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Explainer: अमेरिकी सांसद रिले मूर का बयान ही बताता है कि भारत को ज्यादा सख्त FCRA कानून की जरूरत क्यों है ?

TFI Desk द्वारा TFI Desk
6 August 2026
in चर्चित, फैक्ट चेक
अमेरिकी सांसद रिले मूर ने प्रस्तावित FCRA संसोधन विधेयक 2026 को ईसाईयों पर हमला बताया है

अमेरिकी सांसद रिले मूर ने प्रस्तावित FCRA संसोधन विधेयक 2026 को ईसाईयों पर हमला बताया है Credit: Getty Images

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अमेरिकी रिपब्लिकन सांसद रिले एम. मूर का एक सोशल मीडिया पोस्ट भारत में चर्चा का विषय बना हुआ है। उन्होंने दावा किया कि भारत का प्रस्तावित FCRA संशोधन विधेयक, 2026 ईसाइयों पर हमला है और इससे सरकार चर्चों व ईसाई धर्मार्थ संस्थाओं पर कब्जा कर सकेगी। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर यह कानून इसी रूप में पारित हुआ तो इसका असर भारत-अमेरिका संबंधों पर भी पड़ सकता है।
लेकिन यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। भारत का कानून भारतीय संसद बना रही है, उसका उद्देश्य विदेशी चंदे के इस्तेमाल को पारदर्शी बनाना है, फिर अमेरिका का एक सांसद इस पर इतनी तीखी प्रतिक्रिया क्यों दे रहा है?
यही सवाल इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू भी है। दरअसल, रिले मूर का बयान अनजाने में ही यह बताता है कि विदेशी फंडिंग पर निगरानी रखने वाला FCRA कानून भारत के लिए कितना जरूरी है। यदि विदेशी धन के नियमन भर से इतनी बेचैनी दिखाई दे रही है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर दांव पर क्या है।

पहले समझिए FCRA में नया क्या है ?

Foreign Contribution (Regulation) Act यानी FCRA कोई नया कानून नहीं है। इसे पहली बार 1976 में बनाया गया था। 2010 में नया कानून आया और 2020 में इसमें बड़े बदलाव किए गए। अब 2026 संशोधन का उद्देश्य विदेशी चंदे के इस्तेमाल में जवाबदेही और स्पष्टता बढ़ाना बताया गया है।
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस रद्द हो जाता है, सरेंडर कर दिया जाता है या समय पर नवीनीकरण नहीं होता, तो विदेशी चंदे से बनी संपत्तियों का क्या होगा, इसकी जिम्मेदारी एक ‘डिज़ाइनेटेड अथॉरिटी’ के पास होगी। अभी तक इस विषय पर स्पष्ट कानूनी व्यवस्था नहीं थी।
इसके अलावा निष्क्रिय या केवल कागजों पर चलने वाले NGOs को बाहर करने, विदेशी धन के समयबद्ध उपयोग को सुनिश्चित करने और प्रक्रियागत उल्लंघनों में अधिकतम सजा को 5 वर्ष से घटाकर 1 वर्ष करने का भी प्रस्ताव है। यानी जहां निगरानी बढ़ाई गई है, वहीं छोटे प्रक्रियागत मामलों में कानून को अपेक्षाकृत उदार भी बनाया गया है।

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दावा-1: सरकार चर्चों पर कब्जा कर लेगी
फैक्ट चेक: यह दावा अधूरा है।

रिले मूर ने कहा कि सरकार चर्चों और ईसाई संस्थाओं पर कब्जा कर सकेगी। जबकि विधेयक ऐसा नहीं कहता।
गृह मंत्रालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि यदि किसी संपत्ति का स्वरूप पूजा स्थल का है तो उसका धार्मिक चरित्र हर हाल में सुरक्षित रखा जाएगा। कानून केवल उन परिसंपत्तियों के प्रबंधन की व्यवस्था करता है जो विदेशी धन से बनाई गई हों और जिन संस्थाओं का FCRA लाइसेंस समाप्त हो चुका हो। इसे चर्चों के अधिग्रहण का अधिकार बताना विधेयक की भावना से मेल नहीं खाता।
दावा-2: कानून केवल ईसाइयों के खिलाफ है

फैक्ट चेक: दावा तथ्यों पर खरा नहीं उतरता।

FCRA किसी धर्म विशेष के लिए नहीं बना है। यह उन सभी संस्थाओं पर समान रूप से लागू होता है जो विदेश से धन प्राप्त करती हैं। चाहे संस्था मंदिर चलाती हो, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च, आश्रम, ट्रस्ट, अस्पताल या स्कूल – विदेशी चंदा लेने पर नियम सबके लिए समान हैं।
यदि कानून का दायरा सभी पर समान रूप से लागू है, तो उसे केवल ईसाई समुदाय पर हमला बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं कहा जा सकता।

दावा-3: धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला

फैक्ट चेक: अदालत की राय इससे अलग है।

सुप्रीम कोर्ट ने Noel Harper बनाम Union of India (2022) मामले में साफ कहा था कि विदेश से चंदा प्राप्त करना मौलिक अधिकार नहीं बल्कि सरकार द्वारा नियंत्रित किया जाने वाला विशेषाधिकार है। इसलिए सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और पारदर्शिता के लिए उस पर उचित शर्तें लगा सकती है। यही वजह है कि सरकार इस संशोधन को धार्मिक नहीं बल्कि नियामकीय सुधार बता रही है।

दुनिया के दूसरे देश क्या करते हैं?

रिले मूर जिस अमेरिका से आते हैं, वहीं Foreign Agents Registration Act (FARA) जैसे बेहद सख्त कानून लागू हैं। अमेरिका में विदेशी सरकारों या विदेशी हितों के लिए काम करने वालों को विस्तृत जानकारी सार्वजनिक करनी पड़ती है। ब्रिटेन ने भी विदेशी प्रभाव पर निगरानी के लिए अलग व्यवस्था बनाई है।
यानी जिस तरह अमेरिका और यूरोप विदेशी प्रभाव पर निगरानी को राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय मानते हैं, उसी तरह भारत भी विदेशी फंडिंग की पारदर्शिता सुनिश्चित करना चाहता है।

आंकड़े क्या कहानी कहते हैं ?

जुलाई 2026 तक देश में लगभग 14,449 सक्रिय FCRA पंजीकरण हैं। इसके मुकाबले 22,498 पंजीकरण रद्द किए जा चुके हैं, जबकि 15,212 लाइसेंस समाप्त हो चुके हैं।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2019 से 2022 के बीच FCRA के तहत पंजीकृत संस्थाओं को 55,741 करोड़ रुपये से अधिक का विदेशी अंशदान मिला। इतनी बड़ी राशि के प्रवाह पर प्रभावी निगरानी किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी मानी जाती है।

“चोर की दाढ़ी में तिनका” वाली कहावत क्यों याद आ रही है?

रिले मूर का पूरा बयान पढ़ने पर एक दिलचस्प बात सामने आती है। उन्होंने यह नहीं कहा कि कानून सभी NGOs पर लागू होगा। उन्होंने सीधे इसे ईसाई संस्थाओं पर हमला बताया।

यहीं कई विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि यदि कानून केवल विदेशी चंदे के नियमन की बात करता है तो सबसे पहले चिंता ईसाई मिशनरी संस्थाओं की ही क्यों जताई गई?  “चोर की दाढ़ी में तिनका” वाली कहावत इसलिए चर्चा में है क्योंकि यह प्रतिक्रिया खुद संकेत देती है कि विदेशी फंडिंग और धर्मांतरण को लेकर वर्षों से उठती रही आशंकाओं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, किसी भी संस्था या समुदाय पर आरोप तथ्यों और जांच के आधार पर ही तय होने चाहिए, केवल आशंकाओं के आधार पर नहीं।

रिले मूर का बयान जितना भारत सरकार की आलोचना करता दिखता है, उतना ही वह एक दूसरा संदेश भी देता है। विदेशी फंडिंग पर भारत जैसे ही निगरानी बढ़ाने की बात करता है, अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आ जाती है। ऐसे में यह बहस और मजबूत होती है कि विदेशी चंदे के इस्तेमाल, उससे बनी परिसंपत्तियों और संभावित बाहरी प्रभावों पर भारत के पास एक पारदर्शी, जवाबदेह और जरूरत पड़ने पर और अधिक सख्त FCRA व्यवस्था होनी चाहिए। आखिर किसी भी संप्रभु देश के लिए यह तय करने का अधिकार उसी का है कि उसके भीतर आने वाला विदेशी धन किन नियमों के तहत और किस उद्देश्य से इस्तेमाल होगा।

Tags: FCRAFCRA संशोधन विधेयक 2026अमेरिकी सांसदफैक्ट चेकभारतीय संसदमोदी सरकाररिले मूरसीनेटर
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