भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्ण स्वामीनाथन ने रविवार को कहा कि इस सदी में भारत की आर्थिक और रणनीतिक तरक्की समुद्र से काफी हद तक जुड़ी हुई है। NDTV Defence Summit 2026 में उन्होंने कहा कि हिंद महासागर लगातार अधिक व्यस्त, प्रतिस्पर्धी और सैन्य गतिविधियों वाला क्षेत्र बनता जा रहा है।
उन्होंने पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध का उदाहरण देते हुए कहा कि किसी संघर्ष से भौगोलिक दूरी होने का मतलब यह नहीं है कि उसके असर से भारत पूरी तरह सुरक्षित रहेगा। उनके मुताबिक, समुद्र में होने वाली कोई भी बड़ी रुकावट आगे चलकर भारत के तट, घरों, उद्योग और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।
भारत सिर्फ तट वाला देश नहीं, समुद्री राष्ट्र है
नौसेना प्रमुख ने कहा कि भारत को केवल लंबी समुद्री सीमा वाला महाद्वीपीय देश मानना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि आर्थिक, सभ्यतागत और रणनीतिक नजरिए से भारत एक समुद्री राष्ट्र है।
उन्होंने बताया कि भारत के करीब 90 प्रतिशत व्यापार की मात्रा समुद्र के रास्ते होती है, जबकि व्यापार की कीमत के हिसाब से यह हिस्सा 70 प्रतिशत से ज्यादा है। देश की GDP का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा तटीय राज्यों से आता है और करीब 18 प्रतिशत आबादी समुद्र तट से 50 किलोमीटर के दायरे में रहती है।
हिंद महासागर का महत्व सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। हर साल करीब एक लाख जहाज इस क्षेत्र से गुजरते हैं। इनमें दुनिया के करीब 30 प्रतिशत कंटेनर माल और आधे से ज्यादा कच्चे तेल का परिवहन होता है। दुनिया की मछली पकड़ने की कुल मात्रा में हिंद महासागर की हिस्सेदारी करीब 15 प्रतिशत है। इसके अलावा यहां दुनिया के ज्ञात समुद्री तेल भंडार का करीब 55 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस भंडार का 40 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है।
हिंद महासागर में बढ़ रही सैन्य गतिविधियां
एडमिरल स्वामीनाथन ने कहा कि हिंद महासागर के बढ़ते महत्व के कारण कई बाहरी देशों की मौजूदगी भी बढ़ी है। उन्होंने इसे दुनिया के सबसे अधिक सैन्य गतिविधियों वाले समुद्री क्षेत्रों में से एक बताया।
उनके मुताबिक, क्षेत्र में कई देशों की स्थायी सैन्य सुविधाएं हैं और बाहरी देशों की नौसेनाओं के करीब 40 से 50 युद्धपोत लगभग लगातार यहां मौजूद रहते हैं। उन्होंने चीनी नौसेना की बढ़ती मौजूदगी का भी जिक्र किया और कहा कि भारत उसके गतिविधियों पर लगातार नजर रखता है।
तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर पर क्या बोले नौसेना प्रमुख?
भारत के तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर की लंबे समय से चली आ रही मांग पर नौसेना प्रमुख ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारतीय नौसेना को तीसरे विमानवाहक पोत की जरूरत है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार इसे मंजूरी देगी और कहा कि यह सिर्फ समय की बात है।
हालांकि, उन्होंने इसकी कोई समयसीमा नहीं बताई और यह भी स्पष्ट नहीं किया कि प्रस्ताव फिलहाल मंजूरी की प्रक्रिया में किस चरण पर है। भारत के पास अभी दो एयरक्राफ्ट कैरियर हैं—INS विक्रांत और INS विक्रमादित्य।
समुद्री सुरक्षा में ड्रोन और मिसाइलों की चुनौती
नौसेना प्रमुख ने कहा कि अब समुद्री क्षेत्र में बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के साथ-साथ ड्रोन जैसे मानवरहित सिस्टम भी चुनौती बन रहे हैं। तकनीक के आसानी से उपलब्ध होने के कारण छोटे गैर-राज्य समूह भी इनका इस्तेमाल कर सकते हैं।
उन्होंने पश्चिम एशिया का उदाहरण देते हुए कहा कि पिछले दो वर्षों में 120 से ज्यादा व्यापारिक जहाजों पर हमले हुए हैं। उनके मुताबिक, युद्ध शुरू होने के करीब सात महीने बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से रोजाना गुजरने वाले जहाजों की संख्या घटकर एक अंक तक पहुंच गई, जबकि युद्ध से पहले औसतन करीब 125 जहाज रोज गुजरते थे।
ड्रोन को लेकर उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका सामने आई है। नौसेना हवा, सतह और पानी के अंदर इस्तेमाल होने वाले ड्रोन सिस्टम की निगरानी और हथियारों के इस्तेमाल के लिए जांच कर रही है। हालांकि, उनके मुताबिक ड्रोन अभी तक किसी युद्ध में निर्णायक साबित नहीं हुए हैं। उन्होंने कहा कि एंटी-ड्रोन तकनीक में सुधार के कारण ड्रोन का शुरुआती फायदा भी कम हुआ है।
ईरान-अमेरिका युद्ध के दौरान नौसेना की भूमिका
एडमिरल स्वामीनाथन ने बताया कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के समय होर्मुज जलडमरूमध्य के आगे करीब तीन दर्जन महत्वपूर्ण मालवाहक जहाज मौजूद थे। विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के बीच बातचीत के बाद भारतीय नौसेना के 11-12 जहाजों की टास्क फोर्स को उन्हें सुरक्षित निकालने और एस्कॉर्ट करने के लिए तैनात किया गया।
उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना का उद्देश्य युद्ध को बढ़ाना नहीं था। हालांकि, युद्ध क्षेत्र में काम करना जोखिम भरा होता है। उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में काम करना ही नौसेना के प्रशिक्षण का हिस्सा है।





























