पिछले 12 वर्षों में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति की संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश ने एक बड़े स्तर पर रक्षात्मक रणनीति से आगे बढ़कर सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने और विदेशों में अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए अधिक सक्रिय, व्यवहारिक और मज़बूत दृष्टिकोण अपनाया है।चाहे सीमा पार किए गए सैन्य अभियान हों, रक्षा आधुनिकीकरण हो, वैश्विक साझेदारियों के विस्तार हों या फिर मजबूत कूटनीतिक उपस्थिति। इनके माध्यम से सरकार ने क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका को नए रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। समर्थक इसे भारत के बढ़ते रणनीतिक आत्मविश्वास का प्रतीक मानते हैं, जबकि आलोचक इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर बहस जारी रखते हैं। हालांकि इसमें कोई विवाद नहीं है कि आज भारत की रक्षा नीति और विदेश नीति का स्वरूप एक दशक पहले की तुलना में काफी अलग दिखाई देता है।
आतंकवाद का घर में घुस कर जवाब देने की नीति
मोदी सरकार की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक सीमा पार आतंकवाद के प्रति भारत की प्रतिक्रिया में आया बदलाव रहा है। वर्ष 2016 में नियंत्रण रेखा (LoC) के पार किए गए सर्जिकल स्ट्राइक ने पारंपरिक संयम की नीति से अलग एक नया संकेत दिया, जब भारत ने पहली बार आतंकवादी लॉन्च पैड्स पर की गई सैन्य कार्रवाई को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया। इसके तीन वर्ष बाद, बालाकोट एयर स्ट्राइक ने इस नीति को पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से आगे बढ़ाते हुए मेन लैंड पाकिस्तान के भीतर स्थित एक आतंकी ठिकाने तक पहुंचाया। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर ने भी सरकार के इस रुख को और मजबूत किया कि आतंकवादी हमलों का जवाब स्पष्ट और संतुलित कार्रवाई के रूप में दिया जाएगा। इन अभियानों ने मिलकर ऐसी सुरक्षा नीति को आकार दिया है, जो प्रतिरोधक क्षमता, जवाबी कार्रवाई और रणनीतिक संदेश देने पर आधारित है।
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और आधुनिकीकरण
रक्षा आधुनिकीकरण भी सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में रहा है। सरकार ने सैन्य खरीद प्रक्रिया को तेज किया है, राफेल लड़ाकू विमानों जैसे उन्नत प्लेटफॉर्म्स को वायुसेना के बेड़े में शामिल किया गया। मिसाइल क्षमताओं का विस्तार किया है और आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा दिया है। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) के पद का सृजन और तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय की दिशा में किए गए प्रयास भविष्य की युद्ध आवश्यकताओं के अनुरूप सैन्य ढांचे में सुधार की कोशिश को दर्शाते हैं, जिनका समुचित इस्तेमाल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी नज़र आया।
वैश्विक साझेदारियों का विस्तार और मज़बूत कूटनीतिक उपस्थिति
कूटनीतिक मोर्चे पर भी भारत ने पहले की तुलना में अधिक सक्रिय विदेश नीति अपनाई है। अमेरिका के साथ संबंधों में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है, वहीं फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, जापान और यूएई जैसे देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी भी मजबूत हुई है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में QUAD एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में उभरा है, जबकि विकास साझेदारियों और अंतरराष्ट्रीय मंचों के माध्यम से ग्लोबल साउथ के साथ भारत की भागीदारी को भी नई पहचान मिली है। वैश्विक संकटों के दौरान नागरिकों की सुरक्षित वापसी से लेकर बहुपक्षीय संस्थाओं में नेतृत्वकारी भूमिका तक, नई दिल्ली ने स्वयं को एक विश्वसनीय और प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है और वर्ष 2023 में नई दिल्ली में हुई G-20 समिट की कामयाबी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।
बारह वर्षों बाद, मोदी सरकार की रक्षा और विदेश नीति की विरासत सैन्य दृढ़ता, रणनीतिक साझेदारियों और आत्मनिर्भरता के प्रयासों के संयोजन के रूप में दिखाई देती है। रणनीतिक संयम से संतुलित और स्पष्ट जवाब की नीति की ओर बढ़ने से भारत की सुरक्षा सोच में महत्वपूर्ण बदलाव आया है, जबकि महत्वाकांक्षी कूटनीतिक पहल ने वैश्विक स्तर पर उसकी पहचान को मजबूत किया है। बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के बीच आने वाले वर्षों में यह परखा जाएगा कि ये नीतियां भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा, प्रभाव और रणनीतिक बढ़त को कितनी मजबूती प्रदान कर पाती हैं।


































