‘गांधी परिवार बनाम संघ परिवार’… क्या रेवंत रेड्डी ने कांग्रेस के लिए कर दिया सेल्फ गोल?

राहुल गांधी को PM बनाने के सपने से ‘Family First’ तक पहुंची सियासी बहस, जानिए गांधी परिवार और संघ परिवार में कितना अंतर

तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने केरल के निलंबूर में एक कार्यक्रम के दौरान भारत की राजनीति को ‘गांधी परिवार बनाम संघ परिवार’ की लड़ाई बताया और कहा कि उनका अब एक ही राजनीतिक सपना है कि राहुल गांधी को देश का प्रधानमंत्री देखना। उन्होंने लोगों से गांधी परिवार के साथ खड़े होने की अपील भी की। इसके बाद बीजेपी की ओर से केंद्रीय मंत्री बंदी संजय कुमार ने पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस के लिए ‘Family First’ और बीजेपी-संघ परिवार के लिए ‘Nation First’ है।

यहीं से एक दिलचस्प सवाल उठता है कि क्या रेवंत रेड्डी ने अनजाने में कांग्रेस के उस आरोप को ही मजबूत कर दिया, जिसे बीजेपी लंबे समय से ‘परिवारवाद’ के रूप में उठाती रही है? और सबसे अहम, जिस ‘गांधी परिवार’ और ‘संघ परिवार’ को रेवंत रेड्डी ने एक ही राजनीतिक मुकाबले में रख दिया, क्या दोनों वास्तव में एक ही तरह की संस्थाएं हैं?

रेवंत रेड्डी ने आखिर कहा क्या?

25 सितंबर को निलंबूर में आर्यदन मोहम्मद-2026 बेस्ट पब्लिक सर्वेंट अवॉर्ड लेते हुए रेवंत रेड्डी ने कहा कि भारत के भविष्य की लड़ाई ‘गांधी परिवार और संघ परिवार’ के बीच है। उन्होंने गांधी परिवार को त्याग और बलिदान से जोड़ा और संघ परिवार पर धर्म, जाति, क्षेत्र और भाषा के आधार पर देश को बांटने का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी कहा कि उनका एकमात्र सपना राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना है।

यानी रेवंत रेड्डी के बयान में ‘गांधी परिवार’ सिर्फ एक परिवार का उल्लेख नहीं था, बल्कि कांग्रेस की राजनीतिक विरासत और राहुल गांधी के नेतृत्व के लिए समर्थन का प्रतीक था। लेकिन बीजेपी ने इसी शब्दावली को पकड़ लिया।

BJP ने कैसे बनाया ‘Family First’ बनाम ‘Nation First’ का मुद्दा?

केंद्रीय मंत्री बंदी संजय कुमार ने रेवंत रेड्डी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “For us, it is Nation First. For Congress, it is always Family First.” उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी राजनीतिक परिवार को देश से ऊपर रखा जा सकता है।

यही वह बिंदु है जहां ‘सेल्फ गोल’ वाली राजनीतिक बहस पैदा होती है। बीजेपी लंबे समय से कांग्रेस पर नेहरू-गांधी परिवार के इर्द-गिर्द राजनीति केंद्रित करने का आरोप लगाती रही है। ऐसे में जब कांग्रेस का ही एक मुख्यमंत्री खुले मंच से कहता है कि उसका सबसे बड़ा राजनीतिक सपना राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना है और लोगों से गांधी परिवार के साथ खड़े होने की अपील करता है, तो बीजेपी को उसी भाषा को राजनीतिक हमला बनाने का मौका मिल जाता है।

लेकिन क्या ‘गांधी परिवार’ और ‘संघ परिवार’ एक ही चीज हैं?

यहीं सबसे बड़ा फर्क है। दोनों के नाम में ‘परिवार’ शब्द जरूर है, लेकिन उनकी संरचना और अर्थ अलग हैं। नेहरू-गांधी परिवार एक राजनीतिक परिवार है, जिसके कई सदस्यों ने कांग्रेस और भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। मोतीलाल नेहरू से शुरू होकर जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी तक इस परिवार के कई सदस्य राजनीति में सक्रिय रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री थे, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी भी प्रधानमंत्री रहे। सोनिया गांधी लंबे समय तक कांग्रेस अध्यक्ष रहीं और राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष रह चुके हैं।

इसके विपरीत ‘संघ परिवार’ किसी एक परिवार का नाम नहीं है। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS से वैचारिक या संगठनात्मक रूप से जुड़े विभिन्न संगठनों के लिए इस्तेमाल होने वाला व्यापक शब्द है। RSS के अपने साहित्य में भी ‘Sangh Parivar’ को संगठनों के एक व्यापक वैचारिक परिवार के रूप में वर्णित किया गया है। इसलिए दोनों को सिर्फ ‘दो राजनीतिक परिवार’ कहना एक राजनीतिक भाषाई तुलना है; संगठनात्मक रूप से दोनों समान संरचना नहीं हैं।

गांधी परिवार की ताकत क्या रही है?

नेहरू-गांधी परिवार की सबसे बड़ी राजनीतिक विशेषता उसका लंबा चुनावी और सत्ता का इतिहास है। जवाहरलाल नेहरू 1947 से 1964 तक प्रधानमंत्री रहे। इंदिरा गांधी दो अवधियों में प्रधानमंत्री रहीं और राजीव गांधी 1984 से 1989 तक प्रधानमंत्री रहे। बाद में सोनिया गांधी ने 1998 से 2017 और फिर 2019 से 2022 तक कांग्रेस की कमान संभाली। उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों में केंद्र में सरकार बनाई। आज राहुल गांधी कांग्रेस के प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं में हैं और प्रियंका गांधी भी सक्रिय राजनीति में हैं। यानी परिवार का राजनीतिक प्रभाव कई पीढ़ियों तक जारी रहा है। यही इतिहास कांग्रेस के लिए राजनीतिक पूंजी के साथ साथ एक बोझ भी है ।

संघ परिवार की ताकत किस तरह अलग है?

संघ परिवार की संरचना व्यक्ति या एक वंश पर आधारित नहीं है। RSS के साथ जुड़े संगठनों का एक व्यापक नेटवर्क है, जो सामाजिक, सांस्कृतिक, छात्र, श्रमिक, किसान और राजनीतिक क्षेत्रों में अलग-अलग भूमिकाएं निभाता है। बीजेपी इस व्यापक वैचारिक नेटवर्क का राजनीतिक हिस्सा मानी जाती है, हालांकि RSS और बीजेपी अलग संगठन हैं। इसलिए ‘गांधी परिवार’ में मुख्य सवाल कौन व्यक्ति या कौन राजनीतिक वंश नेतृत्व में है, जबकि ‘संघ परिवार’ शब्द में सवाल कौन-कौन से संगठन और किस वैचारिक ढांचे से जुड़े हैं, इसका होता है।

असली फर्क यहीं समझिए

पूरे विवाद को एक लाइन में समझें तो ‘गांधी परिवार’ एक राजनीतिक वंश है, जबकि ‘संघ परिवार’ संगठनों का व्यापक वैचारिक नेटवर्क है। दोनों के बीच तुलना राजनीतिक भाषण में की जा सकती है, लेकिन दोनों की उत्पत्ति, संगठनात्मक ढांचा और नेतृत्व का तरीका अलग है।

रेवंत रेड्डी ने जिस तुलना के जरिए बीजेपी और RSS के खिलाफ राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की, उसी तुलना को बीजेपी ने पलटकर कांग्रेस के खिलाफ ‘Family First’ के नैरेटिव में बदल दिया। रेवंत रेड्डी ने बहस को खुद ‘गांधी परिवार बनाम संघ परिवार’ की भाषा दी और बीजेपी ने उसी फ्रेम को कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल किया। अब राजनीतिक लड़ाई इस बात पर है कि जनता इन दोनों मॉडलों कि एक राजनीतिक परिवार और एक व्यापक वैचारिक-संगठनात्मक नेटवर्क को किस नजर से देखती है।

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