गवर्नर ने मांगा समर्थन का सबूत: क्या तमिलनाडु में विजय के साथ हो रहा है अन्याय?

तमिलनाडु की राजनीति आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ लोकतंत्र की परिभाषा और राज्यपाल के अधिकारों के बीच सीधी जंग छिड़ गई है।

क्या थलापति विजय के साथ हो रहा है अन्याय?

तमिलनाडु की राजनीति आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ लोकतंत्र की परिभाषा और राज्यपाल के अधिकारों के बीच सीधी जंग छिड़ गई है। थलापति विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) ने हालिया विधानसभा चुनावों में 108 सीटें जीतकर राज्य के तीन दशक पुराने द्रविड़ वर्चस्व (DMK और AIADMK) को ध्वस्त कर दिया। लेकिन सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद, विजय के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का रास्ता राजभवन की एक दहलीज पर आकर रुक गया है।

राजभवन का कड़ा रुख: ‘बहुमत का सबूत पहले, शपथ बाद में’

तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर ने विजय के सरकार बनाने के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उनके पास जादुई आंकड़े (118) का पर्याप्त समर्थन पत्र नहीं है। 234 सीटों वाली विधानसभा में विजय के पास 108 सीटें हैं। कांग्रेस के समर्थन के बाद यह आंकड़ा 113 तक पहुंच जाता है, लेकिन बहुमत के लिए अभी भी 5 और विधायकों की जरूरत है।

राज्यपाल का तर्क है कि विजय पहले उन 118 विधायकों के समर्थन का लिखित पत्र (Letter of Support) सौंपें, उसके बाद ही उन्हें शपथ दिलाई जाएगी। वहीं, विजय का कहना है कि संसदीय परंपरा के अनुसार सबसे बड़े दल के नेता को सरकार बनाने का न्यौता मिलना चाहिए और बहुमत साबित करने का असली स्थान विधानसभा का पटल (Floor Test) है, न कि राजभवन का बंद कमरा।

कर्नाटक 2018 का उदाहरण: दोहरे मापदंडों पर सवाल

तमिलनाडु के इस संकट ने 2018 के कर्नाटक चुनाव की यादें ताजा कर दी हैं। उस समय कर्नाटक की 224 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी 104 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। बहुमत के लिए 113 सीटों की जरूरत थी। दूसरी तरफ कांग्रेस और जेडीएस ने चुनाव के तुरंत बाद गठबंधन कर लिया था, जिनके पास स्पष्ट बहुमत था।

इसके बावजूद, तत्कालीन राज्यपाल वजुभाई वाला ने सबसे बड़े दल के नेता बी.एस. येदियुरप्पा को सरकार बनाने का न्यौता दिया। उन्हें शपथ लेने के लिए किसी समर्थन पत्र की आवश्यकता नहीं पड़ी, बल्कि सदन में बहुमत साबित करने के लिए समय दिया गया। आज सवाल यह उठ रहा है कि जो संवैधानिक उदारता कर्नाटक में बीजेपी के लिए दिखाई गई, वही परंपरा तमिलनाडु में विजय की पार्टी के लिए क्यों नहीं अपनाई जा रही?

‘राजभवन टेस्ट’ बनाम ‘फ्लोर टेस्ट’: संवैधानिक विवाद

भारतीय संविधान के इतिहास में यह बहस पुरानी है कि बहुमत का फैसला कहाँ होना चाहिए।

एस.आर. बोम्मई मामला (1994): सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया था कि किसी सरकार के पास बहुमत है या नहीं, इसे परखने की एकमात्र जगह विधानसभा है। राज्यपाल को अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि के आधार पर सरकार बनाने से नहीं रोकना चाहिए।

राज्यपाल की भूमिका: विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यपाल का काम यह सुनिश्चित करना है कि एक स्थिर सरकार बने, लेकिन सबसे बड़े दल को मौका न देना जनमत का अनादर माना जा सकता है।

तमिलनाडु में ऐसा लग रहा है मानो राज्यपाल फ्लोर टेस्ट से पहले ही ‘राजभवन टेस्ट’ लेना चाह रहे हैं, जो सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के विपरीत प्रतीत होता है।

क्या राज्यपाल केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे हैं?

इस विवाद ने एक बार फिर राज्यपाल के पद के राजनीतिकरण पर बहस छेड़ दी है। राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने कड़े शब्दों में कहा है कि कई राज्यों में राज्यपाल केंद्र के ‘एजेंट’ के रूप में काम कर रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि चूँकि विजय की पार्टी बीजेपी या केंद्र के एजेंडे में फिट नहीं बैठ रही, इसलिए उनके रास्ते में संवैधानिक अड़चनें पैदा की जा रही हैं।

कमल हासन और अन्य क्षेत्रीय नेताओं ने इसे ‘जनादेश का गला घोंटना’ करार दिया है। उनका कहना है कि अगर जनता ने किसी पार्टी को सबसे ज्यादा वोट और सीटें दी हैं, तो उसे अपनी योग्यता साबित करने का पहला अवसर मिलना ही चाहिए।

‘रिजॉर्ट पॉलिटिक्स’ और खरीद-फरोख्त का डर

जैसे-जैसे सरकार गठन में देरी हो रही है, राज्य में ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ (विधायकों की खरीद-फरोख्त) की आशंकाएं बलवती हो गई हैं। AIADMK के विधायकों का पुडुचेरी के रिजॉर्ट में जाना इसी डर की पुष्टि करता है।
राजनीति का यह कड़वा सच है कि जब राज्यपाल निर्णय लेने में देरी करते हैं, तो निर्दलीय और छोटे दलों के विधायकों की ‘कीमत’ बढ़ जाती है। विजय ने दो हफ्ते का समय मांगा है, लेकिन राज्यपाल को डर है कि इस दौरान अनैतिक तरीकों से समर्थन जुटाया जा सकता है। सवाल यह है कि क्या इस देरी के लिए खुद राज्यपाल जिम्मेदार नहीं हैं?

किंगमेकर की भूमिका में वामदल और वीसीके

वर्तमान में 5 सीटों की उस छोटी सी खाई को पाटने के लिए सबकी नजरें सीपीआई (CPI), सीपीएम (CPM) और वीसीके (VCK) पर हैं। हालांकि ये दल परंपरागत रूप से डीएमके (DMK) के साथ रहे हैं, लेकिन विजय के उदय ने समीकरण बदल दिए हैं।
इन पार्टियों के भीतर भी मंथन चल रहा है कि क्या वे एक नए चेहरे (विजय) का समर्थन करें या पुराने गठबंधन के साथ रहें। सीपीआई की तमिलनाडु इकाई ने राज्यपाल से अपील की है कि वे संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करें, जो संकेत देता है कि वे विजय को मौका दिए जाने के पक्ष में हो सकते हैं।

क्या न्यायपालिका देगी दखल?

चर्चा है कि टीवीके (TVK) इस मामले को मद्रास हाई कोर्ट या सीधे सुप्रीम कोर्ट ले जा सकती है। अतीत में हमने देखा है कि महाराष्ट्र और उत्तराखंड के मामलों में अदालतों ने दखल देकर 24 से 48 घंटों के भीतर फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया था। अगर राज्यपाल का रुख नहीं बदलता है, तो कानूनी लड़ाई ही अंतिम विकल्प बचेगी।

लोकतंत्र और जनादेश की गरिमा

तमिलनाडु की जनता ने दशकों से चले आ रहे डीएमके-एआईएडीएमके के चक्र को तोड़कर विजय को एक अवसर दिया है। लोकतंत्र में संख्या बल महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रक्रियाओं की निष्पक्षता उससे भी अधिक आवश्यक है। राज्यपाल का पद किसी राजनीतिक दल के हितों को साधने के लिए नहीं, बल्कि संविधान की रक्षा के लिए है।

यदि सबसे बड़े दल को मौका नहीं दिया जाता, तो यह न केवल संवैधानिक परंपराओं का उल्लंघन होगा, बल्कि उन करोड़ों मतदाताओं का भी अपमान होगा जिन्होंने बदलाव की उम्मीद में वोट दिया है। अब देखना यह है कि राजभवन ‘संविधान की किताब’ के अनुसार चलता है या ‘राजनीति की बिसात’ के अनुसार। तमिलनाडु का यह फैसला आने वाले समय में देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक नजीर (Precedent) बनेगा।

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