पीएम मोदी ने शुक्रवार को देश की पहली हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इसके साथ ही भारतीय रेलवे ने स्वच्छ और आधुनिक तकनीक की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ाया है। इस उपलब्धि के साथ भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जिन्होंने रेलवे में हाइड्रोजन तकनीक का इस्तेमाल शुरू किया है।
यह ट्रेन फिलहाल नॉर्दर्न रेलवे के जींद-सोनीपत रेलखंड पर पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चलाई जाएगी। इस परियोजना का उद्देश्य यह समझना है कि भारतीय रेलवे के विशाल नेटवर्क में हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनों का इस्तेमाल कितनी प्रभावी तरीके से किया जा सकता है। इससे भविष्य में प्रदूषण कम करने और स्वच्छ परिवहन को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी।
डीजल ट्रेन से कैसे अलग है हाइड्रोजन ट्रेन?
हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन पारंपरिक डीजल इंजन वाली ट्रेनों से पूरी तरह अलग है। इसमें डीजल इंजन की जरूरत नहीं होती। यह ट्रेन अपनी बिजली खुद तैयार करती है। इसके लिए इसमें हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।
ट्रेन में 1200 किलोवाट क्षमता वाला प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन फ्यूल सेल (PEMFC) लगाया गया है। यह हाइड्रोजन और हवा में मौजूद ऑक्सीजन के बीच रासायनिक प्रक्रिया से बिजली बनाता है। इस प्रक्रिया के दौरान धुआं या जहरीली गैस नहीं निकलती। इसके बजाय केवल पानी की भाप और गर्मी निकलती है। यही वजह है कि इसे पर्यावरण के लिए बेहद सुरक्षित और स्वच्छ तकनीक माना जाता है।
ट्रेन में दो हाइड्रोजन पावर कार लगाई गई हैं, जिनमें उच्च दबाव वाले सिलेंडरों में हाइड्रोजन गैस रखी जाती है। यही गैस फ्यूल सेल तक पहुंचती है और लगातार बिजली बनाती रहती है। जब तक हाइड्रोजन की आपूर्ति होती रहती है, तब तक फ्यूल सेल को अलग से चार्ज करने की जरूरत नहीं पड़ती।
हाइड्रोजन ट्रेन के संचालन के साथ भारत अब जर्मनी, जापान, चीन और अमेरिका जैसे देशों की सूची में शामिल हो गया है, जो रेलवे में स्वच्छ और आधुनिक हाइड्रोजन तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। यह पहल भारतीय रेलवे को भविष्य की हरित और टिकाऊ परिवहन व्यवस्था की ओर ले जाने वाला महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
