“गलती हुई है और हम सुधार करेंगे।” मेटा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग और उनकी टीम की ओर से भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के सामने व्यक्त किए गए खेद ने केवल एक कंपनी की कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं उठाए, बल्कि पूरी डिजिटल दुनिया में बिग-टेक कंपनियों की जवाबदेही, डेटा संप्रभुता और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कानूनी स्थिति पर नई बहस छेड़ दी है।
मेटा ने जिन मुद्दों पर अपनी चूक स्वीकार की, उनमें प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) और एआई से बने डीपफेक का प्रसार, व्यावसायिक लाभ के लिए कुछ कंटेंट को भुगतान लेकर अधिक लोगों तक पहुंचाना तथा कंटेंट मॉडरेशन और निगरानी में गंभीर कमियां शामिल हैं। सवाल यह है कि क्या यह केवल संचालन संबंधी त्रुटि है, या फिर उस कारोबारी मॉडल का परिणाम है जिसमें एल्गोरिद्म तय करता है कि लोगों को क्या देखना चाहिए?
क्या अब ‘सेफ हार्बर’ का तर्क कमजोर पड़ रहा है?
भारत के सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को “सेफ हार्बर” का संरक्षण देती है। इसका अर्थ है कि यदि कोई उपयोगकर्ता गैर-कानूनी सामग्री पोस्ट करता है तो सामान्य परिस्थितियों में उसकी सीधी कानूनी जिम्मेदारी प्लेटफॉर्म पर नहीं आती। लेकिन यह सुरक्षा तभी तक है, जब प्लेटफॉर्म केवल एक निष्पक्ष मध्यस्थ की तरह काम करे।
यहीं सबसे बड़ा कानूनी प्रश्न खड़ा होता है। यदि कोई कंपनी अपने एल्गोरिद्म के जरिए यह तय करती है कि किस पोस्ट को लाखों लोगों तक पहुंचाना है, किसे दबाना है और किसे अधिक दृश्यता देनी है, तो क्या वह केवल “मध्यस्थ” रह जाती है?
सरकार और विशेषज्ञों का तर्क है कि जब प्लेटफॉर्म कंटेंट के वितरण में सक्रिय भूमिका निभाता है, विशेषकर भुगतान लेकर किसी सामग्री को बढ़ावा देता है, तब उसकी भूमिका एक प्रकाशक जैसी दिखाई देने लगती है। ऐसे में भविष्य में “सेफ हार्बर” के दायरे और उसकी सीमाओं पर कानूनी बहस और तेज हो सकती है।
आंकड़े बताते हैं कि चिंता केवल भारत तक सीमित नहीं
बिग-टेक कंपनियों की कार्यप्रणाली को लेकर दुनिया भर में वर्षों से सवाल उठते रहे हैं। कई शोध और घटनाएं यह दिखाती हैं कि एल्गोरिद्म आधारित प्लेटफॉर्म केवल सूचना साझा करने का माध्यम नहीं रह गए हैं।
एमआईटी (MIT) के एक चर्चित अध्ययन में पाया गया कि फर्जी खबरें वास्तविक समाचारों की तुलना में लगभग 6 गुना तेजी से फैलती हैं और लगभग 70 प्रतिशत अधिक लोगों तक पहुंचती हैं। कारण साफ है—सनसनी, डर और विवाद लोगों का ध्यान अधिक आकर्षित करते हैं।
कैम्ब्रिज एनालिटिका प्रकरण में करीब 8.7 करोड़ फेसबुक उपयोगकर्ताओं का डेटा उनकी स्पष्ट सहमति के बिना राजनीतिक प्रोफाइलिंग और चुनावी प्रचार के लिए इस्तेमाल किया गया। इस घटना ने पहली बार यह दिखाया कि व्यक्तिगत डेटा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर सकता है।
वहीं फ्रांसेस हॉगेन द्वारा सार्वजनिक किए गए “फेसबुक पेपर्स” में दावा किया गया कि कंपनी के आंतरिक शोध में यह जानकारी सामने आई थी कि इंस्टाग्राम किशोरियों के मानसिक स्वास्थ्य और बॉडी इमेज संबंधी समस्याओं को बढ़ा सकता है, लेकिन इन निष्कर्षों के बावजूद एल्गोरिद्मिक बदलाव प्राथमिकता नहीं बने।
डीपफेक पर हुए हालिया अध्ययनों में भी सामने आया है कि ऑनलाइन उपलब्ध अधिकांश डीपफेक वीडियो गैर-सहमति वाले अश्लील या अपमानजनक स्वरूप के होते हैं, जिनका सबसे अधिक असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ता है। ऐसे में एआई तकनीक ने कंटेंट मॉडरेशन की चुनौती को और जटिल बना दिया है।
एल्गोरिद्म कैसे बन जाता है लोकतंत्र का खिलाड़ी?
सोशल मीडिया का पूरा कारोबारी मॉडल “अटेंशन इकोनॉमी” पर आधारित है। जितनी देर उपयोगकर्ता प्लेटफॉर्म पर रहेगा, उतना अधिक विज्ञापन राजस्व पैदा होगा। यही कारण है कि एल्गोरिद्म अक्सर उस सामग्री को प्राथमिकता देता है जिस पर लोग अधिक प्रतिक्रिया दें।
विशेषज्ञों के अनुसार गुस्सा, डर, विवाद और भावनात्मक ध्रुवीकरण वाली सामग्री सामान्य सूचनाओं की तुलना में अधिक एंगेजमेंट लाती है। परिणामस्वरूप कई बार एल्गोरिद्मिक सिस्टम अनजाने या जानबूझकर ऐसे कंटेंट की पहुंच बढ़ा देता है।
चुनावों के दौरान यही मॉडल और अधिक संवेदनशील हो जाता है। माइक्रो-टार्गेटिंग तकनीक के जरिए अलग-अलग मतदाताओं को उनकी रुचि और व्यवहार के आधार पर अलग-अलग संदेश दिखाए जा सकते हैं। यदि इनमें डीपफेक, भ्रामक सूचना या राजनीतिक प्रचार शामिल हो, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका बढ़ जाती है। इसलिए कई देशों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के चुनावी विज्ञापनों और एल्गोरिद्म की पारदर्शिता पर नए नियम बनाए जा रहे हैं।
क्या केवल माफी से बदलेगा सिस्टम?
इतिहास बताता है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़ी टेक कंपनी ने अपनी चूक स्वीकार की हो। कैम्ब्रिज एनालिटिका विवाद, अमेरिकी कांग्रेस में हुई सुनवाई और यूरोप में गोपनीयता संबंधी मामलों के दौरान भी टेक कंपनियों ने माफी मांगी थी। लेकिन उसके बाद भी नियामकों को लगातार नए नियम बनाने पड़े।
इसी अनुभव के आधार पर कई विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल सार्वजनिक माफी पर्याप्त नहीं होगी। यदि जवाबदेही सुनिश्चित करनी है तो कानून और तकनीक दोनों स्तर पर सुधार जरूरी होंगे।
इनमें सबसे महत्वपूर्ण है एल्गोरिद्म की पारदर्शिता, ताकि स्वतंत्र एजेंसियां यह जांच सकें कि किस प्रकार का कंटेंट किस आधार पर बढ़ावा दिया जा रहा है। यूरोपीय संघ के डिजिटल सर्विसेज एक्ट (DSA) में इसी दिशा में महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं।
इसके अलावा, सीएसएएम और गंभीर डीपफेक मामलों में केवल आर्थिक जुर्माना ही नहीं, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने की मांग भी लगातार उठ रही है।
विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते हैं कि राजनीतिक और संवेदनशील विज्ञापनों के लिए सार्वजनिक विज्ञापन रजिस्टर बनाया जाए, जिसमें यह स्पष्ट हो कि विज्ञापन किसने खरीदा, कितना पैसा खर्च हुआ और किस वर्ग के लोगों को लक्ष्य बनाया गया।
आगे की सबसे बड़ी चुनौती
मेटा की ओर से व्यक्त किया गया खेद केवल एक कंपनी की स्वीकारोक्ति नहीं माना जा रहा, बल्कि उस डिजिटल व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न है जिसमें एल्गोरिद्म अरबों लोगों की सूचना खपत को प्रभावित करते हैं। आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि नवाचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा, डेटा संप्रभुता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए।
संभव है कि भविष्य की बहस “सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म” बनाम “कंटेंट पब्लिशर” की कानूनी परिभाषा के इर्द-गिर्द घूमे। लेकिन इतना तय है कि बिग-टेक कंपनियों के लिए केवल यह कहना कि वे महज तकनीकी मंच हैं, अब पहले जितना सरल नहीं रह गया है। जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग अब पहले से कहीं अधिक मजबूत होकर सामने आ रही है।
