मुस्लिम लीग, केरलम् और बहुत कुछ…

मुस्लिम लीग का आज पाकिस्तान-बांग्लादेश में भी कोई अस्तित्व नहीं है, लेकिन भारत में वो कांग्रेस के साथ केरलम् की सरकार चला रही है

Keral Muslim Leauge

क्या अब केरलम् को मुस्लिम लीग चलाएगी

1947 मे भारत के विभाजन के जो अनेक कारक (factors) रहे, उनमे मुस्लिम लीग प्रमुख हैं। मुस्लिम लीग ने ही अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग रखी। उसेपाकिस्तानका नाम दिया। पाकिस्तान के लिए हिंसक आंदोलन किए।डायरेक्ट एक्शन डेजैसा अमानुषिक और बर्बर कदम उठाया। उस दिन (16 अगस्त 1946 को) कलकत्ता मे हजारों हिंदुओं की हत्या कर खून की नदियां बहाई गईं। इस पर भी विभाजन की मांग नही मानी गई, तो दो

महीने बाद नोआखाली में दस हजार हिंदुओं का नरसंहार किया गया आख़िरकार मुस्लिम लीग कांग्रेसी नेताओं को झुकाने में कामयाब रही और पाकिस्तान की बात मनवा ली।

लेकिन 15 अगस्त 1947 के बाद, इस मुस्लिम लीग का क्या हुआ..?

पाकिस्तान मे तो वो सत्तारुढ पार्टी बन गई। जैसे अपने यहां कांग्रेस थी, वैसे पाकिस्तान मे मुस्लिम लीग। किंतु जिन्ना और लियाकत अली खान की मृत्यु के पश्चात, मुस्लिम लीग मे मतभेद बढने लगे। जनरल अयूब खान के शासक बनने के पश्चात, मुस्लिम लीग 3 धडों मे बंट गई। तब तक पूर्वी पाकिस्तान अलग देश नही बना था। वहां मुस्लिम लीग से टूटकर अलग पार्टी बनी – ‘अवामी लीग’, जिसके नेता थे शेख मुजीब रहमान। अवामी लीग के नेतृत्व मे ही 1971 के संघर्ष के बाद, बांग्लादेश का निर्माण हुआ।
संक्षेप मे, भारत से टूटकर बने दोनो मुस्लिम देशों को- मुस्लिम लीग के नेताओं ने ही बनाया और प्रारंभ के कुछ वर्षों मे उन्होने इन दोनों ही देशों पर राज भी किया।

स्वतंत्रता के बाद भारत मे मुस्लिम लीग का क्या हुआ?

शुरुआत के दिनों मे तो, भारत मे रह गए मुस्लिम लीग के नेता बडे अवसादग्रस्त थे। उन्हे उनका राजनैतिक भविष्य अंधकारमय दिख रहा था। इनमे से अनेक, कांग्रेस मे चले गए। कांग्रेस ने भी उनके स्वागत में रेड कार्पेट बिछाईं।प्रारंभ मे मुस्लिम नेताओं को लगा कि अब चूंकि पाकिस्तान अलग हो गया हैं, तो भारत मे, भारत की परंपरा, पद्धति और व्यवस्था के अनुरुप ही रहना पडेगा। कुछ वैसी ही उनकी मानसिकता भी बन रही थी। किंतु उन्होने देखा कि कांग्रेस  मुसलमानों को ज्यादा महत्व दे रही हैं। साथ ही महात्मा गांधीजी की हत्या के बाद, हिंदू हित की बात करनेवाले संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। अगले दसबारह वर्ष, हिंदू संगठनों को कुचला गया ऐसे में स्वाभाविक था कि मुस्लिम संगठनों को खुली छूट मिली।

भारत मे लस्तपस्त पडी मुस्लिम लीग मे जान आने लगी। गांधीजी की हत्या के तुरंत बाद, भारत का विभाजन करने वाली मुस्लिम लीग के भारतीय धडे़ ने अपना चेहरा थोड़ा सा बदल लिया। अब उनका नाम हुआ – ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग। विशेषतः केरल मे इनका प्रभाव बढता गया। मलप्पुरम, कोझिकोड, कन्नूर, कासरगोड जैसे जिले मुस्लिम बहुल बनते गए, तो मुस्लिम लीग भी यहां की प्रमुख पार्टी बनती गई।
मोहम्मद इस्माइल, IUML (Indian Union Muslim League) के संस्थापक रहे, तो मोहम्मद कोया– 1979 मे 3 महीनों के लिए केरल के मुख्यमंत्री भी रहे।

कांग्रेस ने केरल मे हमेशा से मुस्लिम लीग को साथ लिया हैं। यूपीए की सरकार मे, मुस्लिम लीग के ई. अहमद केंद्रीय मंत्री थे। वे जब रेल राज्यमंत्री थे, तब नई प्रारंभ होनेवाली ट्रेनों मे इंजन की पूजा वगैरह करने की सख्त मनाही थी (जबकि ये पुरानी परंपरा रही है)

अभी इसी महीने केरलम् विधानसभा के जो परिणाम निकले, उनमे कांग्रेसमुस्लिम लीग गठबंधन को 100 से उपर सीटें और पूर्ण बहुमत मिला। इसमे मुस्लिम लीग को 22 सीटें मिली हैं, यानी गठबंधन में ये पार्टी कांग्रेस के बाद दूसरे नंबर पर है।मुस्लिम लीग के दबाव के चलते ही कांग्रेस को मुख्यमंत्री का नाम घोषित करने में इतना विलंब हुआ।

हाल ही में केरल में जिस मंत्रिमंडल ने शपथ ली हैं, उनमे मुस्लिम लीग के 5 मंत्री हैं।
पी.के. कुन्हालीकुट्टी, पी.के. बशीर, के.एम शाजी, एन. शम्सुद्दीन, वी.. अब्दुल गफ़ूर ने मुस्लिम लीग की तरफ़ से मंत्री पद की शपथ ली

अब देश की राजनीति की विडंबना देखियेजिस मुस्लिम लीग के नेता खुर्रम ने 1946 मे जवाहर लाल नेहरु को जिंदा गाड देने की धमकी दी थी, जिस मुस्लिम लीग ने महात्मा गांधी की तौहीन की थी, जिस मुस्लीम लीग ने डायरेक्ट एक्शन डे के नाम पर बंगाल की सड़कों को हिंदुओं के खून से लाल कर दिया और जो मुस्लिम लीग आज भी केरलम् की सडकों पर सरे आम हिंसक प्रदर्शन करती हैं, ‘सर तन से जुदाके नारे लगाती है।

लेकिन ऐसी ही धर्मांध मुस्लिम लीग के साथ कांग्रेस न सिर्फ गठबंधन करती हैं, बल्कि उनके साथ मंत्रीपद साझा करती हैं, उनको सम्मान देती है और देश के तमाम कांग्रेसी, सेक्युलर और तथाकथितधर्मनिरपेक्षपत्रकार चुप बैठ जाते हैं, खामोशी ओढ लेते हैं। यही भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है।

लेखक प्रशांत पोळ एक विख्यात विचारक, लेखक और सामाजिक विश्लेषक हैं, भारतीय इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रवाद पर नियमित लेखन के अतिरिक्त उन्होने ‘भारतीय ज्ञान का खजाना और Changing Bharat जैसी पुस्तकों के माध्यम से भारतीय चिंतन की गहराई को दर्शाया है। साथ ही वो IT व टेलिकॉम के क्षेत्र में तकनीकी एवं प्रबंधन सलाहकार की भूमिका भी निभा रहे हैं
उनसे pp@prashantpole.com पर संपर्क किया जा सकता है

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