बिहार में बोर्ड परीक्षा के नतीजे अब सिर्फ इस बात का फैसला नहीं करेंगे कि छात्र पास हुआ या नहीं। राज्य सरकार ने 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं की मार्कशीट से ‘फेल’ शब्द हटाने का फैसला किया है। इसके बजाय ऐसे विद्यार्थियों की मार्कशीट पर ‘कौशल के लिए पात्र’ यानी ‘Eligible for Skill Training’ लिखा जाएगा।
बिहार के शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने 27 अगस्त को शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक में इस बदलाव की घोषणा की। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, इसे लागू करने के लिए नियमों में संशोधन किया जाएगा और उसके बाद बिहार विद्यालय परीक्षा समिति यानी BSEB को जरूरी निर्देश जारी किए जाएंगे। यानी यह फैसला घोषित हो चुका है, लेकिन इसकी औपचारिक प्रक्रिया अभी पूरी की जानी है।
‘फेल’ नहीं, आगे बढ़ने का दूसरा रास्ता
इस फैसले के पीछे सरकार का तर्क सिर्फ शब्द बदलना नहीं है। शिक्षा मंत्री के मुताबिक किसी परीक्षा में अपेक्षित अंक हासिल नहीं कर पाना किसी बच्चे की प्रतिभा का अंतिम प्रमाण नहीं हो सकता। ‘फेल’ जैसे शब्द से बनने वाले सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दबाव को कम करना इस बदलाव का प्रमुख उद्देश्य है।
नए सिस्टम में बोर्ड परीक्षा पास नहीं कर पाने वाले विद्यार्थियों के सामने एक वैकल्पिक रास्ता रखा जाएगा। उन्हें बिहार बोर्ड ऑफ ओपन स्कूलिंग एंड एग्जामिनेशन यानी BBOSE के जरिए वोकेशनल और स्किल ट्रेनिंग की दिशा में जाने का अवसर मिलेगा। इस तरह परीक्षा में कमजोर प्रदर्शन को शिक्षा से बाहर होने के बजाय दूसरे तरह के सीखने और रोजगार की ओर मोड़ने की कोशिश की जा रही है।
यहां एक बात समझना जरूरी है। ‘फेल’ शब्द हटने का मतलब यह नहीं है कि परीक्षा में पास होने के मानदंड खत्म हो जाएंगे। बदलाव मुख्य रूप से मार्कशीट पर इस्तेमाल होने वाली भाषा और उसके बाद उपलब्ध विकल्प से जुड़ा है।
सप्लीमेंट्री परीक्षा के लिए भी एक और मौका
बिहार शिक्षा विभाग ने सिर्फ मार्कशीट की भाषा बदलने पर जोर नहीं दिया है। मैट्रिक की सप्लीमेंट्री परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों के लिए एक महीने की विशेष कक्षाएं चलाने की योजना भी बताई गई है।
इसका मकसद विद्यार्थियों को दोबारा परीक्षा की बेहतर तैयारी का मौका देना और उन्हें मुख्यधारा की स्कूली शिक्षा में बने रहने में मदद करना है। यानी नीति में एक तरफ परीक्षा के बाद वैकल्पिक स्किलिंग का रास्ता है, तो दूसरी तरफ उन छात्रों के लिए सुधार का अवसर भी है जो दोबारा परीक्षा देकर अपनी स्थिति बदलना चाहते हैं।
‘नो-बैग डे’ से रचनात्मक सीखने तक
बिहार में यह बदलाव अकेला नहीं है। सरकारी स्कूलों में शनिवार को ‘नो-बैग डे’ लागू किया गया है। 8 अगस्त 2026 से सरकारी स्कूलों में शनिवार को आधे दिन की व्यवस्था के साथ बच्चों को किताबों के बोझ से अलग रचनात्मक और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों से जोड़ने पर जोर दिया गया है।
रिपोर्टों के मुताबिक इन गतिविधियों में नाटक, संगीत, कला और दूसरी क्रिएटिव एक्टिविटीज शामिल हैं। शनिवार को स्कूलों का समय 9:30 बजे से दोपहर 1 बजे तक रखा गया है।
इसका मतलब यह है कि बिहार की स्कूली शिक्षा में धीरे-धीरे यह विचार जगह बना रहा है कि बच्चों की क्षमता को केवल किताब, परीक्षा और अंक के जरिए नहीं देखा जाना चाहिए। ‘फेल’ को ‘स्किल के लिए पात्र’ कहना इसी सोच को परीक्षा परिणाम तक ले जाने की कोशिश है।
NITI Aayog भी कह रहा है—डिग्री से आगे बढ़ना होगा
बिहार के फैसले को देश में चल रही बड़ी शिक्षा और रोजगार बहस के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। NITI Aayog की मार्च 2026 की रिपोर्ट ‘Education and Skilling for Employment: From Credentials to Learning Outcomes’ में कहा गया है कि भारत में डिग्री या प्रमाणपत्र और वास्तविक learning outcomes के बीच gap है। रिपोर्ट के अनुसार केवल formal education बेहतर वेतन या आर्थिक गतिशीलता की गारंटी नहीं देती, क्योंकि कई विद्यार्थियों के पास रोजगार के लिए जरूरी skills की कमी रह जाती है।
रिपोर्ट में 2026 के आंकड़ों के आधार पर B.A. graduates की employability 55.6%, B.Com की 62.8% और B.Sc की 61% बताई गई है। यानी समस्या यह नहीं है कि सामान्य डिग्रियां बेकार हैं, बल्कि चुनौती यह है कि डिग्री के साथ रोजगार-उन्मुख कौशल, व्यावहारिक अनुभव और बेहतर learning outcomes कैसे जोड़े जाएं।
2026 की NITI रिपोर्ट में ‘स्कूल से स्किल’ पर जोर
NITI Aayog की अगस्त 2026 की ‘Reimagining Skilling for Viksit Bharat@2047’ रिपोर्ट इस दिशा को और स्पष्ट करती है। इसमें कहा गया है कि skilling स्कूल स्तर से शुरू होनी चाहिए और Grade 6 से employability तथा entrepreneurship skills को जोड़ने की जरूरत है। रिपोर्ट के अनुसार अभी secondary schools में vocational subjects की पहुंच सीमित है—12 में से एक से भी कम secondary schools vocational subjects उपलब्ध करा रहे हैं।
रिपोर्ट generic undergraduate degrees जैसे BA, BSc और BCom को खत्म करने की बात नहीं करती। इसके बजाय वह इन डिग्रियों में applied specialisations, industry linkage, apprenticeships और work-integrated learning बढ़ाने की जरूरत बताती है।
Economic Survey भी मांग रहा है industry-linked skilling
केंद्रीय Economic Survey 2025-26 भी इसी दिशा में वोकेशनल एजुकेशन और इंडस्ट्री के लिंक को मजबूत करने की जरूरत बताता है। सर्वे में आईटीआई (ITI) और नेशनल स्किल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (NSTI) के जरिए इंडस्ट्री आधारित कोर्स तथा भविष्य स्किल पर जोर दिया गया है। इसमें AI, IOT (Internet of Things), नवीन उर्जा और 3डी प्रिंटिंग जैसे क्षेत्रों से जुड़े कोर्स का भी उल्लेख है ।
यानी बिहार का ‘फेल’ से ‘स्किल के लिए पात्र’ तक का बदलाव सिर्फ एक शब्द बदलने की कवायद नहीं है। इसके पीछे एक बड़ी नीति-बहस दिखाई देती है—क्या हर बच्चे की सफलता को सिर्फ परीक्षा के नंबरों से मापा जाए, या उसके पास मौजूद कौशल, सीखने की क्षमता और रोजगार की तैयारी को भी उतना ही महत्व दिया जाए?
बिहार ने कम से कम अपनी मार्कशीट की भाषा में इस दूसरी सोच के लिए जगह बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। असली परीक्षा अब इसके क्रियान्वयन की होगी—क्या ‘स्किल ट्रेनिंग’ का विकल्प सिर्फ प्रमाणपत्र पर लिखा शब्द बनकर रह जाता है, या वास्तव में छात्रों को अच्छी ट्रेनिंग, प्रमाणन, अप्रेंटिसशिप और रोजगार तक पहुंचाने वाला रास्ता बनता है।
