांत में ग्रंथों का गहन अध्ययन करने हेतु ऋषिकेश होते हुए बद्रीनाथ पहुँचे। वहाँ व्यास गुफा में चार वर्षों तक निवास करते हुए उन्होंने ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता और उपनिषदों पर प्रामाणिक भाष्य लिखे। उनके प्रथम शिष्य सनंदन ने इन भाष्यों को कंठस्थ कर लिया। एक बार अलकनंदा नदी पार करते समय उनके पैरों के नीचे कमल प्रकट हुए, जिसे देखकर शंकराचार्य जी ने उनका नाम पद्मपाद रख दिया, और वे इसी नाम से प्रसिद्ध हो गए।

जब शंकराचार्य जी 16 वर्ष के हुए, तब उनके जीवन में मृत्यु योग बताया गया था। उसी समय एक अद्भुत घटना घटी। सप्त चिरंजीवियों में से एक वेदव्यास जी वृद्ध ब्राह्मण के वेश में उनके पास आए और उनके ब्रह्मसूत्र भाष्य पर शास्त्रार्थ करने लगे। यह शास्त्रार्थ सात दिनों तक चला, पर उस वृद्ध ब्राह्मण के तर्क समाप्त नहीं हुए। अंत में शंकराचार्य जी ने अपने शिष्य पद्मपाद से उस वृद्ध को हटाने को कहा। पद्मपाद ने अपनी बुद्धि से पहचान लिया कि वह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, बल्कि स्वयं वेदव्यास जी हैं। वे दुविधा में पड़ गए कि एक ओर गुरु शंकराचार्य हैं और दूसरी ओर स्वयं वेदव्यास जी, ऐसी स्थिति में क्या किया जाए।

               शंकराचार्य जी ने ध्यान लगाकर उस वृद्ध का वास्तविक स्वरूप पहचान लिया और उनकी स्तुति की। उन्होंने विनम्रतापूर्वक कहा कि उन्होंने अपना कर्तव्य पूरा कर लिया है और अब शरीर त्याग करना चाहते हैं। इस पर वेदव्यास जी ने कहा कि अभी उनका कार्य पूर्ण नहीं हुआ है। उन्हें पूरे भारत का भ्रमण कर अद्वैत वेदांत का प्रचार करना है और ज्ञान की ज्योति से देश को पुनः प्रकाशित करना है। इतना कहकर वेदव्यास जी ने शंकराचार्य जी की आयु 16 वर्ष और बढ़ा दी तथा आशीर्वाद देकर अंतर्धान हो गए।

आदिगुरु शंकराचार्य की कामरूप (असम) यात्रा, तांत्रिकों से शास्त्रार्थ व उन पर मारण मंत्र का प्रयोग 

शास्त्रार्थ की दिग्विजय यात्रा के दौरान आदि गुरु शंकराचार्य कामरूप प्रदेश पहुँचे। प्राचीन काल में कामरूप (वर्तमान असम) तांत्रिकों, अघोरियों और वाममार्गी साधकों की प्रमुख साधनास्थली माना जाता था। उस समय वहाँ वज्रयान बौद्धों का प्रभाव भी बढ़ा हुआ था। कामरूप पहुँचकर शंकराचार्य ने वहाँ के तांत्रिकों को शास्त्रार्थ की खुली चुनौती दी। कई साधक उनसे शास्त्रार्थ करने आए, पर कोई भी उनके सामने टिक नहीं सका। तब तांत्रिकों ने अपने सबसे प्रसिद्ध तांत्रिक अभिनव गुप्त को शास्त्रार्थ के लिए भेजा। निर्धारित समय पर शास्त्रार्थ आरंभ हुआ। शंकराचार्य के गहन ज्ञान और तर्कशक्ति के सामने धीरेधीरे अभिनव गुप्त के तर्क कमजोर पड़ने लगे और अंततः उसे अपनी हार स्वीकार करनी पड़ी। परंतु वह मन से कपटी था। उसने बाहर से विनम्रता दिखाते हुए शंकराचार्य के चरण पकड़ लिए और स्वयं को उनका शिष्य बनाने का आग्रह किया।

                 आदि गुरु ने उसकी विनती स्वीकार कर ली और उसे शिष्य बना लिया। परंतु अभिनव गुप्त के मन में छल था। उसने गुप्त रूप से शंकराचार्य के शरीर से संबंधित कुछ वस्तुएँ प्राप्त कर लीं, जो तांत्रिक प्रयोगों के लिए आवश्यक मानी जाती थीं। इसके बाद उसने उन पर एक मारण तंत्र का प्रयोग किया। इस तांत्रिक प्रयोग के प्रभाव से शंकराचार्य को एक गंभीर रोग—’खूनी भगंदर’ हो गया। उन्हें अत्यंत पीड़ा और रक्तस्राव होने लगा, परंतु उन्होंने अपने कष्ट को प्रकट नहीं किया। उनके शिष्य यह देखकर अत्यंत चिंतित हुए और उपचार के लिए वैद्यों को बुलाने की अनुमति माँगी। शंकराचार्य ने पहले कहा कि रोग दो प्रकार के होते हैंएक कर्मजनित और दूसरा शरीरजनित। शरीरजनित रोग का उपचार औषधि से संभव है, जबकि कर्मजनित रोग भोग से ही समाप्त होते हैं। उन्हें लगता था कि उनका रोग कर्मजनित है, इसलिए उपचार से लाभ नहीं होगा।

                   फिर भी शिष्यों के आग्रह पर दूरदूर से श्रेष्ठ वैद्य बुलाए गए, पर किसी औषधि से रोग में सुधार नहीं हुआ। तब भगवान शिव की प्रेरणा से अश्विनी कुमार दो मुनियों के वेश में वहाँ आए। उन्होंने बताया कि यह कोई सामान्य रोग नहीं, बल्कि अभिचार (तांत्रिक) प्रयोग का परिणाम है, जिसका उपचार मंत्र से ही संभव है। यह सुनकर शंकराचार्य के प्रमुख शिष्य पद्मपाद अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने गुरु से अनुमति माँगी कि वे प्रतिअभिचार मंत्र का प्रयोग कर इस तांत्रिक प्रभाव को समाप्त करेंगे। पहले गुरु ने उन्हें रोका, क्योंकि इससे उस व्यक्ति की मृत्यु हो सकती थी जिसने यह प्रयोग किया था। परंतु अंततः शिष्यों के आग्रह पर उन्होंने पद्मपाद को आशीर्वाद दे दिया।

                   पद्मपाद ने एकांत में बैठकर सात्विक ओंकार मंत्र का जाप प्रारंभ किया। उनके मंत्र के प्रभाव से तांत्रिक प्रयोग का असर उलट गया। धीरेधीरे शंकराचार्य का स्वास्थ्य सुधरने लगा और वही रोग अभिनव गुप्त को हो गया। अंततः वह उसी रोग से पीड़ित होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ। शंकराचार्य पूर्णतः स्वस्थ हो गए और उनके शिष्यों में अत्यंत हर्ष छा गया। इसके बाद उन्होंने वहाँ के राजा से भेंट की और अपनी दिग्विजय यात्रा को आगे बढ़ाते हुए अन्य प्रदेशों की ओर प्रस्थान किया।

(डा. आलोक कुमार द्विवेदी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शनशास्ञ में पीएचडी हैं। वर्तमान में वह KSAS, लखनऊ में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। यह संस्थान अमेरिका स्थित INADS, USA का भारत स्थित शोध केंद्र है। डा. आलोक की रुचि दर्शन, संस्कृति, समाज और राजनीति के विषयों में हैं।)

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