ओबीसी विस्तार पर उठे सवाल, बंगाल ने आरक्षण घटाकर 7% किया, 66 जातियों की सूची बहाल, राजनीतिक जांच तेज

ममता सरकार ने अपने ओबीसी ढांचे में बड़ा बदलाव करते हुए आरक्षण कोटा 17 प्रतिशत से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। साथ ही, ओबीसी सूची को सीमित कर केवल 66 जातियों तक रखा गया है। यह फैसला 18 मई को हुई कैबिनेट की पहली बैठक में लिया गया।

ममता सरकार के दौर में हुए ओबीसी विस्तार पर उठे सवाल

ममता सरकार के दौर में हुए ओबीसी विस्तार पर उठे सवाल

पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने ओबीसी ढांचे में बड़ा बदलाव करते हुए आरक्षण कोटा 17 प्रतिशत से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। साथ ही, ओबीसी सूची को सीमित कर केवल 66 जातियों तक रखा गया है। यह फैसला 18 मई को हुई कैबिनेट की पहली बैठक में लिया गया।

यह कदम राज्य की आरक्षण व्यवस्था में हाल के वर्षों का सबसे बड़ा सुधार माना जा रहा है। इससे पिछले एक दशक में लागू किए गए विस्तारित वर्गीकरण ढांचे को सीधे समाप्त कर दिया गया है और पात्रता के दायरे को फिर से सीमित किया गया है।

अधिकारियों का कहना है कि यह सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि यह अदालत के बाध्यकारी आदेश का पालन और पिछड़ा वर्ग की परिभाषा को नए सिरे से तय करने की प्रक्रिया है।

हाई कोर्ट का फैसला बना बदलाव की वजह

यह पुनर्गठन 2024 में कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले पर आधारित है। अदालत ने 2010 से 2012 के बीच जोड़ी गई 77 जातियों को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि इन जातियों को शामिल करने की प्रक्रिया कानूनी रूप से वैध नहीं थी और असंवैधानिक थी।

अदालत ने ओबीसी-ए और ओबीसी-बी वर्गीकरण प्रणाली को भी अमान्य घोषित कर दिया। इस व्यवस्था के तहत ओबीसी-ए को 10 प्रतिशत और ओबीसी-बी को 7 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता था।

फैसले के बाद 2010 के बाद जारी किए गए लगभग 12 लाख ओबीसी प्रमाणपत्र रद्द कर दिए गए। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद राज्य को पूरी पिछड़ा वर्ग सूची को नए सिरे से तैयार करना पड़ा।

2010 से पहले वाले ढांचे की वापसी

ममता सरकार की पुरानी व्यवस्था को हटाकर नई व्यवस्था के तहत अब केवल वे समुदाय ही ओबीसी दर्जा बनाए रखेंगे जो 2010 से पहले की सूची में शामिल थे। सरकार ने स्पष्ट किया है कि आगे पात्रता तय करने के लिए यही कट-ऑफ लागू रहेगा।

हालांकि, सरकार ने यह भी साफ किया है कि पुराने कोटा सिस्टम के तहत नौकरी पाने वाले मौजूदा सरकारी कर्मचारियों पर इसका असर नहीं पड़ेगा। यह फैसला प्रशासनिक बाधाओं और कानूनी विवादों से बचने के लिए लिया गया है।

पहले की व्यवस्था, जिसमें कम समय में बड़ी संख्या में जातियों को जोड़ा गया था, अब पूरी तरह समाप्त कर दी गई है।

ओबीसी-ए और ओबीसी-बी व्यवस्था खत्म

सबसे बड़ा बदलाव ओबीसी-ए और ओबीसी-बी वर्गीकरण को पूरी तरह खत्म करना है। यह व्यवस्था अपेक्षाकृत अधिक पिछड़े और कम पिछड़े समूहों में अंतर करने के लिए लागू की गई थी।

अब राज्य ने 66 जातियों की एकीकृत सूची लागू कर दी है और पुरानी बहु-स्तरीय व्यवस्था समाप्त कर दी गई है।

इस बदलाव से उस विस्तारवादी नीति को भी पीछे हटाया गया है जिसके तहत पिछली सरकार के दौरान ओबीसी दायरा तेजी से बढ़ाया गया था।

पिछली शामिलियों पर फिर उठे सवाल

नई सूची आने के बाद 2010–2012 के दौरान जातियों को शामिल करने की प्रक्रिया पर फिर बहस शुरू हो गई है। भारत में आरक्षण संविधान के अनुसार सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया जाता है, धर्म के आधार पर नहीं।

नई 66 जातियों की सूची में हज्जाम, चौधुली और पहाड़िया मुस्लिम समुदाय जैसे कई समूह अब भी शामिल हैं, साथ ही कई पारंपरिक और पेशागत समुदाय भी सूची में बने हुए हैं।

अधिकारियों का कहना है कि इन वर्गीकरणों का आधार सामाजिक-आर्थिक स्थिति थी, न कि धार्मिक पहचान। हालांकि, अदालत द्वारा बड़ी संख्या में शामिलियों को रद्द किए जाने के बाद उस दौर की प्रक्रिया अब प्रशासनिक और राजनीतिक जांच के दायरे में आ गई है।

समीक्षा समिति और भविष्य में बदलाव की संभावना

राज्य मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कहा है कि सरकार मौजूदा सूची को अंतिम नहीं मान रही है। इसके लिए एक विशेष समीक्षा समिति बनाई जाएगी।

यह समिति अदालत द्वारा स्पष्ट किए गए वर्गीकरणों की समीक्षा करेगी और यह भी देखेगी कि किन समूहों पर कानूनी प्रक्रिया के तहत दोबारा विचार किया जा सकता है।

सरकार ने भविष्य में नई जातियों को शामिल करने की संभावना खुली रखी है, लेकिन यह केवल कानूनी और संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करने के बाद ही होगा।

संशोधित सूची में शामिल प्रमुख समुदाय

नई 66 जातियों की सूची में कई पारंपरिक और पेशागत समुदाय शामिल हैं। इनमें कुर्मी, कपाली, कर्मकार, सूत्रधार, तांती, धनुक, कसाई, खंडायत, तुरहा, देवांगा, गोआला, नाई (नापित) और अन्य समुदाय शामिल हैं।

यही समुदाय अब संशोधित ओबीसी ढांचे का आधार बनेंगे।

आरक्षण बदलाव के साथ कैबिनेट के सात बड़े फैसले

आरक्षण ढांचे में बदलाव के साथ कैबिनेट ने प्रशासन, कल्याण और भर्ती से जुड़े कई अन्य बड़े फैसलों को भी मंजूरी दी।

राज्य सरकारी नौकरियों के लिए अधिकतम आयु सीमा में पांच साल की बढ़ोतरी की गई है। अब ग्रुप ए पदों के लिए आयु सीमा 41 वर्ष, ग्रुप बी के लिए 44 वर्ष और ग्रुप सी व डी के लिए 45 वर्ष होगी। यह बदलाव 11 मई से लागू माना जाएगा।

सरकार ने दो न्यायिक जांच आयोग भी गठित किए हैं। पहला आयोग रिटायर्ड जज जस्टिस बिस्वजीत बसु की अध्यक्षता में सरकारी योजनाओं और परियोजनाओं में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करेगा। दूसरा आयोग जस्टिस संपति चटर्जी की अध्यक्षता में महिलाओं, बच्चों, एससी/एसटी और अल्पसंख्यक समुदायों पर अत्याचार के मामलों की जांच करेगा। शिकायत दर्ज कराने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म भी शुरू किए जाएंगे।

सरकार ने 1 जून से इमामों, मुअज्जिनों और पुजारियों को दिए जाने वाले धार्मिक मानदेय को भी बंद करने का फैसला किया है। पहले इमामों को ₹3,000 और अन्य को ₹2,000 प्रति माह दिए जाते थे।

इसके साथ ही “अन्नपूर्णा योजना” नाम की नई कल्याणकारी योजना शुरू की गई है, जिसके तहत महिलाओं को 1 जून से ₹3,000 प्रति माह दिए जाएंगे। लक्ष्मी भंडार योजना की लाभार्थियों को बिना नए आवेदन के सीधे इस योजना में शामिल किया जाएगा।

महिलाओं को 1 जून से राज्य परिवहन की बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा भी दी जाएगी। हालांकि, फिलहाल बसों की संख्या बढ़ाने की कोई योजना नहीं है।

इसके अलावा, राज्य सरकार ने 7वें राज्य वेतन आयोग के गठन को मंजूरी दी है, जो सरकारी कर्मचारियों, नगर निकाय कर्मियों, शिक्षा बोर्ड और अन्य राज्य संस्थानों के वेतन संशोधन पर काम करेगा। आयोग की संरचना और समयसीमा को लेकर जल्द आधिकारिक अधिसूचना जारी की जाएगी।

निष्कर्ष: नीति दिशा में बड़ा बदलाव

इन सभी फैसलों को मिलाकर देखा जाए तो पश्चिम बंगाल सरकार ने अपनी शासन प्राथमिकताओं में व्यापक बदलाव का संकेत दिया है। सरकार ने जहां आरक्षण व्यवस्था को अदालत के निर्देशों के अनुरूप ढाला है, वहीं प्रशासनिक और कल्याणकारी योजनाओं का दायरा भी बढ़ाया है।

यह बदलाव एक विस्तारित वर्गीकरण मॉडल से हटकर अधिक सीमित और कानूनी रूप से मजबूत ढांचे की ओर संक्रमण को दर्शाता है, जो आने वाले समय में राज्य की नीतियों की नई दिशा तय कर सकता है।

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