J&K Assembly में ‘स्टेटहुड’ पर संग्राम: स्पीकर हटाने की मांग, ऑटोनॉमी के जिक्र पर BJP का हंगामा

उमर अब्दुल्ला के Statehood Resolution में 2000 के Autonomy और 2024 के Special Status प्रस्ताव का संदर्भ, BJP ने भाषा पर जताई आपत्ति

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने के प्रस्ताव ने सियासी टकराव को और तेज कर दिया है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 25 सितंबर को राज्य का दर्जा बहाल करने का प्रस्ताव पेश किया, लेकिन उसमें 2000 के ऑटोनॉमी रिजॉल्यूशन और नवंबर 2024 के स्पेशल स्टेटस रिजॉल्यूशन का संदर्भ आने के बाद बीजेपी ने इसका विरोध शुरू कर दिया। सोमवार को मामला इतना बढ़ा कि बीजेपी विधायकों ने स्पीकर अब्दुल रहीम राथर को हटाने की मांग करते हुए सदन के वेल में धरना दिया।

लेकिन इस पूरे विवाद को समझने के लिए सिर्फ आज का हंगामा जानना काफी नहीं है। इसके पीछे 2019 में जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन, 2000 का ऑटोनॉमी प्रस्ताव, 2024 का स्पेशल स्टेटस प्रस्ताव और अब 2026 का स्टेटहुड प्रस्ताव दरअसल चार अलग-अलग पड़ाव हैं।

उमर अब्दुल्ला के प्रस्ताव में क्या है?

25 सितंबर को उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में प्रस्ताव रखा। इसका मुख्य आग्रह था कि केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा तत्काल और जरूरी तौर पर बहाल करे। प्रस्ताव की सबसे महत्वपूर्ण लाइन है कि यह मांग 26 जून 2000 और 6 नवंबर 2024 को विधानसभा द्वारा पारित प्रस्तावों के अतिरिक्त की जा रही है। यानी मौजूदा प्रस्ताव ने पुराने दोनों प्रस्तावों का संदर्भ अपने साथ जोड़ दिया।

यही एक लाइन बीजेपी के विरोध का केंद्र बन गई। उमर अब्दुल्ला का कहना है कि मौजूदा प्रस्ताव सिर्फ राज्य का दर्जा बहाल करने के बारे में है। उनके मुताबिक 2000 और 2024 के प्रस्ताव पहले ही सदन की संपत्ति हैं और नए प्रस्ताव में उनका जिक्र यह स्पष्ट करने के लिए है कि यह उन प्रस्तावों से अलग है।

2000 का ऑटोनॉमी रिजॉल्यूशन क्या था?

इस विवाद की जड़ 26 जून 2000 तक जाती है।उस समय जम्मू-कश्मीर में फारूक अब्दुल्ला की अगुवाई वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार थी। विधानसभा ने Greater Autonomy यानी ज्यादा स्वायत्तता की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया था।

इस प्रस्ताव में जम्मू-कश्मीर के लिए 9 अगस्त 1953 से पहले की संवैधानिक स्थिति की ओर लौटने की मांग की गई थी। यानी वह दौर जब केंद्र और जम्मू-कश्मीर के बीच संवैधानिक संबंध आज की व्यवस्था से अलग थे। प्रस्ताव में तत्कालीन संवैधानिक पदनामों Sadr-i-Riyasat और Wazir-e-Azam की व्यवस्था की बहाली जैसी बातें भी जुड़ी थीं।

यही वजह है कि बीजेपी 2000 के प्रस्ताव के संदर्भ को मौजूदा स्टेटहुड प्रस्ताव में शामिल किए जाने पर आपत्ति जता रही है। बीजेपी का कहना है कि राज्य का दर्जा बहाल करना एक अलग मुद्दा है, जबकि 1953 से पहले की स्थिति या ऑटोनॉमी की बात अलग संवैधानिक-राजनीतिक मुद्दा है।

2024 में फिर उठा था स्पेशल स्टेटस का मुद्दा

2019 के बाद विधानसभा के चुनाव 2024 में हुए। नई विधानसभा की पहली कार्यवाही में 6 नवंबर 2024 को एक प्रस्ताव पारित हुआ, जिसमें जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे और संवैधानिक गारंटियों की बहाली के लिए संवाद की मांग की गई थी। इस प्रस्ताव को बीजेपी ने समर्थन नहीं दिया था।

अब 2026 के स्टेटहुड प्रस्ताव में इसी 2024 के प्रस्ताव का भी संदर्भ है। इस तरह मौजूदा विवाद में तीन तारीखें बेहद महत्वपूर्ण हो गई हैं, पहला 26 जून 2000 जिसमें  Greater Autonomy Resolution पास किया, दूसरा 6 नवंबर 2024 जब  Special Status/Constitutional Guarantees Resolution पास हुआ  और तीसरा 25 सितंबर 2026 जिसमें  Full Statehood Resolution पास हुआ ।

बीजेपी स्टेटहुड के खिलाफ है या नहीं?

नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने कहा है कि बीजेपी भी जम्मू-कश्मीर के राज्य के दर्जे की बहाली के पक्ष में है। उनकी आपत्ति प्रस्ताव की भाषा और उसमें 2000 के ऑटोनॉमी प्रस्ताव के संदर्भ को लेकर है। बीजेपी का तर्क है कि ऑटोनॉमी और विशेष दर्जे से जुड़े संदर्भों को जोड़कर राज्यhood की मांग को दूसरे संवैधानिक मुद्दों के साथ मिलाया जा रहा है। वहीं उमर अब्दुल्ला का पक्ष है कि मौजूदा प्रस्ताव का विषय सिर्फ राज्य का दर्जा है। यानी दोनों पक्षों के बीच फिलहाल बड़ा मतभेद प्रस्ताव की भाषा और पुराने प्रस्तावों के संदर्भ को लेकर है।

फिर स्पीकर को हटाने की मांग क्यों?

विवाद का दूसरा बड़ा अध्याय विधानसभा अध्यक्ष अब्दुल रहीम राथर से जुड़ा है। बीजेपी विधायक आरएस पठानिया ने आरोप लगाया कि स्पीकर ने प्रस्ताव को अनुमति देकर निष्पक्षता नहीं दिखाई। बीजेपी के 23 सदस्यों की ओर से स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव दिए जाने की बात भी सदन में कही गई। सोमवार को बीजेपी सदस्यों ने “कुर्सी छोड़ो” के नारे लगाए और वेल में जाकर प्रदर्शन किया। इसके बाद “भारत माता की जय” और “वंदे मातरम्” के नारे भी लगाए गए। इसके बावजूद स्पीकर ने प्रश्नकाल जारी रखा।

स्पीकर राथर ने जवाब दिया कि उन्हें हटाने का नोटिस विधानसभा सचिवालय को लिखित रूप में मिल चुका है। लेकिन कानून के अनुसार इस तरह के प्रस्ताव पर नोटिस मिलने के 14 दिन बाद ही विचार किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने कहा कि वह तत्काल कुर्सी नहीं छोड़ सकते और कार्यवाही जारी रखी।

‘कुर्सी छोड़ो’ से लेकर वेल में धरने तक क्यों पहुंचा मामला?

बीजेपी का कहना है कि अगर स्पीकर के खिलाफ हटाने का प्रस्ताव लंबित है और प्रस्ताव की अनुमति पर ही सवाल उठ रहे हैं, तो स्पीकर को उस दौरान सदन की अध्यक्षता नहीं करनी चाहिए।

दूसरी तरफ स्पीकर का रुख प्रक्रिया पर आधारित है—जब तक निर्धारित संवैधानिक/विधानसभा प्रक्रिया के मुताबिक हटाने का प्रस्ताव विचार के लिए नहीं आता, तब तक उनके पास सदन चलाने की जिम्मेदारी है।

क्या राज्य का दर्जा बहाल करने का फैसला विधानसभा कर सकती है?

यह भी समझना जरूरी है कि विधानसभा का प्रस्ताव अपने आप जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य नहीं बना देता। विधानसभा केंद्र सरकार से राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग कर सकती है और प्रस्ताव पारित कर सकती है, लेकिन जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति बदलने का अंतिम निर्णय केंद्र और संसद की संवैधानिक/कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा होगा।

फिलहाल विवाद का केंद्र स्टेटहुड की मांग से ज्यादा उस मांग की भाषा और उसमें पुराने संवैधानिक प्रस्तावों के संदर्भ पर है। सरकार इसे राज्यhood की मांग तक सीमित बता रही है, जबकि बीजेपी उन पुराने संदर्भों को लेकर संवैधानिक आपत्ति जता रही है। इसी मतभेद ने विधानसभा की कार्यवाही को हंगामे में बदल दिया है।

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