PM मोदी का राष्ट्र के नाम संबोधन: ‘विपक्ष ने नारी शक्ति के सपनों की भ्रूण हत्या की’, महिला आरक्षण बिल गिरने पर छलका प्रधानमंत्री का दर्द

भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जो दशकों तक याद रखे जाते हैं। लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़ा '131वां संविधान संशोधन विधेयक' गिरना एक ऐसी ही घटना बन गई है

PM मोदी का राष्ट्र के नाम संबोधन

भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जो दशकों तक याद रखे जाते हैं। लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़ा ‘131वां संविधान संशोधन विधेयक’ गिरना एक ऐसी ही घटना बन गई है। इस विधायी विफलता के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया। उनके शब्दों में गहरी पीड़ा, विपक्ष के प्रति तीखा आक्रोश और देश की करोड़ों महिलाओं के प्रति संवेदना साफ झलक रही है। प्रधानमंत्री ने इस घटना को केवल एक बिल का गिरना नहीं, बल्कि भारत की नारी शक्ति के बढ़ते कदमों को रोकने की एक ‘साजिश’ करार दिया। उन्होंने सीधे शब्दों में कहा कि विपक्ष ने अपनी स्वार्थी राजनीति की वेदी पर देश की माताओं-बहनों के ईमानदारी भरे प्रयास की ‘भ्रूण हत्या’ कर दी है।

‘नारी शक्ति की उड़ान को बेरहमी से कुचला गया’

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन की शुरुआत बहुत ही भावुक अंदाज में की। उन्होंने कहा कि एक प्रधानसेवक के रूप में, जब देश की आधी आबादी के हक की बात आती है, तो सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं था, बल्कि यह करोड़ों महिलाओं के उस भरोसे का प्रतीक था कि वे भी नीति-निर्धारण में समान भागीदार बन सकती हैं। पीएम मोदी ने कहा, “कल देश की करोड़ों महिलाओं की नजरें संसद की ओर टकटकी लगाए देख रही थीं। वे उम्मीद कर रही थीं कि उनके सपनों को एक नई उड़ान मिलेगी। लेकिन बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि विपक्ष ने उनके उन सपनों को बेरहमी से कुचल दिया।” प्रधानमंत्री का यह बयान उस कड़वी हकीकत को बयां कर रहा था, जहां बहुमत के बावजूद तकनीकी कारणों से एक ऐतिहासिक सुधार रुक गया।

संसद के भीतर का वो ‘शर्मनाक’ दृश्य और 54 वोटों का अंतर

प्रधानमंत्री ने सदन के भीतर हुए मतदान के आंकड़ों और उसके बाद की परिस्थितियों पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि इस संशोधन को पारित करने के लिए 528 उपस्थित सदस्यों में से दो-तिहाई यानी 352 वोटों की जरूरत थी। सरकार के पक्ष में 298 वोट पड़े, लेकिन महज 54 वोटों की कमी ने इस बिल के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। पीएम मोदी ने विशेष रूप से उस क्षण का जिक्र किया जब बिल गिरने के बाद विपक्षी बेंचों पर उत्साह देखा गया। उन्होंने कहा, “जब नारी हित का प्रस्ताव गिरा, तब विपक्ष के कुछ लोग तालियां बजा रहे थे, मेज थपथपा रहे थे। यह सिर्फ मेज थपथपाना नहीं था, बल्कि भारत की नारी के स्वाभिमान और उसके आत्मसम्मान पर किया गया एक गहरा प्रहार था।”

विपक्ष पर सीधा प्रहार: ‘स्वार्थ की राजनीति और सजा का संकल्प’

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी और समाजवादी पार्टी का नाम लेकर उन पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि इन दलों के लिए ‘दलहित’ हमेशा ‘देशहित’ से ऊपर रहा है। पीएम मोदी ने आरोप लगाया कि इन पार्टियों ने न केवल आज की महिलाओं का अपमान किया है, बल्कि बाबा साहेब अंबेडकर और हमारे संविधान निर्माताओं की उन भावनाओं का भी अपमान किया है जो समानता के पक्षधर थे। उन्होंने देश को आगाह करते हुए कहा कि नारी शक्ति का अपमान करने वाले इन दलों को आने वाले समय में जनता, विशेषकर देश की महिलाएं, कड़ा सबक सिखाएंगी। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि जब-जब नारी की शक्ति को ललकारा गया है, तब-तब अधर्म का नाश हुआ है।

माताओं-बहनों से क्षमा याचना और भविष्य का संकल्प

एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए प्रधानमंत्री ने देश की सभी माताओं और बहनों से हाथ जोड़कर क्षमा मांगी। उन्होंने कहा, “मैं आप सभी से क्षमा प्रार्थना करता हूं कि हमारी सरकार की पूरी निष्ठा के बावजूद, यह प्रयास इस बार सफल नहीं हो पाया। लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मोदी हार मानने वालों में से नहीं है।” प्रधानमंत्री ने संकेत दिया कि सरकार इस बिल को पास कराने के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशेगी। उन्होंने तमिलनाडु की अपनी रैली का जिक्र करते हुए दोहराया कि एनडीए गठबंधन इस लक्ष्य के प्रति समर्पित है और महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए कूटनीतिक और संवैधानिक, दोनों मोर्चों पर संघर्ष जारी रखेगा।

राजनीति बनाम अधिकार’ की नई जंग

प्रधानमंत्री मोदी के इस संबोधन ने देश के राजनीतिक विमर्श को एक नई दिशा दे दी है। अब यह लड़ाई केवल संसद की नहीं, बल्कि जन-अदालत की बन गई है। एक तरफ जहां भाजपा की महिला सांसद संसद के मकर द्वार पर प्रदर्शन कर रही हैं, वहीं प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे को सीधे जनता के बीच ले जाकर विपक्ष को कठघरे में खड़ा कर दिया है। 2026 के इस राजनीतिक घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले चुनावों में ‘महिला आरक्षण’ और ‘विपक्ष का अवरोध’ सबसे बड़े चुनावी मुद्दे बनने जा रहे हैं। प्रधानमंत्री का यह संबोधन केवल एक भाषण नहीं था, बल्कि नारी शक्ति को एकजुट करने का एक शंखनाद था।

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