मिथिलांचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, भाषाई गौरव और सदियों पुरानी पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व सम्मान मिला है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत मैथिली भाषा को अपने आधिकारिक पाठ्यक्रम में शामिल करने का बड़ा फैसला किया है। आगामी शैक्षणिक सत्र 2026-27 से सीबीएसई के स्कूलों में कक्षा 1 से लेकर माध्यमिक (नौवीं-दसवीं) स्तर तक मैथिली को मातृभाषा और एक स्वतंत्र विषय के रूप में पढ़ाया जाएगा। केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी द्वारा दरभंगा के सांसद गोपाल जी ठाकुर को भेजे गए आधिकारिक पत्र से इस ऐतिहासिक निर्णय का खुलासा हुआ है। इस फैसले के बाद पूरे बिहार, विशेषकर मिथिला क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई है।
आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का मजबूत माध्यम
बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस निर्णय का पुरजोर स्वागत करते हुए इसे मिथिला की सांस्कृतिक अस्मिता के लिए एक बड़ा मील का पत्थर बताया है। शिक्षाविदों का मानना है कि यह कदम आने वाली युवा पीढ़ियों को अपनी समृद्ध मातृभाषा, कालजयी साहित्य और प्राचीन जड़ों से जोड़ने का एक बेहद मजबूत माध्यम बनेगा। लंबे समय से राष्ट्रीय स्तर के स्कूलों में मैथिली को स्थान देने की मांग की जा रही थी, जिसे नई शिक्षा नीति के मातृभाषा आधारित शिक्षण के सिद्धांत के तहत अब पूरा कर लिया गया है।
लालकृष्ण आडवाणी की पहल और अटल सरकार की मुहर
मैथिल समाज के लिए इस भाषाई अधिकार की लड़ाई सदियों पुरानी है। साल 2003 में तत्कालीन एनडीए (NDA) सरकार के समय देश के उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने मैथिली के भाषाई महत्व को समझा और इसे संविधान की मुख्य धारा में लाने की पुरजोर पहल की थी। इसके बाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए मैथिली को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने पर अंतिम मुहर लगाई थी। वाजपेयी सरकार के उसी फैसले के कारण मैथिली को एक संवैधानिक भाषा का दर्जा प्राप्त हुआ, जिससे आज सीबीएसई जैसी राष्ट्रीय संस्था में इसके लिए रास्ते खुले हैं।
संविधान दिवस पर जारी हुआ मैथिली संस्करण
इन पहलों के साथ ही मैथिली भाषा को केवल आठवीं अनुसूची तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि अब भारतीय संविधान का आधिकारिक मैथिली संस्करण भी जारी किया जा चुका है। 26 नवंबर 2024 को संविधान दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने मैथिली और संस्कृत में भारतीय संविधान की प्रति का विमोचन किया था। इसे मिथिला की भाषा और सांस्कृतिक पहचान के लिए एक और ऐतिहासिक कदम माना गया।
हालांकि, यहाँ यह स्पष्ट कर दें कि यह “संविधान का आधिकारिक अनुवाद” है, लेकिन संविधान का प्रामाणिक विधिक पाठ (authoritative legal text) अभी भी हिंदी और अंग्रेजी ही माने जाते हैं। दरअसल, मैथिली संस्करण आम नागरिकों की भाषा में संविधान को समझाने और इसकी पहुंच जन-जन तक बढ़ाने के उद्देश्य से जारी किया गया है।
राष्ट्रीय पहचान के दौर में मैथिली भाषा की स्वर्णिम यात्रा
बहरहाल, अब नये दौर में भी मैथिली भाषा के उत्थान की स्वर्णिम यात्रा लगातार जारी है। सीबीएसई पाठ्यक्रम में मैथिली को शामिल करने का यह ताजा फैसला केवल एक शैक्षणिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह मिथिला की सांस्कृतिक अस्मिता, भाषाई गौरव और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने की दिशा में एक युगांतकारी कदम है। भारतीय संविधान के मैथिली संस्करण से लेकर नई शिक्षा नीति और अब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बढ़ती मौजूदगी तक, मैथिली भाषा अब राष्ट्रीय और वैश्विक पहचान के एक नए और समृद्ध दौर में प्रवेश कर चुकी है।
