जर्मनी की राजनीति में एक ऐसा बदलाव दिखाई दे रहा है, जिसकी कुछ साल पहले कल्पना करना भी मुश्किल था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जर्मनी की मुख्यधारा की राजनीति में एक स्पष्ट राजनीतिक सहमति रही—अति-दक्षिणपंथी ताकतों को सत्ता और मुख्यधारा से दूर रखा जाएगा। लेकिन अब यह व्यवस्था खुद दबाव में है।
पूर्वी जर्मनी के सैक्सनी-आनहाल्ट में धुर-दक्षिणपंथी Alternative for Germany यानी AfD ने 2026 के राज्य चुनाव में करीब 44 प्रतिशत वोट हासिल कर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। पार्टी बहुमत से थोड़ा पीछे रह गई, लेकिन उसका प्रदर्शन इतना बड़ा है कि इसे जर्मन राजनीति का निर्णायक मोड़ माना जा रहा है।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि AfD जीती है। असली सवाल यह है कि जर्मनी के मतदाता आखिर उस पार्टी की ओर क्यों बढ़ रहे हैं, जिसे लंबे समय से मुख्यधारा की पार्टियां सत्ता से दूर रखने की कोशिश करती रही हैं?
टूटा नहीं है ‘फायरवॉल’, लेकिन उस पर दबाव बढ़ रहा है
जर्मनी में AfD के खिलाफ मुख्यधारा की पार्टियों ने वर्षों से एक तरह का राजनीतिक ‘फायरवॉल’ बना रखा है। यानी चुनाव में पार्टी को वोट मिल सकते हैं, लेकिन उसके साथ सरकार बनाने या सत्ता में साझेदारी करने से दूसरी पार्टियां बचती रही हैं।
अब यही रणनीति मुश्किल में पड़ती दिखाई दे रही है। सैक्सनी-आनहाल्ट में AfD सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है और राष्ट्रीय स्तर पर भी उसका जनाधार बढ़ा है। अगस्त के ARD-DeutschlandTrend सर्वे में AfD को 28 प्रतिशत समर्थन मिला था, जबकि CDU/CSU 21 प्रतिशत पर थी।
यानी जर्मनी में बहस अब सिर्फ AfD को रोकने की नहीं रह गई है। सवाल यह बन रहा है कि अगर देश का बड़ा हिस्सा लगातार AfD को वोट देता रहा, तो क्या बाकी पार्टियां उसे हमेशा सत्ता से बाहर रख पाएंगी?
प्रवासन बना सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा
AfD के उभार की एक बड़ी वजह जर्मनी की प्रवासन और शरणार्थी राजनीति है। 2015 में एंजेला मर्केल के दौर में जर्मनी ने बड़ी संख्या में शरणार्थियों को जगह दी थी। उस समय इसे मानवीय और उदारवादी फैसले के रूप में देखा गया।
लेकिन समय के साथ प्रवासन, आवास, सार्वजनिक सेवाओं, सुरक्षा और सामाजिक समावेशन को लेकर सवाल बढ़ते गए। AfD ने इन्हीं चिंताओं को अपनी राजनीति के केंद्र में रखा। सैक्सनी-आनहाल्ट में मतदाताओं के लिए शरणार्थी और शरण नीति सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल रही।
यहीं AfD की राजनीति बाकी पार्टियों से अलग पड़ती है। वह सिर्फ प्रवासन को आर्थिक मुद्दे के रूप में नहीं देखती, बल्कि उसे राष्ट्रीय पहचान, संस्कृति और सुरक्षा से जोड़ती है। यही बात पार्टी के समर्थन का विस्तार करती है।
महंगाई, ऊर्जा और अर्थव्यवस्था का दबाव
लेकिन AfD को सिर्फ प्रवासन के आधार पर समझना अधूरा होगा। जर्मनी की आर्थिक चिंताएं भी इसके उभार में बड़ी भूमिका निभा रही हैं।यूक्रेन युद्ध के बाद ऊर्जा सुरक्षा का सवाल जर्मनी के लिए बेहद संवेदनशील बन गया। ऊर्जा की ऊंची कीमतें, उद्योगों पर दबाव, ऑटोमोबाइल और केमिकल सेक्टर की चुनौतियां और कुशल श्रमिकों की कमी जैसी समस्याएं लगातार सामने आई हैं।
AfD ने इस असंतोष को राजनीतिक मुद्दा बनाया। पार्टी सस्ती ऊर्जा, पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों और रूस के साथ रिश्तों को सामान्य करने की बात करती है। दूसरी तरफ, जर्मनी की मौजूदा नीति रूस के खिलाफ सख्त रुख और यूक्रेन को समर्थन देने की रही है। यही अंतर मतदाताओं के एक हिस्से को प्रभावित कर रहा है। उनके सामने सवाल है—क्या जर्मनी अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता दे रहा है, या वैश्विक राजनीतिक संघर्षों की कीमत आम नागरिक चुका रहा है?
पूर्वी जर्मनी का गुस्सा अलग क्यों है?
AfD की सबसे बड़ी ताकत पूर्वी जर्मनी में दिखाई देती है और इसके पीछे सिर्फ मौजूदा राजनीति नहीं, बल्कि इतिहास भी है। पूर्व और पश्चिम जर्मनी के एकीकरण के दशकों बाद भी आर्थिक और सामाजिक अंतर पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। कई पूर्वी इलाकों में कम आय, आबादी में गिरावट और बर्लिन के राजनीतिक तंत्र से दूरी की भावना मौजूद है। रूस को लेकर भी पूर्वी जर्मनी का अनुभव पश्चिमी जर्मनी से अलग रहा है।
इसीलिए वहां AfD सिर्फ एक दक्षिणपंथी पार्टी के रूप में नहीं, बल्कि कई मतदाताओं के लिए व्यवस्था-विरोधी विकल्प के रूप में उभरती है। उसका संदेश सीधा है—बर्लिन की राजनीतिक व्यवस्था आपकी बात नहीं सुन रही, यूरोप की नीतियां आपकी जरूरतों से दूर हैं और पुरानी पार्टियां समस्याएं तो पहचानती हैं, लेकिन समाधान नहीं दे रही हैं।
क्या जर्मनी का राजनीतिक केंद्र दाईं ओर खिसक रहा है?
AfD सत्ता में आए या नहीं, लेकिन उसका प्रभाव पहले ही जर्मन राजनीति को बदल रहा है। जब कोई पार्टी लगातार प्रवासन, सीमा सुरक्षा, राष्ट्रीय पहचान और यूरोपीय संघ की शक्तियों पर सवाल उठाकर वोट हासिल करती है, तो मुख्यधारा की पार्टियों पर भी अपनी नीतियां बदलने का दबाव पड़ता है।
इसका मतलब यह है कि राजनीतिक मुकाबला अब केवल वाम और दक्षिण के बीच नहीं है। जर्मनी में राजनीतिक केंद्र खुद नई दिशा में खिसक रहा है। और यह कहानी केवल जर्मनी की भी नहीं है। इटली, फ्रांस, नीदरलैंड्स और ऑस्ट्रिया समेत यूरोप के कई देशों में स्थापित राजनीतिक दलों के सामने आर्थिक असुरक्षा, प्रवासन, राष्ट्रीय पहचान और व्यवस्था के प्रति बढ़ता अविश्वास जैसी साझा चुनौतियां है
तो क्या यह जर्मनी की राजनीति का निर्णायक मोड़ है?
सैक्सनी-आनहाल्ट का चुनाव अकेले पूरे जर्मनी का भविष्य तय नहीं करता। लेकिन यह इतना जरूर बताता है कि 1945 के बाद जिस राजनीतिक व्यवस्था को जर्मनी की स्थिरता की सबसे बड़ी ताकत माना जाता था, वह अब गंभीर दबाव में है।
AfD की सफलता लोकतंत्र के खत्म होने की कहानी नहीं है। बल्कि यह शायद जर्मनी के लोकतंत्र के सामने एक अलग चुनौती है—लोगों का बढ़ता असंतोष आखिर किस दिशा में जाएगा? अगर मुख्यधारा की पार्टियां अर्थव्यवस्था, प्रवासन, ऊर्जा और आम नागरिकों की असुरक्षाओं पर भरोसेमंद जवाब नहीं दे पाईं, तो AfD जैसी पार्टियों के लिए राजनीतिक जगह और बढ़ सकती है।
