
किसी देश के विकास को अगर एक तस्वीर में समेटना हो, तो शायद वह तस्वीर सड़कों, रेल लाइनों, बंदरगाहों, बिजली, हवाई अड्डों और घर-घर पहुंचते पानी के नलों की ही बनेगी। गुरुवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल के फैसलों की जानकारी देते हुए केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव कुछ ऐसा ही एक रिपोर्ट कार्ड लेकर आए- 2014 से पहले और 2014 के बाद, यानी 2026 तक, भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर का हिसाब-किताब। आंकड़ों के मुताबिक देश के कई बड़े बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में आज जो कुल क्षमता है, उसका आधे से लेकर करीब-करीब पूरा हिस्सा इन्हीं 12 वर्षों में जुड़ा है।
यह सिर्फ परियोजनाओं की गिनती भर नहीं थी। इसमें एक बदलाव की कहानी भी छिपी थी- भारत पारंपरिक सड़क और रेल निर्माण से आगे निकलकर सौर ऊर्जा, एक्सप्रेसवे, गैस पाइपलाइन, जलमार्ग और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे नए क्षेत्रों में भी बड़ा पैसा लगा रहा है।
परिवहन सेक्टर में सबसे तेज रफ्तार
बीते 12 सालों में सबसे ज्यादा तेजी परिवहन के क्षेत्र में दिखी है। एक्सप्रेसवे नेटवर्क जो कभी सिर्फ 1,000 किलोमीटर था, अब बढ़कर 6,700 किलोमीटर तक पहुंच चुका है- यानी 570% की छलांग। चार लेन और उससे बड़े राष्ट्रीय राजमार्ग 18,371 किलोमीटर से बढ़कर 49,515 किलोमीटर हो गए, करीब 170% ज्यादा। रेलवे के विद्युतीकरण में भी बड़ा उछाल आया है- 21,800 किलोमीटर से 60,800 किलोमीटर, यानी 179% की वृद्धि। हवाई अड्डों की संख्या 74 से बढ़कर 164 हो गई है, तो मेट्रो नेटवर्क 250 किलोमीटर से बढ़कर 700 किलोमीटर तक फैल चुका है।
ऊर्जा क्षेत्र में सबसे बड़ा बदलाव, सौर क्षमता 62 गुना हुई
अगर किसी एक सेक्टर में सबसे नाटकीय बदलाव देखना हो, तो वह ऊर्जा क्षेत्र है। सौर ऊर्जा क्षमता महज 2.6 गीगावाट से बढ़कर 162 गीगावाट पर पहुंच गई है- करीब 62 गुना, यानी 6,130% की वृद्धि। नवीकरणीय ऊर्जा की कुल क्षमता 54 गीगावाट से बढ़कर 204 गीगावाट हो चुकी है। बिजली उत्पादन क्षमता भी 249 गीगावाट से बढ़कर 540 गीगावाट तक पहुंची है, जबकि गैस पाइपलाइन नेटवर्क 15 हजार किलोमीटर से बढ़कर 26 हजार किलोमीटर हो गया है।
पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा तक पहुंच बढ़ी
जल जीवन मिशन के आंकड़े बताते हैं कि नल से पानी पाने वाले घरों की संख्या 17% से बढ़कर 80% हो गई है- कवरेज में 370% से ज्यादा की बढ़त। स्वास्थ्य के मोर्चे पर एम्स की संख्या 8 से बढ़कर 23 पहुंच गई है, मेडिकल कॉलेज 387 से बढ़कर 844 हो चुके हैं, और एमबीबीएस की सीटें 51,348 से बढ़कर करीब 1.39 लाख तक पहुंच गई हैं।
बंदरगाह, जलमार्ग और स्टार्टअप्स में भी बड़ी छलांग
देश के बंदरगाहों की क्षमता 800 MTPA से बढ़कर 2,760 MTPA हो गई है। अंतर्देशीय जलमार्गों पर होने वाली माल ढुलाई 29 MMT से बढ़कर 218 MMT तक पहुंच चुकी है, यानी करीब साढ़े छह गुना। राष्ट्रीय जलमार्गों की संख्या भी 5 से बढ़कर 32 हो गई है।
रक्षा निर्यात के आंकड़े और भी चौंकाने वाले हैं- 700 करोड़ रुपये से 48 गुना बढ़कर 33,424 करोड़ रुपये हो गया है। स्टार्टअप्स के मामले में तो तस्वीर और भी दिलचस्प है- मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की संख्या करीब महज 500 से 460 गुना बढ़कर 2.31 लाख हो गई है।
आंकड़े गति दिखाते हैं, असली परीक्षा अभी बाकी
ये तमाम आंकड़े इतना जरूर बताते हैं कि पिछले एक दशक में भारत ने इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की रफ्तार तेज की है। लेकिन किसी भी परियोजना की असली सफलता सिर्फ उसके बन जाने से तय नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि उसका असर लोगों की जिंदगी पर कितना पड़ता है। सड़कें तभी कामयाब मानी जाएंगी जब यात्रा और माल ढुलाई की लागत घटेगी। मेडिकल कॉलेज तभी सार्थक होंगे जब डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ेगी। और जल योजनाएं तभी सफल कहलाएंगी जब हर घर तक नियमित और साफ पानी पहुंचेगा।
यानी यह रिपोर्ट कार्ड निर्माण की रफ्तार तो दिखाता है, लेकिन इसकी असली परीक्षा आने वाले सालों में तय होगी जब इसे आर्थिक उत्पादकता में, रोजगार में, और आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ने वाले असर पर आंका जाएगा।