चीन को ‘कैंसर’ बताने पर घिरीं ईयू प्रमुख कैलस, बयान बना वैश्विक कूटनीतिक विवाद

चीन के साथ यूरोप की आर्थिक चुनौती की तुलना ऐसे “कैंसर” से की, जिसके लिए “अस्थायी राहत” नहीं बल्कि “कीमोथेरेपी” जैसे कठोर इलाज की जरूरत है।

कैंसर’ बताने पर घिरीं ईयू प्रमुख कैलस

कैंसर’ बताने पर घिरीं ईयू प्रमुख कैलस

यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काया कैलस एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई हैं, जब उन्होंने चीन के साथ यूरोप की आर्थिक चुनौती की तुलना ऐसे “कैंसर” से की, जिसके लिए “अस्थायी राहत” नहीं बल्कि “कीमोथेरेपी” जैसे कठोर इलाज की जरूरत है।

एस्टोनिया में आयोजित वार्षिक लेनार्ट मेरी कॉन्फ्रेंस के दौरान दिए गए इस बयान ने बीजिंग के प्रति यूरोपीय कूटनीति की भाषा और दिशा को लेकर नई बहस छेड़ दी है। साथ ही इसने यूरोपीय संघ के बढ़ते भू-राजनीतिक प्रभाव पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

तालिन में बोलते हुए कैलस ने कहा कि चीन के साथ यूरोप के संबंधों में गहरे संरचनात्मक संकट मौजूद हैं, खासकर उन मुद्दों पर जिन्हें उन्होंने दबाव वाली आर्थिक नीतियां, औद्योगिक अति-उत्पादन और बैटरी, केमिकल, शिपबिल्डिंग तथा कच्चे माल जैसे क्षेत्रों में अनुचित प्रतिस्पर्धा बताया। मेडिकल उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यूरोप के सामने अब कठिन फैसला लेने की स्थिति है।

उन्होंने कहा,
“अगर आपको बहुत गंभीर बीमारी है, अगर कैंसर है, तो आपके पास दो विकल्प हैं। या तो मॉर्फीन बढ़ाते रहिए, या फिर कीमोथेरेपी शुरू कीजिए।”

कैलस का संकेत इस ओर था कि यूरोप को केवल सब्सिडी देकर अपनी कंपनियों को बचाने की बजाय चीन के खिलाफ अधिक कठोर आर्थिक और औद्योगिक कदम उठाने चाहिए।

इस बयान के तुरंत बाद राजनीतिक विश्लेषकों और पर्यवेक्षकों ने आलोचना शुरू कर दी। उनका कहना है कि ऐसी भाषा यूरोप के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक चीन को नाराज कर सकती है, खासकर ऐसे समय में जब यूरोपीय संघ अमेरिका के साथ बिगड़ते संबंधों के बीच अपने अंतरराष्ट्रीय समीकरणों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है।

चीन के साथ संतुलन बनाने की कोशिश में यूरोप

कैलस की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब यूरोपीय संघ रणनीतिक अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। डोनाल्ड ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी के बाद ट्रांस-अटलांटिक व्यापारिक तनाव बढ़ने की खबरें हैं, जिसके चलते यूरोपीय नेताओं को अपने आर्थिक साझेदारियों पर दोबारा विचार करना पड़ रहा है।

हाल के महीनों में फ्रांस समेत कई यूरोपीय देशों ने बीजिंग के साथ रिश्ते स्थिर करने की कोशिश की है। फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने चीन के साथ मजबूत संवाद की वकालत की है और कहा है कि आर्थिक दबावों तथा भू-राजनीतिक विखंडन के दौर में यूरोप को रणनीतिक स्वायत्तता की जरूरत है।

आलोचकों का कहना है कि कैलस की बयानबाजी इन कूटनीतिक प्रयासों के विपरीत दिखाई देती है। कई विश्लेषकों ने चेतावनी दी कि इस तरह की उत्तेजक तुलना चीन के साथ व्यापारिक संबंध सुधारने की कोशिशों को नुकसान पहुंचा सकती है।

प्रो-चीन राजनीतिक टिप्पणीकार अर्नो बर्ट्रेंड समेत कई लोगों ने सवाल उठाया कि चीन को अस्तित्वगत खतरे के रूप में पेश करना कितना तार्किक है। उनका कहना है कि विनिर्माण और तकनीक में चीन की बढ़त मुख्य रूप से उसकी आर्थिक संरचना और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता का परिणाम है, न कि किसी दुर्भावनापूर्ण रणनीति का।

विवादित बयानों का पुराना इतिहास

यह पहला मौका नहीं है जब कैलस अपने तीखे बयानों को लेकर विवादों में आई हों। यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख बनने के बाद से उन्होंने रूस और चीन दोनों के खिलाफ बेहद सख्त रुख अपनाया है और लगातार कड़े कदमों की वकालत की है।

उनके आलोचकों का कहना है कि इस रवैये ने यूरोप की कूटनीतिक कोशिशों को जटिल बना दिया है। रूस पहले भी संकेत दे चुका है कि वह यूक्रेन युद्ध को लेकर कैलस के साथ सीधे बातचीत करने में रुचि नहीं रखता। क्रेमलिन के अधिकारियों ने उन पर मॉस्को के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाया है।

2025 में भी कैलस विवादों में आई थीं, जब उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में नाजी जर्मनी की हार में रूस और चीन की भूमिका को लेकर टिप्पणी की थी। मॉस्को ने इसे सोवियत बलिदानों को कमतर आंकने वाला बयान बताया था।

रूस के पर्यटन पर प्रतिबंध लगाने और रूस को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटने जैसे पुराने बयानों ने भी विवाद बढ़ाया था।

जोसेप बोरेल के “गार्डन और जंगल” विवाद की याद

कैलस के हालिया बयान ने उनके पूर्ववर्ती जोसेप बोरेल के 2022 के “गार्डन और जंगल” भाषण की याद भी ताजा कर दी।

उस भाषण में बोरेल ने यूरोप को समृद्धि और स्थिरता का “गार्डन” बताया था, जबकि दुनिया के बाकी हिस्सों को “जंगल” कहा था, जो यूरोप के लिए खतरा बन सकता है। इस बयान पर यूरोसेंट्रिक और औपनिवेशिक सोच के आरोप लगे थे। संयुक्त अरब अमीरात समेत कई देशों ने इसका विरोध किया था।

बाद में बोरेल ने सफाई देते हुए कहा था कि उनके बयान को गलत समझा गया और उसमें किसी नस्लीय या औपनिवेशिक सोच का इरादा नहीं था।

हालांकि आलोचकों का मानना है कि दोनों घटनाएं ब्रसेल्स की नीतियों में मौजूद उस मानसिकता को उजागर करती हैं, जिसमें यूरोप खुद को असाधारण मानता है और यही सोच उभरती वैश्विक शक्तियों के साथ उसके संबंधों में बाधा बनती है।

क्या यूरोप अपना वैश्विक प्रभाव खो रहा है?

कैलस के बयान को लेकर छिड़ी बहस अब एक बड़े भू-राजनीतिक सवाल से जुड़ गई है — क्या यूरोप धीरे-धीरे वैश्विक राजनीति में अपना प्रभाव खो रहा है?

हाल के कूटनीतिक घटनाक्रम, खासकर रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म कराने की कोशिशों ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस संघर्ष से सबसे ज्यादा प्रभावित होने के बावजूद यूरोपीय संघ कई अहम वार्ताओं में केंद्रीय भूमिका बनाए रखने में संघर्ष करता दिखाई दिया है।

इसी दौरान उन्नत विनिर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों और औद्योगिक सप्लाई चेन में चीन की तेज प्रगति ने यूरोप की पारंपरिक आर्थिक बढ़त को चुनौती दी है।

विश्लेषकों के अनुसार यूरोप के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह घरेलू उद्योगों की रक्षा भी करे और ऐसी कूटनीतिक टकराव वाली भाषा से भी बचे, जो उसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों से दूर कर सकती है।

कैलस के समर्थकों का कहना है कि उनका सख्त रवैया यूरोप की कमजोरियों और विदेशी सप्लाई चेन पर बढ़ती निर्भरता को लेकर यथार्थवादी चेतावनी है। वहीं आलोचकों के अनुसार ऐसी बयानबाजी यूरोप की कूटनीतिक विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकती है, खासकर उस समय जब व्यावहारिक संवाद की सबसे ज्यादा जरूरत है।

जैसे-जैसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है, कैलस का यह विवाद ब्रसेल्स के सामने खड़े बड़े सवाल को उजागर करता है — क्या यूरोप आर्थिक हितों, कूटनीतिक रणनीति और वैचारिक स्थिति के बीच संतुलन बनाते हुए बहुध्रुवीय दुनिया में अपनी प्रमुख भूमिका बनाए रख पाएगा?

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