सऊदी-पाक-तुर्की का ‘सुपर ब्लॉक’: तीनों में से किसी एक पर हमला तो तीनों मिलकर लड़ेंगे जंग; क्या है भारत का प्लान ?

पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में इस हफ्ते एक बड़ा उलटफेर हुआ है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की- तीनों देशों ने जेद्दा में मिलकर एक ऐतिहासिक त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर दस्तखत कर दिए हैं। इस डील की सबसे चौंकाने वाली बात इसका सामूहिक सुरक्षा प्रावधान है। इसके मुताबिक अगर तीनों में से किसी भी एक देश पर सशस्त्र हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। ठीक वैसे ही जैसे नाटो देशों में मशहूर ‘अनुच्छेद 5’ के तहत होता है।

यह समझौता सिर्फ मध्य पूर्व और अरब सागर के सैन्य समीकरण नहीं बदल रहा, बल्कि नई दिल्ली के रणनीतिक हलकों में भी हलचल मचा रहा है। आखिर वजह भी बड़ी है- एक तरफ पेट्रो-डॉलर से लबरेज सऊदी अरब है, तो दूसरी तरफ परमाणु ताकत से लैस पाकिस्तान, और साथ में नाटो की दूसरी सबसे बड़ी सेना वाला तुर्की। तीनों जब एक मंच पर आ गए हैं, तो भारत की सुरक्षा तैयारियों और कूटनीतिक संतुलन के लिए यह सीधी चुनौती बनकर उभरा है।

किसके पास क्या ताकत, समझिए पूरा गणित

दरअसल इस गठबंधन की खासियत यही है कि तीनों देश एक-दूसरे की कमी को पूरा करते हैं। सऊदी अरब की तरफ से अथाह पूंजी और लाल सागर व फारस की खाड़ी के अहम जलमार्गों पर दबदबा इस गठजोड़ में जुड़ता है। वहीं पाकिस्तान दुनिया का इकलौता मुस्लिम-बहुसंख्यक परमाणु संपन्न देश है, जिसके पास युद्ध का लंबा अनुभव रखने वाली बड़ी थल सेना भी मौजूद है। इसके अलावा तुर्की के पास नाटो की दूसरी सबसे बड़ी स्थायी सेना है, साथ ही उन्नत ड्रोन तकनीक, 5वीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान कार्यक्रम और आधुनिक नौसैन्य निर्माण क्षमता भी उसके पास है। यानी वित्तीय ताकत, परमाणु ढाल और आधुनिक हथियार- तीनों चीजें अब एक ही खेमे में इकट्ठा हो गई हैं।

दशकों पुरानी दोस्ती से लेकर औपचारिक संधि तक का सफर

यह गठबंधन अचानक नहीं बना, बल्कि इसकी नींव दशकों पहले पड़ चुकी थी। 1970 से 2010 के बीच सऊदी अरब ने पाकिस्तान के रक्षा और परमाणु कार्यक्रम को लगातार वित्तीय मदद दी थी, और बदले में पाकिस्तान ने सऊदी सुरक्षा के लिए अपने सैन्य सलाहकार और फौज तैनात की। इसके बाद 2023 से 2025 के बीच तुर्की और सऊदी अरब के बीच कई बड़े रक्षा सौदे हुए, जिनमें अत्याधुनिक ड्रोन और नौसैन्य साजो-सामान की खरीद-फरोख्त शामिल थी।

इसके बाद सितंबर 2025 में रियाद में सऊदी अरब और पाकिस्तान ने द्विपक्षीय सामूहिक सुरक्षा समझौता किया, और आखिरकार 7 अगस्त 2026 को जेद्दा में मोहम्मद बिन सलमान, तैयप एर्दोगन और शहबाज शरीफ ने साथ बैठकर इस त्रिपक्षीय संधि को औपचारिक रूप दे दिया।

भारत की चार बड़ी चिंताएं, जहां बिगड़ सकता है खेल

भारत ने पिछले एक दशक में अपनी ‘एक्ट वेस्ट’ नीति के जरिए सऊदी अरब और यूएई के साथ व्यापार, ऊर्जा और सुरक्षा के मोर्चे पर मजबूत रिश्ते बनाए थे। लेकिन इस नए त्रिपक्षीय गुट के बनने के बाद भारत के सामने चुनौतियों की लिस्ट लंबी हो गई है।

सबसे पहली चिंता सैन्य तकनीक के ट्रांसफर को लेकर है। तुर्की की उन्नत रक्षा तकनीक अब पाकिस्तान तक पहुंचेगी, और सऊदी पूंजी के दम पर पाकिस्तान अपनी पारंपरिक सैन्य ताकत भारत के खिलाफ और मजबूत कर सकता है। दूसरी तरफ उत्तरी अरब सागर में नौसैनिक दबाव की चिंता भी कम नहीं है, क्योंकि तीनों देशों की नौसेनाओं की साझा गश्त भारत के समुद्री कारोबारी रास्तों पर सीधा असर डाल सकती है।

इसके अलावा रियाद का पाकिस्तान के साथ इस मिलिट्री ब्लॉक में शामिल होना भारत की खाड़ी कूटनीति पर भी दबाव बढ़ाता है। वहीं ओआईसी जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अब यह तीनों देश मिलकर कश्मीर जैसे मुद्दों पर भारत के खिलाफ ज्यादा आक्रामक रुख अपना सकते हैं।

गठबंधन के भीतर छिपा एक बड़ा विरोधाभास

हालांकि कागज पर यह समझौता जितना मजबूत नजर आता है, इसके भीतर उतना ही बड़ा एक अंतर्विरोध भी छिपा है। अगर कल को ईरान सऊदी अरब पर कोई सीधा या परोक्ष हमला करता है, तो पाकिस्तान बुरी तरह फंस सकता है। संधि की शर्तों के मुताबिक ऐसी स्थिति में पाकिस्तान को सऊदी के पक्ष में ईरान के खिलाफ जंग में उतरना होगा। लेकिन हकीकत यह है कि पाकिस्तान की ईरान से 900 किलोमीटर से ज्यादा लंबी सीमा लगती है, और वह खुद बलूचिस्तान समेत सीमावर्ती इलाकों में गंभीर आंतरिक सुरक्षा संकट झेल रहा है।

इतना ही नहीं, पाकिस्तान में एक बड़ी शिया आबादी भी रहती है, ऐसे में ईरान से सीधा सैन्य टकराव देश के भीतर सांप्रदायिक तनाव भड़का सकता है। यानी ईरान और सऊदी, दोनों ही पाकिस्तान के अहम पड़ोसी और भागीदार हैं, और सऊदी पर हमले की सूरत में पाकिस्तान के लिए सैन्य दखल देना लगभग नामुमकिन जैसा हो जाएगा। यही वजह है कि इस ‘सुपर ब्लॉक’ के सामूहिक सुरक्षा दावे पर भी सवाल उठने लगे हैं।

कुल मिलाकर, सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की का यह नया रक्षा गठजोड़ क्षेत्रीय और वैश्विक कूटनीति में एक बड़े बदलाव का इशारा है। ऐसे में भारत के सामने अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ बनाए रखते हुए स्वदेशी रक्षा निर्माण में ‘आत्मनिर्भरता’ और तेज करने की जरूरत है। साथ ही नई दिल्ली को इजरायल से रिश्ते मजबूत करने के साथ-साथ खाड़ी देशों और ईरान से भी अपने कूटनीतिक चैनल सक्रिय रखने होंगे, ताकि ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और 80 लाख से ज्यादा प्रवासी भारतीयों के हितों की रक्षा हो सके।

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