पाकिस्तान की मुस्लिम NATO रणनीति फेल, लाल सागर में पाकिस्तानी नाविकों की मौत

तिहामा जहाज पर मिसाइल हमले में 3 पाकिस्तानी नाविकों की मौत; सऊदी-तुर्की रक्षा समझौते के बीच समुद्री सुरक्षा पर उठे सवाल

Muslim NATO

लाल सागर में एक कमर्शियल जहाज पर हुआ हमला पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक समुद्री हादसा नहीं है। इस घटना ने उसकी विदेश नीति और समुद्री सुरक्षा को लेकर एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मजबूत सैन्य साझेदारियां संकट के वक्त उसके नागरिकों की सुरक्षा में भी बदल पाती हैं?

11 अगस्त को बाब-अल-मंदेब के पास तंजानिया के झंडे वाले कार्गो जहाज तिहामा पर हूती विद्रोहियों ने मिसाइल हमला किया। यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री के मुताबिक, ईरान-समर्थित हूतियों ने खाद्य सामग्री ले जा रहे इस जहाज पर तीन बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, जिससे जहाज में आग लग गई और तीन पाकिस्तानी नाविकों समेत एक इंडोनेशियाई क्रू सदस्य की मौत हो गई। इसके बाद जब यमनी रेस्क्यू टीम बचाव अभियान के लिए पहुंची, तभी एक और मिसाइल दागी गई, जिसमें यमन की नेशनल रेजिस्टेंस फोर्सेज के दो जवान भी मारे गए। कुल मिलाकर इस हमले में छह लोगों की जान गई और करीब 10 लोग घायल हुए। हूतियों ने आधिकारिक तौर पर हमले की जिम्मेदारी नहीं ली, लेकिन एक हूती-संबद्ध मीडिया आउटलेट ने दावा किया कि उनके बलों ने सऊदी सैन्य साजो-सामान ले जा रहे एक जहाज को निशाना बनाया था।

यह इलाका लंबे समय से समुद्री हमलों के खतरे में है। लेकिन  फरवरी में शुरू हुए ईरान युद्ध के बाद से शिपिंग पर यह पहला जानलेवा हूती हमला था। और ये हमला इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि क्योंकि सिर्फ चार दिन पहले, 7 अगस्त को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते (‘मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट’) पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते के मुताबिक तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति को साझा खतरे के तौर पर देखा जाएगा। यही वजह है कि तिहामा हादसे के बाद पाकिस्तान की रणनीतिक साझेदारी को लेकर बहस शुरू होना स्वाभाविक है।

समझौते की सीमा क्या है ?

पाकिस्तान लंबे समय से सऊदी अरब और तुर्की के साथ अपने रक्षा संबंधों को अपनी रणनीतिक ताकत के तौर पर पेश करता रहा है। दोनों देशों के साथ सैन्य अभ्यास, रक्षा सहयोग और हथियारों से जुड़े प्रोजेक्ट इस रिश्ते को मजबूत आधार देते हैं।

तुर्की के साथ पाकिस्तान का नौसैनिक सहयोग भी इसका उदाहरण है। दोनों देशों के बीच बाबर क्लास कॉर्वेट जैसे रक्षा प्रोजेक्ट हुए हैं। वहीं सऊदी अरब पाकिस्तान का लंबे समय से आर्थिक और रणनीतिक साझेदार रहा है — दोनों देशों के बीच सितंबर 2025 में ही रियाद में एक द्विपक्षीय रक्षा समझौता हो चुका था, जिस पर मक्का समझौता आगे बना।

बाब-अल-मंदेब क्यों इतना अहम है?

बाब-अल-मंदेब दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री चोक प्वाईंट में से एक है। लाल सागर के रास्ते एशिया और यूरोप के बीच होने वाला व्यापार इस समुद्री मार्ग से जुड़ा है। यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव सिर्फ स्थानीय जहाजों को प्रभावित नहीं करता, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन और शिपिंग लागत पर भी असर डाल सकता है। पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में जहाजों पर हमलों ने जोखिम और बढ़ाया है। 2026 में पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव ने समुद्री सुरक्षा की तस्वीर को और जटिल बना दिया है। हूतियों ने पिछले महीने सऊदी अरब के खिलाफ नौसैनिक नाकेबंदी की घोषणा भी की थी, जिसके बाद से बाब-अल-मंदेब से गुजरने वाले जहाजों की तादाद पहले के मुकाबले काफी घट गई है।

पाकिस्तान के सामने असली चुनौती

तिहामा हादसा पाकिस्तान को अपनी समुद्री सुरक्षा नीति के एक दूसरे पहलू पर सोचने का मौका देता है। विदेशी जहाजों पर बड़ी संख्या में पाकिस्तानी नागरिक काम करते हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि पाकिस्तान के कितने युद्धपोत हैं या उसके कितने देशों के साथ रक्षा समझौते हैं। सवाल यह भी है कि युद्ध जैसे हालात वाले समुद्री इलाकों में अपने नागरिकों को लेकर उसकी रिस्क मॉनिटरिंग और संकट प्रबंधन व्यवस्था कितनी मजबूत है।

‘मुस्लिम NATO’ से आगे की हकीकत

पाकिस्तान-सऊदी-तुर्की साझेदारी को ‘मुस्लिम NATO’ जैसे बड़े रणनीतिक फ्रेम में देखना आकर्षक हो सकता है, लेकिन किसी भी गठबंधन की असली क्षमता उसके घोषित उद्देश्यों से ज्यादा उसके ऑपरेशनल ढांचे से तय होती है। खुद पाकिस्तानी और अंतरराष्ट्रीय रक्षा विश्लेषक भी इस समझौते की तुलना NATO के आर्टिकल-5 जैसी सीधी प्रतिबद्धता से करने के प्रति आगाह करते रहे हैं।

क्योंकि किसी देश की रणनीतिक ताकत का आकलन सिर्फ उसके युद्धपोतों और रक्षा समझौतों से नहीं होता। उसकी असली परीक्षा तब होती है, जब उसके नागरिक किसी दूर समुद्री क्षेत्र में खतरे के बीच फंसते हैं। पहले ही विरोधाभासों में घिरे इस समझौते की असल परीक्षा तो बाद में होगी पर मिलने वाले संकेत बता रहे हैं कि पाकिस्तान की जनता के लिए प्रोपेगेंडा मैनेजमेंट और युद्ध में दोनो में बहुत अंतर है ।

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