दो कश्मीर, दो कहानियां: 5 अगस्त 2019 के बाद कैसे बदल गई तस्वीर ?

जम्मू कश्मीर और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर में तुलना

AI से बनाई गई इस तस्वीर में कश्मीर के दोनों हिस्सों के विकासकार्यों के अंतर को दर्शाया गया है

5 अगस्त 2019 की तारीख सिर्फ एक कानूनी संशोधन की तारीख नहीं थी। संसद ने अनुच्छेद 370 और धारा 35- ए हटाकर जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों — जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया था। उसी दिन से सीमा के दोनों तरफ के कश्मीर की कहानी बिल्कुल अलग-अलग रास्तों पर चल पड़ी। आज जब हम मोदी सरकार के उस निर्णायक और साहसी फैसले की सातवीं बरसी मना रहे हैं, जब तक जम्मू-कश्मीर में निष्पक्ष चुनाव हो चुके हैं। सड़कें और रेलगाड़ियां (वंदेभारत तक) पहुंच चुकी हैं, दुनिया का सबसे ऊंचा रेल ब्रिज (चिनाब पर) चालू हो चुका है। विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज, यहां तक कि AIIMS और IIT जैसे संस्थान खुल चुके हैं, जबकि सरहद पार पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में इसी दौर में एक के बाद एक आंदोलन भड़के, और हर बार जवाब में लाठी, कर्फ्यू और लाशें नसीब हुईं। यही फर्क आज दोनों कश्मीरों की स्थिति को परिभाषित करता है।

चुनाव बनाम शपथ: किसका लोकतंत्र असली है ?

जम्मू-कश्मीर में सितंबर-अक्टूबर 2024 में दस साल बाद विधानसभा चुनाव हुए। करीब 64 प्रतिशत मतदान के साथ जनता घरों से निकली और उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में निर्वाचित सरकार बनी। पुलिस, कानून-व्यवस्था और बड़ी नौकरशाही नियुक्तियां अब भी उपराज्यपाल के पास हैं, इसलिए पूर्ण राज्य का दर्जा वापस पाने की मांग आज भी हर राजनीतिक मंच पर गूंजती हैं। इस पर आगे बात करेंगे, लेकिन बुनियादी सवाल यह है कि जनता को वोट डालने और अपनी सरकार चुनने का हक मिला या नहीं? तो इसका जवाब हां में है।

अब जरा सरहद पार झांकिए। POJK की तथाकथित विधानसभा और “प्रधानमंत्री” पद महज दिखावा हैं। असली फैसले इस्लामाबाद में बैठी कश्मीर काउंसिल और पाकिस्तान के संघीय कश्मीर मामलों के मंत्रालय में होते हैं, जिसकी कमान खुद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के हाथ में है। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि आजाद कश्मीर के अंतरिम संविधान की धारा 7(2) हर उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से पहले पाकिस्तान के प्रति निष्ठा की शपथ लेने पर मजबूर करती है। यानी जो भी आजादी या राष्ट्रवाद की बात करे, उसे नामांकन भरने से पहले ही मैदान से बाहर कर दिया जाता है। गिलगित-बाल्तिस्तान की हालत इससे भी बदतर है। यह इलाका पाकिस्तान के संविधान से पूरी तरह बाहर है और सीधे इस्लामाबाद के कार्यकारी फरमानों से चलता है। यही घुटन आगे चलकर सड़कों पर फूटती है।

सड़कों पर उबलता गुस्सा: छह साल, चार बड़े प्रदर्शन

POJK की गलियां पिछले 6 साल में शायद ही कभी शांत रही हों। शुरुआत 2020-21 में मुजफ्फराबाद से हुई, जहां बगलिहार और नीलम-झेलम परियोजनाओं से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान और बिना मुआवजे के नदी मोड़ने पर स्थानीय लोग सड़कों पर उतरे। 2022 से 2024 के बीच यह गुस्सा गिलगित-बाल्तिस्तान पहुंचा, जहां संघीय सरकार ने जमीन को “खालसा सरकार” यानी राजकीय संपत्ति घोषित करना शुरू किया और गेहूं सब्सिडी में कटौती कर दी, नतीजे में संवैधानिक हक की मांग को लेकर बड़े प्रदर्शन हुए।

मई 2024 आते-आते यह असंतोष एक संगठित शक्ल ले चुका था। ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में मुजफ्फराबाद, मीरपुर और रावलाकोट में शटर-डाउन हड़तालें और सड़कें जाम की गईं। वजह थी बिजली की आसमान छूती दरें, आटे-गेहूं की बढ़ती कीमतें और सत्ताधारी अभिजात वर्ग की विशेष सुविधाएं। हालात इतने बिगड़े कि इस्लामाबाद को इलाके को शांत रखने के लिए 23 अरब रुपए की आपातकालीन सब्सिडी देनी पड़ी। लेकिन यह राहत सिर्फ मरहम साबित हुई, घाव नहीं भरा।

अगले साल यानी सितंबर-अक्टूबर 2025 में JAAC ने 38 सूत्री मांगपत्र के साथ पूरे पीओजेके में शटर-डाउन और चक्का जाम हड़ताल का ऐलान कर दिया। नौकरशाहों की विशेष सुविधाएं और सरकारी भत्ते खत्म करने, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व में सुधार और आर्थिक राहत जैसी मांगों को लेकर पूरा इलाका ठप हो गया। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पों में कई लोगों की जान गई और बड़े कस्बों में संचार सेवाएं ठप कर दी गईं।

गुस्से का यह सिलसिला थमा नहीं, बल्कि और तीखा हुआ। जून-जुलाई 2026 में आजाद कश्मीर की सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में विधानसभा में पाकिस्तान में रह रहे कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों के संवैधानिक दर्जे को बरकरार रखा। इस फैसले ने रावलाकोट, मुजफ्फराबाद, मीरपुर और कोटली को फिर से सुलगा दिया। JAAC के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों ने इन “शरणार्थी सीटों” को खत्म करने की मांग की, उनका कहना था कि ये सीटें बाहरी लोगों को स्थानीय राजनीति में दखल देने का मौका देती हैं, लेकिन इस्लामाबाद ने बातचीत के बजाय JAAC पर आतंकवाद-रोधी कानूनों के तहत प्रतिबंध लगा दिया, इसके नेताओं पर ईनाम घोषित कर दिया। यहां तक कि पाकिस्तान के रक्षा मंत्री और सेना के प्रवक्ता (DG ISPR) ने बकायदा इन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ युद्ध छेड़ने का ऐलान कर दिया। इसका असर भी दिखा; पाकिस्तानी सेना ने सैन्य शक्ति के दम पर प्रदर्शन को कुचलना शुरू कर दिया। आम लोगों यहां तक कि बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं तक पर गोलियां बरसाई गईं। नतीजे में 40 से ज्यादा लोगों की मौत की खबरें हैं, हालांकि इंटरनेट बंद है, मीडिया पर प्रतिबंध है- ऐसे में सही आंकड़ा क्या है, ये अभी भी नहीं पक्का नहीं कहा जा सकता।

कुल मिलाकर छह साल में चार बड़े जन-आंदोलन और हर बार दमन से जवाब – POJK के पास लोकतंत्र के नाम पर यही अनुभव है।

आंकड़े झूठ नहीं बोलते

इस राजनीतिक फर्क के पीछे विकास की जमीनी हकीकत भी छिपी है। भारतीय जम्मू-कश्मीर का वार्षिक बजट वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 1.18 लाख करोड़ रुपए (14 अरब डॉलर से ज्यादा) रहा, जबकि पूरे POJK का बजट महज 220 अरब पाकिस्तानी रुपए यानी 80 करोड़ से 1 अरब डॉलर के बीच सिमटा हुआ है, यानी छह गुना से ज्यादा का फासला।

शिक्षा के क्षेत्र में भी यह अंतर साफ दिखता है। भारतीय हिस्से में 2 केंद्रीय विश्वविद्यालय, 10 राज्य विश्वविद्यालय, IIT जम्मू,  NIT श्रीनगर, NIFT श्रीनगर और कई एम्स व मेडिकल कॉलेज काम कर रहे हैं, तो वहीं आजाद कश्मीर के हिस्से सिर्फ छह सार्वजनिक विश्वविद्यालय आए हैं। उसमें भी गिलगित-बाल्तिस्तान के हिस्से सिर्फ दो-  जिनमें काराकोरम इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी शामिल है।

रेल और सड़क की तस्वीर भी यही कहानी दोहराती है। उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक, चिनाब रेल पुल, जोजिला सुरंग और श्यामा प्रसाद मुखर्जी सुरंग जैसी परियोजनाओं ने भारतीय कश्मीर को देश की मुख्यधारा से जोड़ दिया है। POJK में आज भी कोई रेलवे नेटवर्क नहीं है, लोग काराकोरम राजमार्ग और टूटी-फूटी स्थानीय सड़कों के भरोसे हैं। बिजली में भी यही फासला दिखता है-  भारतीय हिस्सा राष्ट्रीय ग्रिड से जुड़ा है और पाकल दुल, किरु, रत्ले जैसी परियोजनाएं आगे बढ़ रही हैं, जबकि POJK में मंगला बांध और नीलम-झेलम जैसी बड़ी परियोजनाएं होने के बावजूद ग्रिड ट्रांसफर की खामियों से लोग भीषण लोडशेडिंग झेलते हैं। यानी बिजली बनती तो POJK में है ,लेकन मिलती कहीं और है।

विरोध पर दोनो ओर की सरकारों का अलग रुख 

इसका मतलब यह कतई नहीं कि भारतीय हिस्से में कोई विरोध प्रदर्शन नहीं हुआ। लद्दाख में सोनम वांगचुक और लेह एपेक्स बॉडी के नेतृत्व में 2020 से 2025 तक राज्य के दर्जे, छठी अनुसूची और नौकरियों में आरक्षण को लेकर लगातार आंदोलन चलते रहे। हाल ही में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए दिल्ली कूच का ऐलान किया था, हालांकि बाद में इसे टाल दिया गया। फर्क साफ है कि यहां विरोध संविधान के दायरे में, बातचीत और चुनावी दबाव के जरिए होता है, POJK की तरह दमन से जवाब नहीं दिया मिलता।

ऐसे में आखिर में सवाल यही बचता है

छह साल के आंकड़े और घटनाक्रम एक बात स्पष्ट रूप से कहते हैं। भारतीय जम्मू-कश्मीर संवैधानिक ढांचे के भीतर रहकर चुनाव और विकास के रास्ते आगे बढ़ रहा है, जबकि POJK और गिलगित-बाल्तिस्तान की जनता आज भी सस्ती रोटी, बिजली और बुनियादी हक के लिए हर एक-दो साल में सड़कों पर उतरने को मजबूर है। तथाकथित “आजाद कश्मीर” नाम भले आजादी का दावा करे, हकीकत यह है कि असली सत्ता इस्लामाबाद के हाथ में सिमटी है। इसके उलट भारतीय कश्मीर में लोकतंत्र, पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद के तमाम दबावों के बावजूद, संस्थागत रूप से मजबूत होता दिख रहा है।

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