सुवेंदु सरकार ने इमाम-मुअज्जिन भत्ते खत्म किए, बंगाल ने ममता के ‘तुष्टिकरण मॉडल’ को दफनाया

सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के केवल नौ दिन बाद आया है। इसे बंगाल की राजनीति और कल्याणकारी ढांचे को नए सिरे से परिभाषित करने की दिशा में भाजपा सरकार का शुरुआती बड़ा कदम माना जा रहा है।

पश्चिम बंगाल में नई बनी भारतीय जनता पार्टी सरकार ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पूर्व तृणमूल कांग्रेस सरकार द्वारा शुरू की गई धर्म-आधारित सरकारी भत्ता योजनाओं को समाप्त करने का ऐलान किया है।

यह फैसला सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के केवल नौ दिन बाद आया है। इसे बंगाल की राजनीति और कल्याणकारी ढांचे को नए सिरे से परिभाषित करने की दिशा में भाजपा सरकार का शुरुआती बड़ा कदम माना जा रहा है।

महिला एवं बाल विकास मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कैबिनेट बैठक के बाद इस निर्णय की घोषणा की। उन्होंने कहा कि धर्म के आधार पर लाभ बांटने वाली सभी योजनाएं 1 जून से बंद कर दी जाएंगी।

पॉल ने कहा, “अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग तथा सूचना एवं सांस्कृतिक मामलों विभाग के तहत धर्म आधारित श्रेणीकरण पर चल रही सभी सहायता योजनाएं बंद कर दी जाएंगी। मौजूदा भुगतान केवल इस महीने के अंत तक जारी रहेगा। सरकार जल्द ही नई अधिसूचना जारी करेगी।”

विवादों में रही भत्ता योजना

धार्मिक कर्मियों को दिया जाने वाला यह भत्ता ममता बनर्जी सरकार की सबसे विवादित योजनाओं में से एक रहा। समर्थकों ने इसे धार्मिक कार्यकर्ताओं के लिए कल्याणकारी सहायता बताया, जबकि आलोचकों ने इसे वोट बैंक की राजनीति करार दिया।

इस योजना के तहत राज्य सरकार हजारों धार्मिक कर्मियों को हर महीने मानदेय देती थी। अगस्त 2023 में अंतिम संशोधन के बाद पंजीकृत इमामों को हर महीने 3000 रुपए दिए जाते थे, जबकि मुअज्जिनों और हिंदू पुजारियों को 2000 रुपए मिलते थे।

विवाद का मुख्य कारण लाभार्थियों की संख्या और उसमें असंतुलन था।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 41,205 इमाम और 39,028 मुअज्जिन इस योजना का लाभ ले रहे थे। इसके मुकाबले हिंदू पुजारियों की संख्या काफी कम, करीब 4,800 से 8,000 के बीच थी।

ममता सरकार ने हिंदू पुजारियों के लिए भत्ता योजना 2020 में शुरू की थी। तब तक इमामों को मानदेय दिए जाने की योजना करीब आठ वर्षों से चल रही थी। यह फैसला लगातार आलोचनाओं और धार्मिक पक्षपात के आरोपों के बाद लिया गया था।

विपक्षी दलों का कहना था कि पुजारियों को शामिल करने के बावजूद योजना की मूल संरचना नहीं बदली, क्योंकि लाभार्थियों में मुस्लिम धर्मगुरुओं की संख्या अब भी भारी बहुमत में थी।

‘भत्ते नहीं, शासन’ पर भाजपा का जोर

विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने इस योजना को लेकर लगातार तृणमूल कांग्रेस पर हमला बोला। पार्टी ने इन भुगतानों को “मुस्लिम तुष्टिकरण” बताया और आरोप लगाया कि टीएमसी सरकार पहचान आधारित कल्याणकारी राजनीति के जरिए शासन व्यवस्था को कमजोर कर रही है।

भाजपा का चुनावी नारा “भात, नहीं भत्ता” रोजगार और आर्थिक सुधारों को बार-बार दिए जाने वाले भत्तों के विकल्प के रूप में पेश करता था।

अब भाजपा सरकार इस फैसले को प्रशासनिक सुधार और वैचारिक बदलाव — दोनों के रूप में पेश कर रही है।

ओबीसी सूची में भी बड़ा बदलाव

कैबिनेट ने 2024 में कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले के बाद राज्य की मौजूदा ओबीसी सूची को रद्द और संशोधित करने का भी फैसला लिया है।

विवाद 77 समुदायों को ओबीसी श्रेणी में शामिल किए जाने को लेकर था, जिनमें से 75 मुस्लिम समुदाय टीएमसी शासन के दौरान जोड़े गए थे।

हाई कोर्ट ने वर्गीकरण प्रक्रिया को रद्द कर दिया था और 2010 के बाद जारी करीब पांच लाख जाति प्रमाणपत्रों को अमान्य घोषित कर दिया था। इस फैसले के बाद राज्य में बड़ा राजनीतिक और कानूनी विवाद खड़ा हो गया।

अब सरकार ने भविष्य में ओबीसी पात्रता तय करने के लिए एक नई समिति गठित करने की घोषणा की है।

कैबिनेट ने सातवें राज्य वेतन आयोग के गठन को भी मंजूरी दी है। यह आयोग सरकारी कर्मचारियों, नगर निकाय कर्मचारियों और राज्य संचालित शिक्षण संस्थानों के कर्मियों के वेतन में संशोधन करेगा।

भाजपा सरकार ने अपना राजनीतिक संदेश साफ कर दिया है — वह बंगाल में धर्म आधारित सरकारी संरक्षण की राजनीति को समाप्त करना चाहती है।

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