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भारत को क्यों चाहिए तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर? Explainer

भारत के पास 2 एयरक्राफ्ट कैरियर, फिर तीसरे की जरूरत क्यों? चीन की बढ़ती नौसैनिक ताकत से होर्मुज संकट तक समझिए पूरी रणनीति

Abhishek Sharma द्वारा Abhishek Sharma
19 August 2026
in रक्षा
Third Aircraft Carrier Indian Navy China Threat
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भारतीय नौसेना के पास फिलहाल दो ऑपरेशनल एयरक्राफ्ट कैरियर हैं—INS विक्रमादित्य और स्वदेशी INS विक्रांत। इसके बावजूद लगातार लंबे समय से तीसरे विमानवाहक पोत की जरुरत पर बहस लगातार चलती रहती है।

पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान (रिटायर्ड) ने भी हाल में एयरक्राफ्ट कैरियर की जरूरत पर जोर दिया। उनका कहना है कि आधुनिक युद्ध में पनडुब्बियों और मिसाइलों की भूमिका जरूर बढ़ी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि एयरक्राफ्ट कैरियर की उपयोगिता खत्म हो गई है।

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असल सवाल यह है कि दो कैरियर होने के बावजूद भारत को तीसरे की जरूरत क्यों पड़ रही है? इसका जवाब सिर्फ युद्ध की तैयारी में नहीं, बल्कि हिंद महासागर में भारत की मौजूदगी, समुद्री व्यापार और कूटनीतिक प्रभाव में भी छिपा है।

कैरियर सिर्फ युद्ध नहीं, ताकत दिखाने का जरिया भी

एयरक्राफ्ट कैरियर को अक्सर युद्ध के हथियार के तौर पर देखा जाता है, लेकिन इसकी भूमिका इससे कहीं बड़ी है। शांति के समय भी यह किसी देश की समुद्री ताकत और उसकी पहुंच का संकेत देता है।

हिंद महासागर में भारत के लिए यह खास तौर पर महत्वपूर्ण है। अगर भारतीय नौसेना की लगातार मौजूदगी कम होती है, तो समुद्र में बना खाली स्थान दूसरी ताकतों के लिए खुल जाता है।

मालदीव, श्रीलंका, मॉरीशस और सेशेल्स जैसे देशों के आसपास चीन की बढ़ती गतिविधियां इसी बड़ी रणनीतिक तस्वीर का हिस्सा हैं। पनडुब्बियां छिपकर निगरानी और हमला करने में बेहद प्रभावी हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी दिखाई नहीं देती। इसके उलट एयरक्राफ्ट कैरियर समुद्र में चलते–फिरते एयरबेस की तरह काम करता है और जरूरत पड़ने पर दूर तक हवाई ताकत पहुंचा सकता है। यही वजह है कि कैरियर को सिर्फ हथियार नहीं, बल्कि डेटरेंस और जियोपॉलिटिकल प्रभाव का साधन भी माना जाता है।

दो कैरियर हैं, फिर तीसरा क्यों ?

भारत की करीब 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा के सामने दो बड़े समुद्री क्षेत्र हैं—अरब सागर और बंगाल की खाड़ी। चुनौती यह है कि दोनों जगह एक साथ लगातार एयर कवर बनाए रखना आसान नहीं है।

किसी भी एयरक्राफ्ट कैरियर को हमेशा समुद्र में नहीं रखा जा सकता। उसे समय–समय पर मरम्मत, मेंटेनेंस और बड़े ओवरहॉल के लिए डॉक पर जाना पड़ता है। ऐसे में दो कैरियर होने का मतलब यह नहीं कि दोनों हमेशा ऑपरेशन के लिए उपलब्ध रहेंगे। इसीलिए नौसेना के लिए ‘2 एक्टिव + 1 मेंटेनेंस‘ का मॉडल महत्वपूर्ण माना जाता है। यानी एक समय में दो कैरियर अलग–अलग समुद्री क्षेत्रों में काम कर सकें और तीसरा मेंटेनेंस में हो। अगर सिर्फ दो कैरियर हों और उनमें से एक लंबे समय के लिए डॉक में चला जाए, तो दूसरे कैरियर पर पूरे समुद्री क्षेत्र की जिम्मेदारी आ जाती है।

वहीं दूसरी एक और चुनौती समय की है। INS विक्रमादित्य 2013 में नौसेना में शामिल हुआ था। आने वाले वर्षों में इसकी उम्र बढ़ने के साथ मेंटेनेंस की जरूरत भी बढ़ेगी। वहीं नया एयरक्राफ्ट कैरियर तैयार होने में कई साल लगते हैं। इसलिए तीसरे कैरियर पर फैसला जितना देर से होगा, क्षमता में गैप का खतरा उतना ही बढ़ेगा।

होर्मुज संकट ने क्यों बढ़ाई चिंता ?

पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव ने समुद्री सुरक्षा की अहमियत एक बार फिर सामने ला दी है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट्स में से एक है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस कारोबार इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है। मौजूदा अमेरिका और ईरान की जंग में भी होर्मुज पर जब अमेरिका ने अपने कैरियर स्ट्राईकर ग्रुप तैनात करने पर ईरान की होर्मुज पर पकड़ कमजोर हुई। जिससे ईरान पर दबाव बढ़ा और दोनो देश समझौते की ओर अग्रसर हुए।

ऐसे हालात में किसी देश के पास जमीन से दूर जाकर हवाई और समुद्री ताकत इस्तेमाल करने की क्षमता होना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। यहीं एयरक्राफ्ट कैरियर की उपयोगिता सामने आती है। यह किसी दूसरे देश के एयरबेस पर निर्भर हुए बिना लड़ाकू विमानों को समुद्र के बीच से ऑपरेट करने की सुविधा देता है। इसके साथ मौजूद युद्धपोत, एयर डिफेंस सिस्टम और हेलिकॉप्टर पूरे कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को सुरक्षा देते हैं।

भारत के लिए यह चिंता और बड़ी है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयातित तेल पर निर्भर है। खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक भी रहते हैं। इसलिए पश्चिमी हिंद महासागर और अरब सागर में लंबी दूरी तक ऑपरेशन करने की क्षमता सिर्फ सैन्य जरूरत नहीं, बल्कि आर्थिक और नागरिक सुरक्षा का मुद्दा भी है।

चीन की बढ़ती समुद्री ताकत सबसे बड़ी चुनौती

भारत की तीसरे कैरियर की जरूरत पर बहस में चीन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। चीनी नौसेना तेजी से अपने जहाजी बेड़े का विस्तार कर रही है। चीन के पास अब कई बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर हैं और वह अगली पीढ़ी के कैरियर पर भी काम कर रहा है। इसका लक्ष्य हिंद महासागर सहित इंडो–पैसिफिक में लंबे समय तक अपनी समुद्री मौजूदगी बनाए रखना है।

चीन की रणनीति सिर्फ कैरियर तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान के ग्वादर से लेकर जिबूती तक उसके रणनीतिक समुद्री संपर्क और बंदरगाहों में बढ़ती मौजूदगी भारत के लिए चिंता का विषय है। श्रीलंका और म्यांमार में चीनी गतिविधियों को भी इसी बड़े समुद्री समीकरण में देखा जाता है।

इसके अलावा चीनी सर्विलांस और रिसर्च जहाजों की हिंद महासागर में मौजूदगी लगातार बढ़ी है। भविष्य में चीनी नौसेना की पनडुब्बियों की गतिविधियां बढ़ती हैं तो भारत के लिए समुद्री निगरानी और एंटी–सबमरीन वारफेयर की चुनौती भी बढ़ेगी।

ऐसे माहौल में सिर्फ पनडुब्बियां और लंबी दूरी की मिसाइलें पर्याप्त नहीं मानी जा सकतीं। भारत को समुद्र के ऊपर लगातार हवाई मौजूदगी बनाए रखने की भी जरूरत होगी।

IAC-2 बनाना कितना आसान ?

तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए एक तर्क ये भी दिया जाता है कि अब भारत के पास अब INS विक्रांत बनाने का अनुभव है। इसलिए अब पहले से तैयार भारतीय सप्लाई चेन, डिजाइन अनुभव और शिपबिल्डिंग क्षमता का फायदा मिल सकता है। भारत ने INS विक्रांत के निर्माण के दौरान एक बड़ा घरेलू शिपबिल्डिंग इकोसिस्टम तैयार किया है। अगर उसी अनुभव का इस्तेमाल अगली पीढ़ी के कैरियर में किया जाता है तो निर्माण प्रक्रिया पहले के मुकाबले ज्यादा आसान हो सकती है। इसके एयर विंग में नौसेना के मौजूदा और भविष्य के प्लेटफॉर्म शामिल किए जा सकते हैं।

तीसरा कैरियर सिर्फ एक और युद्धपोत नहीं 

भारत के लिए तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि देश को कितने बड़े युद्धपोत चाहिए। असली सवाल यह है कि भारत हिंद महासागर में किस स्तर की लगातार मौजूदगी बनाए रखना चाहता है। चीन की बढ़ती समुद्री ताकत, पश्चिम एशिया में अस्थिरता, होर्मुज जैसे चोकपॉइंट्स और भारत की अपनी ऊर्जा व व्यापार जरूरतें बताती हैं कि समुद्री सुरक्षा आने वाले वर्षों में और महत्वपूर्ण होगी।

पनडुब्बियां, मिसाइलें, ड्रोन और लंबी दूरी के विमान इस रणनीति के जरूरी हिस्से हैं। लेकिन इन सबके बीच एयरक्राफ्ट कैरियर की भूमिका अलग है। यह एक साथ हवाई ताकत, समुद्री मौजूदगी, लॉजिस्टिक पहुंच और रणनीतिक संदेश देता है।

इसलिए तीसरे कैरियर की बहस सिर्फ नौसेना की मांग नहीं है। यह इस बात का फैसला भी है कि भारत आने वाले दशकों में हिंद महासागर में सिर्फ एक बड़ी ताकत बनना चाहता है या अपनी मौजूदगी को लगातार बनाए रखने वाली समुद्री शक्ति के तौर पर देखा जाना चाहता है।

 

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