टीएमसी पर अस्तित्व का संकट गहराया: संसदीय बगावत ने पकड़ी रफ्तार, बागी खेमे से सायोनी घोष और माला रॉय के जुड़ने की चर्चा

टीएमसी इन दिनों अपने इतिहास के सबसे बड़े संगठनात्मक और राजनीतिक संकट की ओर बढ़ती नजर आ रही है। पश्चिम बंगाल में हालिया चुनावी झटके के बाद पार्टी के भीतर शुरू हुई अंदरूनी बगावत अब संसदीय स्तर तक पहुंच गई है, जिससे नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

टीएमसी पर अस्तित्व का संकट गहराया

टीएमसी पर अस्तित्व का संकट गहराया

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) इन दिनों अपने इतिहास के सबसे बड़े संगठनात्मक और राजनीतिक संकट की ओर बढ़ती नजर आ रही है। पश्चिम बंगाल में हालिया चुनावी झटके के बाद पार्टी के भीतर शुरू हुई अंदरूनी बगावत अब संसदीय स्तर तक पहुंच गई है, जिससे नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में वरिष्ठ सांसद काकली घोष दस्तिदार हैं, जो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व के खिलाफ संसदीय विद्रोह का प्रमुख चेहरा बनकर उभरी हैं। बागी नेताओं का दावा है कि उन्हें 19 सांसदों का समर्थन प्राप्त है। यदि यह दावा सही साबित होता है, तो यह टीएमसी के लोकसभा सांसदों की संख्या का लगभग दो-तिहाई हिस्सा होगा और पार्टी के शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल सकता है।

स्थिति तब और गंभीर हो गई जब खबरें सामने आईं कि अभिनेत्री से नेता बनीं सायोनी घोष और वरिष्ठ सांसद माला रॉय भी बागी खेमे के साथ जुड़ गई हैं। हालांकि दोनों नेताओं ने अभी तक इसकी सार्वजनिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन काकली घोष दस्तिदार ने इस संबंध में पूछे गए सवाल पर रहस्यमयी अंदाज में केवल हां कहा।

विधानसभा से संसद तक पहुंचा विद्रोह

संसदीय बगावत से पहले पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी पार्टी के भीतर असंतोष सामने आ चुका था। निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया था कि टीएमसी के 58 विधायक विधानसभा में एक अलग विपक्षी समूह के रूप में पहचाने गए हैं, जिससे पार्टी के अंदर गहरी दरार का संकेत मिला था।

रिपोर्टों के अनुसार, बागी सांसदों के हस्ताक्षर वाला एक पत्र लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कार्यालय को सौंप दिया गया है, हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

बागी नेताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होना नहीं है। काकली घोष दस्तिदार का कहना है कि उनका मकसद भाजपा की सदस्यता लेना नहीं, बल्कि भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का समर्थन करना है।

सोमवार को आई रिपोर्टों में दावा किया गया कि टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 ने लोकसभा अध्यक्ष को सूचित किया है कि वे अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी संसदीय दल से अलग होकर एनडीए के साथ जाना चाहते हैं। हालांकि, इन सांसदों की आधिकारिक सूची अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है।

टीएमसी नेतृत्व के भविष्य पर उठे सवाल

सायोनी घोष का नाम इस पूरे विवाद में इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उन्हें ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी दोनों का करीबी माना जाता रहा है। वर्ष 2021 में राजनीति में आने के बाद उन्होंने तेजी से पार्टी में अपनी पहचान बनाई। आसनसोल दक्षिण विधानसभा सीट से चुनाव हारने के बावजूद उन्हें टीएमसी युवा विंग की जिम्मेदारी दी गई और बाद में 2024 में उन्होंने प्रतिष्ठित जादवपुर लोकसभा सीट से जीत दर्ज की।

वहीं, माला रॉय भी पार्टी की वरिष्ठ नेताओं में गिनी जाती हैं। कांग्रेस और टीएमसी दोनों में राजनीतिक सफर तय कर चुकीं माला रॉय कोलकाता दक्षिण का प्रतिनिधित्व करती हैं और लंबे समय से ममता बनर्जी की करीबी मानी जाती रही हैं।

पार्टी नेतृत्व के एक वरिष्ठ नेता ने इस घटनाक्रम पर आश्चर्य जताते हुए कहा कि असंतोष की खबरों के बावजूद सायोनी घोष और माला रॉय को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं।

महुआ मोइत्रा ने बागियों को बताया ‘गद्दार’

टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने बागी गुट पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें गद्दार” करार दिया और उनके कदम की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर पोस्ट करते हुए उन्होंने कहा कि यदि बागी गुट के पास 19 सांसदों का समर्थन भी है, तब भी वे अलग संसदीय गुट नहीं बना सकते। उन्होंने 2023 के सुभाष देसाई मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि कानूनी रूप से एकमात्र रास्ता किसी अन्य राजनीतिक दल के साथ विलय का है, जिसके लिए मूल पार्टी के दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होती है।

फिलहाल बागी सांसदों की वास्तविक संख्या को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है, लेकिन इस संकट ने 1998 में टीएमसी की स्थापना के बाद पार्टी के सामने सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती खड़ी कर दी है। ममता बनर्जी के लिए अब यह केवल चुनावी नुकसान से उबरने का मामला नहीं रह गया है, बल्कि लगभग तीन दशक पहले स्थापित अपनी पार्टी की एकता और पहचान को बचाए रखने की बड़ी राजनीतिक लड़ाई बन चुका है।

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