दुनिया के सात अजूबों में शुमार और मोहब्बत की बेमिसाल निशानी ताजमहल को देखने के लिए हर साल दुनिया भर से लाखों लोग भारत आते हैं। जब भी कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष या बड़ा राजनयिक भारत के आधिकारिक दौरे पर आता है, तो आगरा जाकर सफेद संगमरमर की इस खूबसूरत इमारत के दीदार करना उसकी प्राथमिकताओं में शामिल होता है। हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो अपनी भारत यात्रा के दौरान अपनी पत्नी के साथ आगरा पहुंचे और ताजमहल के सामने डायना बेंच पर बैठकर एक बेहद साधारण सी और खूबसूरत तस्वीर खिंचवाई। लेकिन किसे पता था कि कूटनीति के दौर में एक साधारण सी सैलानी तस्वीर अंतरराष्ट्रीय विवाद की वजह बन जाएगी। मार्को रूबियो की इस फोटो के सोशल मीडिया पर सार्वजनिक होते ही ईरान ने इस पर एक ऐसा तीखा और कूटनीतिक तंज कस दिया, जिसने इतिहास, वास्तुकला, पहचान और आज की भू-राजनीति (Geopolitics) के बीच एक बड़ा वैचारिक महायुद्ध छेड़ दिया है।
अमेरिकी विदेश मंत्री का आगरा दौरा और वह ‘विवादास्पद’ तस्वीर
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों, रणनीतिक समझौतों और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा करने के लिए नई दिल्ली पहुंचे थे। अपनी इस व्यस्त और बेहद महत्वपूर्ण कूटनीतिक यात्रा के बीच उन्होंने थोड़ा समय निकाला और अपनी पत्नी के साथ ‘वर्ल्ड हेरिटेज साइट’ ताजमहल का दीदार करने आगरा पहुंचे। सफेद संगमरमर की इस अनूठी वास्तुकला को देखकर रूबियो दंपत्ति मंत्रमुग्ध नजर आया। उन्होंने ताजमहल के मुख्य गुंबद के ठीक सामने बने केंद्रीय चबूतरे पर बैठकर एक पारंपरिक फोटो खिंचवाई, जैसा कि अमूमन हर विदेशी वीआईपी मेहमान करता आया है।
मार्को रूबियो ने इस तस्वीर को भारत और अमेरिका के सांस्कृतिक जुड़ाव और भारत की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत के प्रति सम्मान के रूप में सोशल मीडिया पर साझा किया था। अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ओर से भी इस दौरे को सकारात्मक रूप में पेश किया गया। लेकिन जैसे ही यह तस्वीर डिजिटल दुनिया की स्क्रीन पर तैरने लगी, भारत से हजारों मील दूर बैठे ईरान की सरकार और उसके राजनयिकों ने इस पर गहरी नजर डाली। इसके बाद ईरान की तरफ से जो आधिकारिक प्रतिक्रिया आई, उसने इस खूबसूरत और शांत दिखने वाले माहौल को एक तीखे कूटनीतिक विवाद में तब्दील कर दिया।
हैदराबाद में ईरानी दूतावास का वह ट्वीट जिसने मचाई खलबली
जैसे ही मार्को रूबियो की तस्वीर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पहले ट्विटर) पर वायरल हुई, भारत के हैदराबाद में स्थित ईरानी महावाणिज्य दूतावास (Consulate General of Iran) के आधिकारिक हैंडल से एक बेहद कड़क और तीखा पोस्ट साझा किया गया। इस पोस्ट ने सीधे तौर पर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक समझ पर सवाल खड़े कर दिए।
ईरानी दूतावास ने अपने आधिकारिक बयान में लिखा:
“अगर रूबियो को इतिहास या वास्तुकला की थोड़ी सी भी समझ होती, तो वह यहाँ तस्वीर खिंचवाने के लिए कभी खड़े नहीं होते। यह ऐतिहासिक स्मारक एक मुगल सम्राट (शाहजहां) ने अपनी ईरानी मूल की प्रिय पत्नी (मुमताज महल) के प्रेम में बनवाया था। इतना ही नहीं, इस वैश्विक धरोहर को ईरानी वास्तुकारों और शिल्पकारों की बेजोड़ प्रतिभा ने आकार दिया था। यह बेहद विरोधाभासी है कि आज अमेरिकी सरकार उसी ईरानी सभ्यता को पूरी तरह से मिटा देने की धमकी देती है, उनके सांस्कृतिक स्थलों को निशाना बनाने की बात करती है और दूसरी प्राचीन सभ्यताओं का वैश्विक मंचों पर अपमान करती है।”
ईरानी दूतावास की इस टिप्पणी का सीधा और साफ संदेश था कि यदि मार्को रूबियो को यह पता होता कि जिस इमारत की खूबसूरती की वे तारीफ कर रहे हैं, उसकी आत्मा और निर्माण कला में उनके धुर विरोधी देश ‘ईरान’ का बहुत बड़ा योगदान है, तो शायद उनके कदम वहाँ जाने से हिचक जाते। इस ट्वीट ने रातों-रात कला के एक प्रतीक को वैश्विक राजनीति के अखाड़े में लाकर खड़ा कर दिया।
वास्तुकला के पन्नों में ताजमहल का ‘ईरानी और फारसी’ कनेक्शन
ईरान की इस आक्रामक प्रतिक्रिया के बाद अब यह समझना बेहद जरूरी हो जाता है कि आखिर ताजमहल के इतिहास में वह ‘ईरानी कनेक्शन’ कहाँ से आता है, जिसका दावा ईरान इतने आक्रामक तरीके से वैश्विक मंच पर कर रहा है। दरअसल, इतिहासकार इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि 17वीं शताब्दी में जब भारतीय उपमहाद्वीप पर मुगल साम्राज्य अपने चरम पर था, तब वह दुनिया का कोई अलग-थलग हिस्सा नहीं था। उस दौर में मध्य एशिया, फारस (जिसे आज हम ईरान कहते हैं) और भारत के बीच व्यापारिक, सांस्कृतिक, कलात्मक और कूटनीतिक संबंध बेहद गहरे थे।
मुगल राजाओं के दरबार में फारसी संस्कृति, भाषा और कला को बहुत ऊंचा स्थान प्राप्त था। जब मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी चहेती बेगम अर्जुमंद बानो बेगम (जिन्हें इतिहास मुमताज महल के नाम से जानता है) की याद में एक मकबरा बनाने का फैसला किया, तो उन्होंने दुनिया भर के बेहतरीन दिमागों और हाथों को आगरा में इकट्ठा किया। मुमताज महल खुद फारसी (ईरानी) मूल के एक रईस परिवार से ताल्लुक रखती थीं; वे जहांगीर की प्रसिद्ध बेगम नूरजहां की भतीजी और असफ खान की बेटी थीं। इस तरह ताजमहल जिसकी याद में बना, उसका सीधा संबंध ईरान की धरती से था।
वास्तुकला के दृष्टिकोण से, ताजमहल को शुद्ध रूप से सिर्फ भारतीय या सिर्फ इस्लामी इमारत नहीं कहा जा सकता। यह वास्तव में ‘इंडो-इस्लामिक’ और ‘इंडो-पर्शियन’ (भारतीय-फारसी) स्थापत्य शैली का सबसे परिपक्व और सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। ताजमहल की वास्तुकला में फारसी शैली के निम्नलिखित तत्व पूरी तरह स्पष्ट दिखाई देते हैं:
चारबाग शैली: बगीचे को चार समान भागों में विभाजित करने की यह अवधारणा पूरी तरह से पारंपरिक फारसी उद्यानों (Persian Gardens) से ली गई है।
विशाल मुख्य गुंबद : ताजमहल का अमरूद के आकार का जो मुख्य सफेद गुंबद है, उसका सीधा संबंध फारस के समरकंद और मध्य एशिया की निर्माण कला से है।
पिश्ताक : मुख्य प्रवेश द्वारों पर बने ऊंचे और विशाल मेहराब, जिन्हें ‘पिश्ताक’ कहा जाता है, फारसी वास्तुकला की पहचान रहे हैं।
पिएत्रा ड्यूरा : पत्थरों पर कीमती रत्नों और नक्काशी की जो पच्चीकारी की गई है, उसमें फारसी और इतालवी कलाकारों की तकनीकों का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है।
इतिहास के दस्तावेजों के अनुसार, ताजमहल के मुख्य वास्तुकार (Chief Architect) का नाम उस्ताद अहमद लाहौरी था। हालांकि उनके नाम में ‘लाहौरी’ जुड़ा है, लेकिन वे फारसी वास्तुकला परंपरा और सिद्धांतों के प्रकांड विद्वान थे। उनके साथ फारस (ईरान) के शिराज, इस्फ़हान और बगदाद से आए कई बड़े कैलीग्राफर्स (शिल्पकार) और गुंबद बनाने वाले इंजीनियर शामिल थे। इसलिए, ईरान का यह दावा कि ताजमहल के निर्माण में फारसी प्रतिभा का बहुत बड़ा हाथ था, ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह गलत नहीं है।
शाहजहां और मुमताज महल की अमर गाथा: 20 साल का कठोर परिश्रम
ताजमहल केवल ईंट, पत्थरों और चूने से बनी कोई इमारत नहीं है, बल्कि यह इंसानी जज्बात, बेइंतहा मोहब्बत और दो दशकों की अथक कलात्मक साधना का परिणाम है। इस महान स्मारक का निर्माण कार्य 1631-32 के आसपास शुरू हुआ था, जब प्रसव पीड़ा के दौरान मुमताज महल का असमय निधन हो गया था और उनके गम में डूबे शाहजहां ने दुनिया के सामने अपनी मोहब्बत को अमर करने की कसम खाई थी।
इस विशाल और जटिल परियोजना को पूरा होने में लगभग 20 से 22 साल का लंबा वक्त लगा। समकालीन ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इसके निर्माण कार्य में हर दिन लगभग 20,000 से अधिक मजदूर, संगतराश, शिल्पकार, जौहरी और राजमिस्त्री शामिल होते थे। पत्थरों को तराशने के लिए राजस्थान के मकराना से बेहतरीन सफेद संगमरमर मंगाया गया था, जबकि इसमें जड़े जाने वाले कीमती रत्न और नीलम दुनिया के कोने-कोने (जैसे तिब्बत, श्रीलंका और फारस) से खरीदे गए थे। 1648 के आसपास मुख्य मकबरे का निर्माण पूरा हो चुका था, जबकि इसके बाहरी परिसर, मस्जिद, जवाब और मुख्य प्रवेश द्वारों को पूरी तरह तैयार करने में 1653 तक का समय लगा। इस लंबी अवधि में भारतीय कारीगरों के पसीने और फारसी इंजीनियरों के दिमाग ने मिलकर एक ऐसा चमत्कार रचा, जो सदियों बाद आज भी अपनी चमक से पूरी दुनिया को चकाचौंध कर रहा है।
ईरान के इस तीखे तंज के पीछे की छिपी कूटनीति और वैश्विक राजनीति
ईरानी दूतावास द्वारा सोशल मीडिया पर की गई यह तीखी टिप्पणी महज इतिहास का पाठ पढ़ाने के उद्देश्य से नहीं की गई थी। इसके पीछे वर्तमान समय की बेहद जटिल और तनावपूर्ण अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वाशिंगटन-तेहरान (US-Iran Relations) के बीच जारी पुराना कूटनीतिक गतिरोध छिपा हुआ है। इस तंज के जरिए ईरान ने वैश्विक स्तर पर दो बहुत बड़े भू-राजनीतिक और रणनीतिक संदेश देने की कोशिश की है:
‘हमारी समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को कमतर मत समझो’
ईरान दुनिया को यह याद दिलाना चाहता है कि भले ही आज वह आर्थिक प्रतिबंधों, राजनीतिक अलगाव और पश्चिमी देशों के कड़े दबाव का सामना कर रहा हो, लेकिन ऐतिहासिक रूप से फारसी सभ्यता (Persian Civilization) का प्रभाव बेहद व्यापक रहा है। उसकी कला, वास्तुकला और संस्कृति का असर केवल आज की आधुनिक सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उसने भारत, मध्य एशिया और पूरी इस्लामी दुनिया की सबसे शानदार विरासतों को सींचने का काम किया है।
वर्तमान विदेश नीति और अमेरिकी बयानों पर करारा पलटवार
पिछले कुछ वर्षों में, विशेष रूप से अमेरिकी प्रशासन बदलने के बाद, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। अमेरिकी नेताओं की ओर से कई बार ईरान को सैन्य कार्रवाई और उसके महत्वपूर्ण ठिकानों को नेस्तनाबूद करने की धमकियां दी जाती रही हैं। ईरान ने मार्को रूबियो की इस तस्वीर का इस्तेमाल इसी विरोधाभास को उजागर करने के लिए किया। उनका कहना है कि अमेरिकी नेता एक तरफ तो उस कला (ताजमहल) के सामने खड़े होकर गर्व से तस्वीरें खिंचवाते हैं जो फारसी संस्कृति से प्रेरित है, और दूसरी तरफ वे उसी फारसी संस्कृति के मूल केंद्र (ईरान) को बर्बाद करने की धमकियां देते हैं।
सोशल मीडिया पर छिड़ा वैचारिक महायुद्ध: दो फाड़ हुए नेटिजन्स
ईरानी दूतावास का यह पोस्ट जैसे ही इंटरनेट पर आया, सोशल मीडिया पर कमेंट्स और बहसों की एक बहुत बड़ी बाढ़ आ गई। दुनिया भर के, और विशेष रूप से भारत के यूजर्स इस मुद्दे पर दो स्पष्ट हिस्सों में बंटे हुए नजर आए। इस बहस ने राष्ट्रवाद, साझा इतिहास और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के कई नए आयामों को छू लिया।
पहला पक्ष: “ताजमहल भारत का गौरव है, इसे किसी अन्य देश से न जोड़ें”
भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स की एक बहुत बड़ी आबादी ने ईरानी दूतावास के इस दावे पर तीखी आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि ताजमहल पूरी तरह से भारत की भूमि पर, भारतीय राजा द्वारा, भारतीय खजाने के पैसे से और मुख्य रूप से भारतीय मजदूरों के खून-पसीने से बनाया गया था।
एक यूजर ने बड़ी बेबाकी से लिखा:
“ताजमहल को किसी और देश की पहचान से जोड़कर इसके महत्व को कम करने की कोशिश बंद होनी चाहिए। इसे हिंदुस्तान के एक मुगल बादशाह ने अपनी बेगम की याद में भारत के मकराना पत्थर से बनवाया था। यह यमुना नदी के किनारे स्थित भारत की संप्रभु विरासत है। हर विदेशी मेहमान इसकी खूबसूरती देखने आता है, न कि किसी देश की राजनीति देखने। इसमें ईरान का जबरन कनेक्शन जोड़ना पूरी तरह से अप्रासंगिक है।”
कई अन्य यूजर्स ने यह भी कहा कि ईरान अपनी अंदरूनी और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक भड़ास निकालने के लिए भारत की ऐतिहासिक धरोहर का इस्तेमाल एक ढाल के रूप में कर रहा है, जो कि पूरी तरह से गलत राजनयिक आचरण है।
दूसरा पक्ष: “इतिहास साझा होता है, इसे सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता”
इसके विपरीत, इतिहासकारों, वास्तुकला के प्रेमियों और कुछ वैश्विक नागरिकों का एक दूसरा समूह भी था, जिसने ईरान के इस तर्क में छिपे सांस्कृतिक संदेश का समर्थन किया। उनका कहना था कि कला और संस्कृति कभी भी किसी एक देश की भौगोलिक सीमाओं की गुलाम नहीं होतीं।
इस विचार का समर्थन करने वाले एक यूजर ने लिखा:
“इतिहास हमेशा साझा और मिला-जुला होता है। ताजमहल की खूबसूरती इसी बात में है कि यह भारतीय कला और फारसी वास्तुकला के मिलन का सबसे बेजोड़ उदाहरण है। यदि ईरान यह कह रहा है कि इसमें उनकी सभ्यता की भी एक झलक है, तो इसमें किसी को बुरा मानने की जरूरत नहीं है। यह तो कला की वैश्विक ताकत को दिखाता है कि आज धुर विरोधी देशों के नेता भी एक साझा इतिहास के सामने नतमस्तक होने पर मजबूर हैं।”
कूटनीति के दौर में इतिहास का राजनीतिकरण
मार्को रूबियो की एक साधारण सी ताजमहल यात्रा ने यह साबित कर दिया है कि आज के इस अत्यधिक जुड़े हुए (Hyper-connected) डिजिटल युग में कोई भी घटना सिर्फ एक साधारण पर्यटन गतिविधि नहीं रह गई है। हर एक तस्वीर, हर एक शब्द और हर एक कदम को कूटनीति और भू-राजनीति के चश्मे से देखा और परखा जाता है।
ताजमहल कल भी दुनिया के लिए मोहब्बत और बेजोड़ वास्तुकला का एक कालजयी प्रतीक था, आज भी है और आने वाली सदियों में भी रहेगा। हालांकि, ईरान और अमेरिका के बीच जारी इस ताजा ट्विटर वॉर ने यह जरूर दिखा दिया है कि इतिहास के पन्ने जितने पुराने होते जाते हैं, आज की राजनीति उन्हें अपने हिसाब से इस्तेमाल करने के लिए उतनी ही उत्सुक रहती है। भारत के दृष्टिकोण से, ताजमहल उसकी अपनी सरजमीं का एक ऐसा चमकता हुआ हीरा है, जिसकी चमक पर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के इन छोटे-मोटे विवादों का कोई असर नहीं पड़ने वाला है। विदेशी मेहमान आते रहेंगे, तस्वीरें खिंचवाते रहेंगे और ताजमहल अपनी खामोश भव्यता से दुनिया को यह संदेश देता रहेगा कि साम्राज्य आते-जाते रहते हैं, राजनीतिक तनाव बदलते रहते हैं, लेकिन सच्ची कला और मोहब्बत हमेशा अमर रहती है।

































