तमिलनाडु में हिंदी को लेकर विवाद एक बार फिर सड़क से अस्पताल तक पहुंच गया है। कुछ दिन पहले तूतुकुड़ी जिले में राज्य राजमार्ग के एक दिशा-सूचक बोर्ड पर तमिल और अंग्रेजी के साथ हिंदी दिखाई दी। राजनीतिक विरोध के बाद हिंदी के अक्षर हटा दिए गए और दो हाईवे इंजीनियरों को निलंबित कर दिया गया। अब करूर और कोयंबटूर के सरकारी अस्पतालों में दवा देने के भूरे रंग के कवर पर हिंदी लिखे होने से नया विवाद खड़ा हो गया है।
डीएमके नेता और पूर्व उद्योग मंत्री टीआरबी राजा ने कोयंबटूर के कवर की तस्वीर साझा करते हुए सवाल उठाया कि क्या तमिलनाडु के अस्पतालों में भी तीन-भाषा नीति लागू की जा रही है। मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि हाईवे विवाद के कुछ ही दिन बाद दवा के कवर पर हिंदी सामने आई है।
पहले हाईवे बोर्ड, अब दवा का कवर
2 अक्टूबर को तूतुकुड़ी जिले में SH-93 के एक दिशा-सूचक बोर्ड पर तिरुनेलवेली, आल्वारथिरुनगरी, तूतुकुड़ी और तिरुचेंदूर जैसे स्थानों के नाम तमिल, अंग्रेजी और हिंदी में लिखे दिखाई दिए।
बोर्ड राज्य हाईवे विभाग के अधीन था। हिंदी को लेकर विरोध शुरू होने के बाद उसके अक्षर हटा दिए गए और दो अधिकारियों—असिस्टेंट डिविजनल इंजीनियर भूमिनाथन और असिस्टेंट इंजीनियर मुथुलक्ष्मी—को निलंबित कर दिया गया। सरकार ने इसे राज्य की दो-भाषा नीति के खिलाफ माना।
यानी एक तरफ सरकार ने हाईवे बोर्ड से हिंदी हटाई, दूसरी तरफ कुछ ही दिनों बाद सरकारी अस्पतालों के दवा कवर पर हिंदी सामने आ गई। इसी वजह से विपक्ष ने दोनों घटनाओं को जोड़ते हुए सवाल उठाया कि क्या सरकारी संस्थानों में हिंदी की मौजूदगी बढ़ रही है?
दवा के कवर पर क्या लिखा था?
करूर और कोयंबटूर के सरकारी अस्पतालों में इस्तेमाल हुए भूरे कवर पर दवा लेने से संबंधित निर्देश थे। इसमें मरीजों को दवा सुबह, दोपहर और रात कब लेनी है, इसकी जानकारी दी गई थी।
निर्देश तमिल और अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी छपे थे। तस्वीरें सामने आने के बाद मामला सोशल मीडिया और फिर राजनीतिक बहस में पहुंच गया। टीआरबी राजा ने इसे तमिलनाडु की दो-भाषा नीति से जोड़ते हुए सवाल उठाया कि क्या अस्पतालों में तीन-भाषा व्यवस्था लागू की जा रही है। लेकिन यहां कहानी का दूसरा पक्ष भी है।
क्या कोयंबटूर में अचानक हिंदी लागू की गई?
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक ऐसा कहना सही नहीं होगा। कोयंबटूर अस्पताल प्रशासन ने बताया कि ये कवर कोई नया प्रयोग नहीं थे। अस्पताल के अधिकारियों के अनुसार ऐसे कवर 18 महीने से ज्यादा समय से इस्तेमाल किए जा रहे थे और पिछली सरकार के समय भी इनका इस्तेमाल हुआ था।
इन कवरों की छपाई चिंतामणि कोऑपरेटिव सोसाइटी के जरिए प्रायोजकों की मदद से हुई थी। यानी उपलब्ध जानकारी में ऐसा कोई आदेश सामने नहीं आया है जिसमें तमिलनाडु सरकार ने सरकारी अस्पतालों में हिंदी को अनिवार्य करने का निर्देश दिया हो। विवाद सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन ने पुराने कवर का इस्तेमाल रोकने और तमिल तथा अंग्रेजी वाले नए कवर इस्तेमाल करने का फैसला किया।
करूर में मामला कैसे सामने आया?
करूर की कहानी कुछ अलग है। सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के डीन के मुताबिक अस्पताल में आम तौर पर सादे भूरे कवर इस्तेमाल होते हैं। फार्मेसी कर्मचारी उन पर जरूरत के मुताबिक तमिल में दवा संबंधी निर्देश की मुहर लगाते हैं।
लेकिन कवर की कमी होने पर दिसंबर 2025 में ईरोड की एक सहकारी प्रिंटिंग प्रेस से कवर मंगाए गए। अस्पताल प्रशासन का कहना है कि उसने प्रिंटर को हिंदी, अंग्रेजी और तमिल में निर्देश छापने के लिए नहीं कहा था। प्रिंटर की तरफ से बड़े आकार के कवर पर ये शब्द छापे गए और बाद में इनका इस्तेमाल हुआ। सोशल मीडिया पर विवाद सामने आने के बाद इन कवरों का इस्तेमाल रोक दिया गया।
इसलिए करूर के मामले में भी उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर इसे सीधे तमिलनाडु सरकार की नई तीन-भाषा नीति का परिणाम कहना मुश्किल है।
प्रवासी मरीजों का सवाल भी अहम
इस विवाद का एक व्यावहारिक पहलू भी है। कोयंबटूर बड़ा औद्योगिक केंद्र है और यहां दूसरे राज्यों से आए बड़ी संख्या में कामगार रहते हैं। सरकारी अस्पतालों में ऐसे मरीज भी पहुंचते हैं जिन्हें तमिल नहीं आती।
अस्पताल के कुछ फार्मासिस्टों ने कहा कि हिंदी में दवा लेने के निर्देश ऐसे मरीजों के लिए उपयोगी थे। अगर कवर पर केवल तमिल और अंग्रेजी रहेगी तो दवा की खुराक और समय उन्हें अलग से समझाना पड़ सकता है।
इसलिए यहां दो सवाल एक साथ खड़े होते हैं कि राज्य की भाषा नीति का सम्मान कैसे हो और दूसरे राज्यों से आए मरीजों को दवा की सही जानकारी कैसे मिले? दवा के मामले में भाषा का सवाल सिर्फ राजनीतिक पहचान का नहीं, मरीज की सुरक्षा का भी हो सकता है।
क्या हर हिंदी शब्द ‘हिंदी थोपना’ है?
यही इस विवाद का मूल सवाल है। डीएमके नेताओं का तर्क है कि सरकारी संस्थानों में हिंदी की मौजूदगी को सामान्य बनाना आगे चलकर तीन-भाषा व्यवस्था की दिशा में कदम हो सकता है। दूसरी तरफ अस्पताल प्रशासन की ओर से सामने आए तथ्य बताते हैं कि कोयंबटूर के कवर लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे थे और करूर के मामले में भी प्रिंटर की भूमिका बताई गई है।
इसलिए ‘कवर पर हिंदी छपी’ और ‘सरकार ने तीन-भाषा नीति लागू कर दी’, इन दोनों बातों को एक नहीं माना जा सकता। उपलब्ध रिपोर्टों में तमिलनाडु सरकार का ऐसा कोई नया आदेश सामने नहीं आया है, जिसमें सरकारी अस्पतालों में हिंदी को अनिवार्य किया गया हो।
हाईवे से अस्पताल तक पहुंची भाषा की राजनीति
फिर भी राजनीतिक संदेश महत्वपूर्ण है। कुछ दिन पहले हिंदी को लेकर विवाद हाईवे के साइनबोर्ड पर था। वहां सरकार ने हिंदी हटाई और दो अधिकारियों पर कार्रवाई की। अब विवाद दवा के कवर तक पहुंच गया है।
यानी तमिलनाडु में हिंदी का मुद्दा सिर्फ स्कूल, परीक्षा या केंद्र की भाषा नीति तक सीमित नहीं है। सरकारी कामकाज की छोटी-सी चीज भी राजनीतिक बहस का कारण बन सकती है। और यही इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी कहानी है कि एक तरफ तमिलनाडु की दो-भाषा नीति और तमिल पहचान, दूसरी तरफ दूसरे राज्यों से आए लोगों की रोजमर्रा की जरूरत।
हाईवे के बोर्ड से लेकर अस्पताल की दवा तक, सवाल अब सिर्फ यह नहीं रह गया है कि हिंदी कहां लिखी जा सकती है। सवाल यह भी है कि तमिलनाडु अपनी भाषाई नीति को कायम रखते हुए बदलती आबादी और दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों की व्यावहारिक जरूरतों का समाधान कैसे करेगा।
फिलहाल इतना साफ है कि तमिलनाडु में हिंदी को लेकर राजनीतिक संवेदनशीलता बरकरार है—और आने वाले दिनों में सरकारी संस्थानों में भाषा से जुड़े छोटे से छोटे फैसले भी बड़े राजनीतिक मुद्दे बन सकते हैं।






























