
छात्र आंदोलन जब–जब सड़कों पर उतरता है, तब–तब सत्ता और व्यवस्था के गलियारों में हलचल होती है, लेकिन बीते दिनों देश ने छात्र प्रदर्शनों के दो बिल्कुल अलग चेहरे देखे हैं। एक चेहरा दिल्ली के जंतर–मंतर का था, जहां छात्र हितों की आड़ में राजनीतिक हित साधे गए और व्यवस्था पर सवाल उठाने के नाम पर अराजकता को बढ़ावा दिया गया। इसके ठीक उलट, दूसरा चेहरा झारखंड की राजधानी रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम का है, जहां बिना किसी गाली–गलौज, अभद्रता और राजनीतिक मंच के युवाओं ने अपनी वाजिब मांगों के लिए एक अनुशासित और ऐतिहासिक मोर्चा संभाल रखा है। यह तुलना केवल दो अलग शहरों की नहीं है, बल्कि यह तुलना दो विचारधाराओं, दो शैलियों का भी है।
रांची बनाम जंतर मंतर: एक नजर में फर्क
| पहलू | जंतर मंतर आंदोलन | रांची आंदोलन |
|---|---|---|
| नेतृत्व | सोनम वांगचुक और CJP, एकजुट मंच, एक मांग | दो अलग मंच, बिखरी हुई मांगें |
| उम्र समूह | मुख्यतः 14-29 वर्ष, Gen-Z केंद्रित | 20 से 40 वर्ष तक के अभ्यर्थी |
| मुख्य मुद्दा | NEET पेपर लीक | पेपर लीक, बैकडोर भर्ती, OMR हेराफेरी, कैलेंडर उल्लंघन |
| पोस्टर–बैनर | मीम भाषा, रील और डांस वीडियो | परंपरागत हस्तलिखित नारे |
| भाषा–अनुशासन | विवादित भाषा, बार–बार चर्चा में | गाली–गलौज रहित, संयमित भाषा पर जोर |
दिल्ली का जंतर–मंतर हमेशा से विरोध–प्रदर्शनों का मुख्य केंद्र रहा है, लेकिन हालिया प्रदर्शनों में जो देखा गया, उसने देश के जागरूक नागरिकों को निराश किया है। वहां छात्र आंदोलन के नाम पर संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ भद्दी भाषा का इस्तेमाल हुआ और विपक्षी नेताओं व वामपंथी धड़ों ने आंदोलन का माइक अपने हाथों में ले लिया। देखते ही देखते अभ्यर्थियों की मुख्य मांगें पीछे छूट गईं और सरकार विरोधी व भड़काऊ नारे हावी हो गए। धरने के नाम पर पब्लिसिटी स्टंट और सोशल मीडिया रील्स बनाने की होड़ नजर आई, जिससे असल में युवाओं के भविष्य की चिंता करने के बजाय इसे राष्ट्रीय राजनीति का लॉन्चिंग पैड बना दिया गया। जब किसी छात्र आंदोलन में परीक्षा की धांधली से ज्यादा राजनीतिक एजेंडा गूंजने लगे, तो वह प्रदर्शन छात्रों का न रहकर राजनीतिक आकाओं का बन जाता है।
इसके ठीक विपरीत, झारखंड में JPSC और JSSC पेपर लीक के खिलाफ सड़कों पर उतरे अभ्यर्थियों ने देश के सामने राष्ट्रधर्म और मर्यादा की एक नई मिसाल पेश की है। रांची में छात्रों ने खुद अपने आंदोलन स्थल पर सख्त दिशा–निर्देश लागू किए, जिनमें साफ हिदायत दी गई कि कोई राजनीतिक नारा, गाली या असंसदीय व्यवहार नहीं होगा। जब कुछ बाहरी तत्वों ने आंदोलन को भटकाने की कोशिश की, तो आम छात्रों ने खुद उन्हें रोक दिया और मंच से दूर कर दिया। रांची के अभ्यर्थी सरकार या संवैधानिक संस्थाओं को नीचा दिखाने नहीं आए हैं, बल्कि उनकी लड़ाई पारदर्शी परीक्षा प्रणाली, सीबीआई जांच और एक जवाबदेह व्यवस्था के लिए है। रांची का युवा पढ़ता भी है और अपने हक के लिए शांतिपूर्ण व अनुशासित ढंग से लड़ना भी जानता है, जिससे उसने यह साबित कर दिया कि अधिकार की मांग और राष्ट्रभक्ति एक साथ चल सकती हैं।
जंतर मंतर के प्रदर्शन को जहां विपक्षी पार्टियों का खुला समर्थन मिल रहा था। वहीं रांची के प्रदर्शन के लिए सीजेपी और राहुल गांधी का भी सिर्फ मौखिक कामचलाउ समर्थन ही है। इसके अलावा भी दोनो आंदोलनों में कुछ और अंतर भी हैं जो दो भारत और इंडिया को आपके सामने प्रतिबिंबित करते हैं।
बंटा हुआ आंदोलन, एक जैसा मंच नहीं
जंतर मंतर पर जहां सोनम वांगचुक और क्राकरोच जनता पार्टी एक साथ खड़े हुए थे। दोनो की मांगें भी शुरुआत में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफे से ही जुड़ी थी। वहीं रांची में तस्वीर अलग है। एक ही धरनास्थल पर दो अलग मंच बने हैं। मांगें भी बंटी हुई हैं। जहां एक धड़ा 14वीं JPSC सीसीई परीक्षा रद्द करने, CBI जांच और भर्ती प्रणाली में बड़े सुधार की मांग कर रहा है।वहीं दूसरा धड़ा फास्ट–ट्रैक कोर्ट, राज्य के शिक्षा मंत्री के इस्तीफे, दोषियों को कड़ी सजा और आरोपियों की जमानत शर्तें सख्त करने पर अड़ा है। दो पन्नों के मांग–पत्र में पुरानी परीक्षाओं की जांच की मांग भी जोड़ी गई है। तीसरा एक मोर्चा AISA हथियाने की कोशिश कर रही थी मगर उसे रांची के युवाओं में कुछ खास समर्थन नहीं मिला।
उम्र का फासला भी बड़ा फर्क
जंतर मंतर आंदोलन को Gen-Z का आंदोलन कहा गया। वहां जुटे ज्यादातर प्रदर्शनकारी 14 से 29 साल की उम्र के बीच थे। वहीं रांची में तस्वीर अलग है। यहां 20 से 40 साल तक के अभ्यर्थी सड़क पर हैं। वजह साफ है — JPSC और JSSC परीक्षाओं की अधिकतम उम्र सीमा 35 से 40 साल तक जाती है।
एक परीक्षा नहीं, पूरा सिस्टम कठघरे में
जंतर मंतर आंदोलन का केंद्र एक परीक्षा थी — NEET पेपर लीक तक सीमित था और इसकी पेपर लीक के लिए शिक्षा मंत्री का इस्तीफा चाहते थे। मगर रांची का गुस्सा किसी एक परीक्षा तक सीमित नहीं बल्कि कहीं ज्यादा व्यापक है। यहां छात्रों ने पेपर लीक, पिछले दरवाजे से भर्ती, कट–ऑफ न बताने और OMR शीट में हेराफेरी तक के आरोप लगाए हैं। शिकायत यह भी है कि JPSC और JSSC अपने ही तय कैलेंडर पर परीक्षाएं नहीं कराते। जब परीक्षाएं होती भी हैं, तो अनियमितता और लीक के चलते या तो रद्द हो जाती हैं, या अदालत में उलझ जाती हैं।
पोस्टर की भाषा बताती है असली अंतर
Gen-Z मीम कल्चर में पला–बढ़ा है। NCR के युवा ज्यादा आकर्षित थे इसलिए जंतर मंतर पर बैनर–पोस्टर मीम भाषा में लिखे थे। प्रदर्शनकारी ज्यादातर रील बना रहे थे। लेकिन रांची में पोस्टर परंपरागत अंदाज़ में हैं। मुख्य मंच के पास हाथ से लिखे पोस्टर ही टंगे हुए हैं।
भाषा और अनुशासन में सबसे बड़ा फर्क
सबसे अहम अंतर भाषा का है। रांची के प्रदर्शनकारी और झारखंड के नेता बार–बार यह बात दोहराते हैं — उनके आंदोलन में किसी के खिलाफ अपशब्द या गाली–गलौज नहीं हुई। धरनास्थल पर अनुशासन बनाए रखने की पूरी कोशिश हो रही है। जंतर मंतर पर इस्तेमाल हुई भाषा आंदोलन के दौरान और बाद में भी चर्चा का विषय बनी रही। वहीं झारखंड के छात्रों ने देशभर में राज्य की छवि ऊंची रखी है। न किसी का नाम लिया गया, न ही किसी आजादी के नारे लगे।
रांची के युवाओं ने दिखा दिया कि व्यवस्था से सवाल पूछने के लिए अराजक होने की जरूरत नहीं है। यदि छात्र आंदोलनों को अपनी विश्वसनीयता बनाए रखनी है, तो उन्हें जंतर–मंतर की ‘टूलकिट संस्कृति‘ को खारिज करना होगा और रांची के ‘अनुशासित सत्याग्रह‘ के रास्ते पर चलना होगा।