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जयशंकर की ‘शांत कूटनीति’ ने फिर दिखाया दम: होर्मुज संकट के बीच ईरान ने रिहा किए 10 भारतीय नाविक!

पश्चिम एशिया (Middle East) में जारी भीषण तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बने गंभीर सुरक्षा संकट के बीच, भारत सरकार को एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी हासिल हुई है।

Ayush Aman Rai द्वारा Ayush Aman Rai
27 May 2026
in भू-राजनीति, राजनीति
जयशंकर की ‘शांत कूटनीति’ ने फिर दिखाया दम: होर्मुज संकट के बीच ईरान ने रिहा किए 10 भारतीय नाविक!

होर्मुज संकट के बीच भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत Image (News18India)

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वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) और समुद्री सुरक्षा के मोर्चे पर भारत के लिए एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है। पश्चिम एशिया (Middle East) में जारी भीषण तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बने गंभीर सुरक्षा संकट के बीच, भारत सरकार को एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी हासिल हुई है। ईरान की सरकार ने पिछले करीब एक साल से अपनी हिरासत में रखे गए 10 भारतीय नाविकों को सुरक्षित रिहा कर दिया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के नेतृत्व में भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा पर्दे के पीछे से की गई लगातार और बेहद सधी हुई कूटनीतिक कोशिशों के बाद इन नाविकों की सुरक्षित घर वापसी का रास्ता साफ हो पाया है। भारत के डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग (DGS) ने इस पूरे घटनाक्रम की आधिकारिक पुष्टि करते हुए देश को इस बड़ी सफलता से अवगत कराया है।

भारतीय नौवहन प्राधिकरण (DGS) का आधिकारिक बयान और रिहाई की टाइमलाइन

भारत के डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग (Directorate General of Shipping) ने एक बयान जारी कर बताया कि रिहा किए गए सभी 10 भारतीय नाविक ‘एमवी हार्बर फीनिक्स’ (MV Harbour Phoenix) नाम के एक तेल टैंकर (Oil Tanker) पर तैनात थे। इस जहाज और इसके चालक दल को ईरानी अधिकारियों ने लंबे समय से अपने नियंत्रण में ले रखा था। गहन कूटनीतिक वार्ताओं और कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद, अब न केवल नाविकों को बल्कि उनके कमर्शियल जहाज को भी ईरान की कस्टडी से पूरी तरह मुक्त कर दिया गया है।

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यह पूरा मामला जुलाई 2025 का है, जब ईरान के सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण जास्क पोर्ट (Jask Port) के पास ईरानी सुरक्षा बलों ने इस तेल टैंकर को रोक लिया था। जहाज पर सवार चालक दल में शामिल सभी 10 नाविक भारतीय नागरिक थे, जिन्हें तुरंत हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी गई थी। तब से लेकर अब तक भारत सरकार लगातार ईरानी विदेश मंत्रालय और वहां के स्थानीय अधिकारियों के साथ संपर्क बनाए हुए थी। शिपिंग प्राधिकरण के अनुसार, सभी नाविक पूरी तरह सुरक्षित और स्वस्थ हैं और उन्हें वापस भारत लाने के लिए आवश्यक लॉजिस्टिक व कानूनी कागजी कार्रवाई को तेजी से पूरा किया जा रहा है।

भारत की ‘शांत कूटनीति’ (Quiet Diplomacy) ने कैसे दिखाई अपनी ताकत?

इस पूरे मामले की सबसे खास और दिलचस्प बात यह रही कि भारत सरकार ने इस हाई-प्रोफाइल संकट को लेकर किसी भी प्रकार की सार्वजनिक बयानबाजी या आक्रामक रुख अपनाने से पूरी तरह परहेज किया। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इसे ‘शांत कूटनीति’ या ‘बैक-चैनल डिप्लोमेसी’ (Back-channel Diplomacy) कहा जाता है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के दिशानिर्देशों के तहत भारतीय राजनयिकों ने मीडिया में किसी भी तरह की हाइप या सनसनी पैदा किए बिना, बेहद खामोशी और सीधे संवाद के जरिए ईरान के शीर्ष नेतृत्व के साथ बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से राजनीतिक बयानबाजी की जाती या ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की कोशिश होती, तो ईरान की सरकार का रुख सख्त हो सकता था, जिससे नाविकों की रिहाई का मामला महीनों या सालों के लिए लटक सकता था। भारत ने दोनों देशों के बीच के ऐतिहासिक और पारंपरिक संबंधों की दुहाई देते हुए मानवीय आधार पर बातचीत की। नई दिल्ली की इसी बेहद परिपक्व और संतुलित रणनीति का नतीजा है कि बिना किसी शोर-शराबे के 10 भारतीय परिवारों के घरों में दोबारा खुशियां लौट आई हैं।

आखिर क्यों ईरान ने हिरासत में लिया था ‘एमवी हार्बर फीनिक्स’ टैंकर?

ग्लोबल शिप ट्रैकिंग वेबसाइट्स और समुद्री खुफिया डेटा के अनुसार, ‘एमवी हार्बर फीनिक्स’ पलाऊ (Palau) के झंडे वाला एक कमर्शियल ऑयल टैंकर है। हालांकि, इस पर काम करने वाला मुख्य क्रू भारतीय कार्यबल का हिस्सा था। खाड़ी क्षेत्र और ओमान की खाड़ी (Gulf of Oman) में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) और समुद्री सुरक्षा बल अक्सर उन विदेशी जहाजों और टैंकरों को निशाना बनाते या अपनी हिरासत में लेते हैं, जिन पर वे अवैध रूप से ईंधन की तस्करी (Fuel Smuggling) करने या अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों का उल्लंघन करने का संदेह व्यक्त करते हैं।

जुलाई 2025 में जब इस जहाज को रोका गया, तो ईरान की ओर से भी कोई विस्तृत और आधिकारिक कारण सार्वजनिक नहीं किया गया था। भारत सरकार ने भी मामले की संवेदनशीलता और नाविकों की व्यक्तिगत सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए जहाज से जुड़े तकनीकी विवादों को सार्वजनिक मंचों पर उठाने के बजाय द्विपक्षीय कानूनी फ्रेमवर्क के तहत सुलझाने को प्राथमिकता दी। आखिरकार, लगभग एक साल की लंबी कानूनी और प्रशासनिक खींचतान के बाद ईरान ने माना कि भारतीय नाविकों का किसी भी अवैध गतिविधि से सीधा संबंध नहीं था और उन्हें ससम्मान रिहा करने का आदेश जारी कर दिया।

नई दिल्ली की कूटनीतिक दुविधा: वाशिंगटन, तेल अवीव और तेहरान के बीच संतुलन

यह रिहाई भारत के लिए इसलिए भी एक बहुत बड़ी रणनीतिक जीत है क्योंकि वर्तमान समय में भारत और ईरान के संबंध बेहद जटिल दौर से गुजर रहे हैं। एक तरफ जहां भारत के अमेरिका और इजरायल के साथ रणनीतिक, आर्थिक और रक्षा संबंध अपने इतिहास के सबसे मजबूत दौर में हैं; वहीं दूसरी तरफ ईरान के साथ भारत के सदियों पुराने सांस्कृतिक, ऊर्जा और क्षेत्रीय जुड़ाव (जैसे चाबहार पोर्ट परियोजना) हैं।

जब भी अमेरिका या इजरायल का ईरान के साथ सैन्य या कूटनीतिक टकराव बढ़ता है, तो भारत पर यह दबाव रहता है कि वह पश्चिमी देशों के पाले में खड़ा दिखे। इसके बावजूद, भारत की विदेश नीति हमेशा ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) के सिद्धांत पर काम करती है। नई दिल्ली ने कभी भी अमेरिका या इजरायल के साथ अपनी नजदीकी को ईरान के साथ अपने स्वतंत्र संबंधों के आड़े नहीं आने दिया। इसी संतुलित विदेश नीति के कारण आज भी तेहरान में भारत की आवाज को बेहद सम्मान और गंभीरता के साथ सुना जाता है, जिसका सीधा फायदा संकट में फंसे भारतीय नागरिकों को मिलता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य का महा-संकट और वैश्विक तेल बाजार पर दबाव

यह पूरी घटना उस दौर में हो रही है जब होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) दुनिया का सबसे खतरनाक समुद्री हॉटस्पॉट बना हुआ है। हाल ही में 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के कुछ ठिकानों पर किए गए हमलों के बाद से पूरे क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। इसके जवाब में ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों और अंतरराष्ट्रीय तेल टैंकरों पर अपनी निगरानी, चेकिंग और प्रतिबंधों को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है।

भौगोलिक और आर्थिक दृष्टि से होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण लाइफलाइन है। दुनिया के कुल कच्चे तेल (Crude Oil) और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) के वैश्विक व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। इस रास्ते में जरा सी भी रुकावट या युद्ध की स्थिति पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट पैदा कर सकती है और वैश्विक शेयर बाजारों को मंदी की गर्त में धकेल सकती है। ईरान द्वारा यहाँ जहाजों की कड़ी चेकिंग किए जाने के कारण वैश्विक शिपिंग कंपनियों को भारी बीमा प्रीमियम और लंबे रास्तों का चयन करना पड़ रहा है।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा और मर्चेंट नेवी के नाविकों की सुरक्षा का सवाल

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक और उपभोक्ता देश है। भारत अपनी घरेलू तेल और गैस की जरूरतों का लगभग 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करके पूरा करता है, और इस कुल आयात का लगभग आधा (50%) हिस्सा इसी अशांत होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते भारत के पश्चिमी बंदरगाहों तक पहुंचता है। इसलिए, इस क्षेत्र में शांति और जहाजों की निर्बाध आवाजाही भारत की आर्थिक तरक्की के लिए रीढ़ की हड्डी के समान है।

इस भयंकर कूटनीतिक और सैन्य तनाव के बीच भी भारत के लिए एक अच्छी खबर यह है कि पिछले एक हफ्ते में भारत के लिए एलएनजी (LNG) लेकर आ रहे दो बड़े जहाजों ने बिना किसी रुकावट के होर्मुज के इस संवेदनशील रास्ते को सुरक्षित पार कर लिया है। इससे भारत के घरेलू बाजार पर मंडरा रहा गैस किल्लत का दबाव काफी हद तक कम हो गया है।

इसके साथ ही, भारत दुनिया के सबसे बड़े मर्चेंट नेवी कार्यबल (Merchant Navy Workforce) वाले देशों में अग्रणी है। दुनिया भर के कमर्शियल जहाजों पर लाखों भारतीय नाविक अपनी सेवाएं दे रहे हैं, जिनमें से हजारों नाविक हर वक्त खाड़ी क्षेत्र के इन खतरनाक समुद्री रास्तों पर तैनात रहते हैं। ऐसे में, जब भी इस क्षेत्र में कोई युद्ध या टकराव की स्थिति बनती है, तो इन भारतीय नागरिकों की सुरक्षा भारत सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। ईरान द्वारा इन 10 नाविकों की रिहाई ने वैश्विक शिपिंग इंडस्ट्री में काम कर रहे अन्य भारतीय नाविकों और उनके परिवारों के हौसले को मजबूत करने का काम किया है।

जयशंकर की कूटनीति का वैश्विक लोहा

10 भारतीय नाविकों की सुरक्षित रिहाई केवल कुछ नागरिकों की घर वापसी का मामला नहीं है, बल्कि यह उभरते हुए ‘ग्लोबल साउथ’ के नेता के रूप में भारत की कूटनीतिक परिपक्वता और उसकी वैश्विक साख का एक ज्वलंत प्रमाण है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कड़क और स्पष्ट रुख रखने के साथ-साथ, जब अपने नागरिकों के हितों की रक्षा की बात आती है, तो भारत पर्दे के पीछे बेहद शांत और अचूक कूटनीति करने में भी पूरी तरह सक्षम है।

होर्मुज संकट के इस अत्यंत कठिन दौर में ईरान को अपने पक्ष में राजी करना और अपने लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना इस बात को रेखांकित करता है कि भारत की विदेश नीति आज किसी एक ब्लॉक या विचारधारा की गुलाम नहीं है, बल्कि वह पूरी तरह से राष्ट्रहित और मानवीय मूल्यों के संरक्षण के लिए समर्पित है। इस घटना से भारत और ईरान के द्विपक्षीय संबंधों को एक नई मजबूती मिलेगी और भविष्य में चाबहार पोर्ट जैसी रणनीतिक परियोजनाओं को गति देने में मदद मिलेगी।

Tags: India Iran Energy RelationsIndian Sailors Released IranJask Port Iran Ship Detention.MV Harbour Phoenix Oil TankerS Jaishankar Quiet DiplomacyStrait of Hormuz crisisUS Israel Iran conflict
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23 July 2026

देश में इन दिनों पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार और युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर सियासी माहौल गर्म है। इन विषयों पर...

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