ड्रोन जनरल: कैसे जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भारतीय सेना को तकनीकी ताकत में बदला

ड्रोन जनरल" कहना शुरू किया, तो यह केवल एक नाम नहीं था, बल्कि उनके नेतृत्व और योगदान की आधिकारिक पहचान थी। उन्होंने अपने कार्यकाल में भारतीय सेना के युद्ध लड़ने के तरीके को नई दिशा दी।

ड्रोन जनरल: जनरल उपेंद्र द्विवेदी के नेतृत्व में भारतीय सेना का सबसे बड़ा तकनीकी बदलाव

ड्रोन जनरल: जनरल उपेंद्र द्विवेदी के नेतृत्व में भारतीय सेना का सबसे बड़ा तकनीकी बदलाव

सेना में किसी अधिकारी को उपनाम (निकनेम) आसानी से नहीं मिलता। यह सम्मान उसके काम और उपलब्धियों के आधार पर दिया जाता है। जब भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने जनरल उपेंद्र द्विवेदी को “ड्रोन जनरल” कहना शुरू किया, तो यह केवल एक नाम नहीं था, बल्कि उनके नेतृत्व और योगदान की आधिकारिक पहचान थी। उन्होंने अपने कार्यकाल में भारतीय सेना के युद्ध लड़ने के तरीके को नई दिशा दी।

जनरल द्विवेदी की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल बड़ी संख्या में ड्रोन खरीदना नहीं थी। उन्होंने सेना की सोच बदली। उन्होंने सेना को नई तकनीक अपनाने के लिए तैयार किया और उसे आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुसार ढालने की शुरुआत की।

उनके कार्यभार संभालने से पहले भारतीय सेना के पास केवल कुछ सौ ड्रोन थे, जिनका सीमित उपयोग होता था। लेकिन 30 जून 2026 को उनके सेवानिवृत्त होने तक यह संख्या बढ़कर 50,000 से अधिक हो गई। देशभर के सैन्य ठिकानों पर 25 से ज्यादा ड्रोन और काउंटर-ड्रोन हब स्थापित किए गए। साथ ही ऐसी आधुनिक प्रणाली विकसित की गई, जो करीब 500 किलोमीटर दूर तक सटीक निशाना साध सकती है। यह बदलाव छोटा नहीं, बल्कि पूरी पीढ़ी के स्तर का परिवर्तन माना जा रहा है।

सिर्फ उपकरण बढ़ाना ही उनकी उपलब्धि नहीं थी। उन्होंने सेना के लिए लगभग 25 नई नीतियां, दिशानिर्देश और स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार करवाए। इनमें जमीनी युद्ध, अंतरिक्ष, रेड टीमिंग और आधुनिक सैन्य रणनीति जैसे विषय शामिल थे। इसके अलावा भैरव बटालियन, अश्नि प्लाटून और दिव्यास्त्र बैटरियां जैसी नई सैन्य इकाइयों का गठन किया गया, ताकि सेना आधुनिक तकनीक के साथ नए तरीके से युद्ध लड़ सके। यानी उन्होंने पुरानी सेना में सिर्फ ड्रोन नहीं जोड़े, बल्कि एक नई सोच वाली सेना की नींव रखी।

ऑपरेशन सिंदूर इस नई सैन्य रणनीति की पहली बड़ी परीक्षा साबित हुआ। इस अभियान में ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और खुफिया जानकारी का एक साथ प्रभावी उपयोग किया गया। इस अभियान ने दिखाया कि नई रणनीति केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि वास्तविक परिस्थितियों में भी सफल साबित हो सकती है।

हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि केवल 50,000 ड्रोन होने से ही सेना पूरी तरह आधुनिक नहीं बन जाती। इसके लिए बेहतर रणनीतिक फैसले, तीनों सेनाओं के बीच तालमेल और मजबूत रक्षा विनिर्माण व्यवस्था भी जरूरी है। जनरल द्विवेदी ने इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए आत्मनिर्भरता, नागरिक-सैन्य सहयोग और सैन्य कूटनीति को भी अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया।

सेवानिवृत्ति के बाद भी “ड्रोन जनरल” का यह नाम जनरल उपेंद्र द्विवेदी के साथ जुड़ा रहेगा। लेकिन इसकी असली अहमियत केवल उनके व्यक्तित्व में नहीं, बल्कि उस बदलाव में है जिसकी शुरुआत उन्होंने की। अब उनकी जगह आने वाले अधिकारियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या यह बदलाव सिर्फ उनके कार्यकाल तक सीमित रहेगा, या फिर भारतीय सेना की स्थायी पहचान बन जाएगा।

यही तय करेगा कि “ड्रोन जनरल” का नाम इतिहास का सिर्फ एक यादगार अध्याय बनकर रह जाएगा या भारतीय सेना के आधुनिक बदलाव की लंबी कहानी की पहली कड़ी साबित होगा।

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