भारत के विभाजन (Partition) की विरासत को लेकर एक बार फिर राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार पर आरोप लगाया है कि 1947 में लिए गए कुछ फैसलों की वजह से आज भी देश कई समस्याओं का सामना कर रहा है।
3 जून को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर किए गए एक पोस्ट में दुबे ने 1947 में लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा घोषित विभाजन योजना को “माउंटबेटन-नेहरू-जिन्ना समझौता” बताया। उन्होंने इसे भारत के इतिहास के सबसे दुखद अध्यायों में से एक कहा।
दुबे के अनुसार, विभाजन की नींव 10 से 12 मई 1947 के बीच शिमला में हुई बैठकों के दौरान रखी गई थी। उनका दावा है कि इन बैठकों में ब्रिटिश भारत के भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण फैसले लिए गए, जिनके परिणामस्वरूप भारत और पाकिस्तान का गठन हुआ। उन्होंने कहा कि उन फैसलों के प्रभाव आज भी देश की राजनीति और सुरक्षा से जुड़े मामलों में दिखाई देते हैं।
कश्मीर मुद्दे को विभाजन से जोड़ा
निशिकांत दुबे ने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को भी विभाजन के फैसलों से जोड़ा। उनका कहना है कि उस समय कश्मीर को अलग स्थिति में रखा गया, जिसके कारण यह समस्या पैदा हुई और स्वतंत्र भारत को आज तक इससे जूझना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि 3 जून 1947 की घोषणा ने ऐसे विवाद की नींव रखी, जो आगे चलकर स्वतंत्र भारत की सबसे जटिल समस्याओं में से एक बन गया। उनके मुताबिक, ब्रिटिश शासन के अंतिम दौर में लिए गए फैसलों का असर आज भी देश की रणनीतिक और राजनीतिक स्थिति पर पड़ रहा है।
गांधी को अंधेरे में रखने का आरोप
दुबे ने यह भी आरोप लगाया कि महात्मा गांधी को विभाजन से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रमों की पूरी जानकारी नहीं दी गई थी। उनका दावा है कि इतने बड़े राष्ट्रीय फैसलों से पहले गांधी की सहमति न तो ली गई और न ही उन्हें पूरी तरह भरोसे में लिया गया।
उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व पर आरोप लगाया कि देश के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर गांधी को किनारे कर दिया गया। अपने हमले को और तीखा करते हुए दुबे ने कहा कि नेहरू-गांधी परिवार को “देशद्रोही, धोखेबाज और राष्ट्र के साथ विश्वासघात करने वाला” के रूप में याद किया जाना चाहिए। उनके इस बयान से भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक टकराव और बढ़ने की संभावना है।
कांग्रेस के पुराने फैसलों पर फिर सवाल
दुबे की यह टिप्पणी भाजपा के उस व्यापक अभियान का हिस्सा मानी जा रही है, जिसमें स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस सरकारों द्वारा लिए गए फैसलों की समीक्षा की जा रही है।
कुछ दिन पहले, 30 मई को भी उन्होंने बांग्लादेश के साथ हुए जल-बंटवारे के समझौतों को लेकर कांग्रेस की आलोचना की थी। उनका आरोप था कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के कार्यकाल में हुए समझौतों से भारतीय किसानों और सीमा से जुड़े राज्यों के हित प्रभावित हुए। उन्होंने इन समझौतों को कांग्रेस के इतिहास का “काला अध्याय” बताया और कहा कि महत्वपूर्ण नदियों का पानी भारत की जरूरतों की कीमत पर साझा किया गया।
इतिहास पर राजनीति जारी
निशिकांत दुबे के हालिया बयान से यह साफ होता है कि भारत का विभाजन आज भी राजनीतिक बहस का महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है। 3 जून 1947 की घोषणा के लगभग 79 साल बाद भी उस समय लिए गए फैसलों और उनकी जिम्मेदारी को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों की राय अलग है।
कश्मीर का मुद्दा आज भी देश की राजनीति और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है। ऐसे में दुबे के बयान ने एक बार फिर विभाजन, कांग्रेस की भूमिका और 1947 के फैसलों के दीर्घकालिक प्रभावों पर राष्ट्रीय बहस को तेज कर दिया है।
