पुस्तक का नाम: कथा रूप: बलिदानी हेमू कालानी
लेखक: किशोर कान्त
प्रकाशक: सुरुचि प्रकाशन, नई दिल्ली
पृष्ठ: 99
मूल्य: 149 प्रिंट
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास उन नेताओं की कथा मात्र नहीं है, जिनके नाम इतिहास की मुख्यधारा में बार-बार दोहराए जाते हैं। इसकी वास्तविक व्यापकता उन असंख्य युवाओं, विद्यार्थियों और सामान्य परिवारों के बलिदान में भी छिपी हुई है, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता को अपने जीवन से बड़ा मान लिया था। स्वतंत्रता का वह संघर्ष केवल बड़े राजनीतिक आंदोलनों, सभाओं और प्रस्तावों तक सीमित नहीं था। उसके पीछे ऐसे अनगिनत युवा थे, जिन्होंने अपने भीतर उठी राष्ट्र की पुकार को जीवन का ध्येय बना लिया और बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के अपने वर्तमान को देश के भविष्य के लिए समर्पित कर दिया।
इनमें से अनेक ऐसे थे, जिनकी आयु इतनी कम थी कि आज हम उन्हें किशोर या विद्यार्थी कहेंगे। उनके सामने जीवन की लंबी राह थी, सपने थे, परिवार था और भविष्य की अनेक संभावनाएँ थीं। फिर भी जब देश पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख, सुरक्षा और भविष्य से ऊपर राष्ट्र की स्वतंत्रता को रखा। देशभक्ति की भावना ने साधारण परिवारों के इन युवाओं को असाधारण साहस के मार्ग पर खड़ा कर दिया।
स्वतंत्रता आंदोलन की यह धारा देश के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देती है। बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों और गाँवों तक, विद्यार्थियों से लेकर श्रमिकों और सामान्य नागरिकों तक, असंख्य लोगों ने इस संघर्ष में अपनी भूमिका निभाई। किसी ने सत्याग्रह किया, किसी ने भूमिगत रहकर काम किया, किसी ने संदेश पहुँचाए, किसी ने ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी और किसी ने हँसते हुए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। इतिहास के पन्नों में इन सबके नाम समान विस्तार से दर्ज नहीं हो सके, लेकिन राष्ट्र की स्वतंत्रता की नींव में उनके त्याग की भूमिका कम नहीं थी।
सिंध की धरती भी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की इसी व्यापक और बहुरंगी गाथा का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय रही है। सिंध के युवाओं ने भी पराधीनता के विरुद्ध संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाई। वहाँ की राष्ट्रवादी चेतना ने अनेक युवाओं को अंग्रेजी सत्ता के सामने खड़े होने का साहस दिया। इसी परिवेश में एक ऐसा किशोर सामने आया, जिसने बहुत कम आयु में अपने भीतर स्वतंत्र भारत का स्वप्न संजोया और उस स्वप्न के लिए अपने जीवन का सर्वोच्च मूल्य चुका दिया। उस किशोर का नाम था ‘हेमू कालानी’।
अमर शहीद हेमू कालानी का नाम अधिकांश भारतीय शायद ही जानते हों, जबकि सत्य यह है कि हेमू कालानी देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व होम करने वाले वीर क्रांतिकारी थे। इन्हीं हेमू कालानी के जीवन को कथा रूप में प्रकट करती हुई एक पुस्तक हाल ही में हाथ लगी। चिंतक, विचारक समाजसेवी किशोर कान्त द्वारा लिखी इस पुस्तक का शीर्षक है ‘कथा रूप: बलिदानी हेमू कालानी’। 99 पृष्ठों की इस पुस्तक का प्रकाशन किया है देश के सुप्रसिद्ध प्रकाशन सुरुचि प्रकाशन ने।
किशोर कान्त की यह पुस्तक अपेक्षाकृत कम चर्चित ‘बलिदानी हेमू कालानी’ की जीवनगाथा को ‘कथा रूप’ में पाठकों के सामने लाती है। पुस्तक का आरंभ ही हेमू के व्यक्तित्व के उस पक्ष से होता है, जो आगे चलकर उसके जीवन की केंद्रीय पहचान बनता है। एक किशोर का फाँसी के फंदे को मृत्यु के प्रतीक से अधिक देश के लिए बलिदान की तैयारी के रूप में देखना पाठक को तत्काल उसके मनोविज्ञान और व्यक्तित्व की ओर खींच लेता है। लेखक ने हेमू के बचपन, उसके परिवार, मित्रों, शिक्षकों और स्वतंत्रता आंदोलन के वातावरण को जोड़ते हुए धीरे-धीरे उस किशोर को एक ऐसे युवा क्रांतिकारी के रूप में विकसित किया है, जिसके लिए देशभक्ति भावना से बढ़कर जीवन का संकल्प थी।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘कथा-रूप’ है। लेखक ने हेमू के जीवन को सूखी घटनाओं और तारीखों की सूची बनाने के बजाय संवादों, प्रसंगों और घटित हुए दृश्यों के माध्यम से प्रस्तुत किया है। हेमू और उसके मित्र हीरा, शिक्षक जीवतराम लालवानी, चाचा डॉक्टर मंघाराम कालानी तथा माता-पिता के बीच का संवाद कथा को मानवीय धरातल प्रदान करते हैं। विशेष रूप से माता जेठी बाई और हेमू के बीच के प्रसंग पुस्तक की भावनात्मक धुरी बन जाते हैं।
पुस्तक हेमू को एक साहसी युवक के रूप में तो देखती ही है, इसके साथ ही उसके निर्माण की सामाजिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि को भी सामने रखती है। गीता, गुरुग्रंथ साहब, झूलेलाल, सिंधी सांस्कृतिक चेतना, परिवार के संस्कार और स्वतंत्रता आंदोलन का वातावरण उसके व्यक्तित्व के अलग-अलग सूत्रों को जोड़ते हैं। इस दृष्टि से हेमू की कहानी उस समय के सिंध के सामाजिक वातावरण और राष्ट्रीय चेतना की कहानी भी बन जाती है।
कथा में स्वतंत्रता आंदोलन के दो प्रवाह भी दिखाई देते हैं। एक ओर गाँधीजी के नेतृत्व वाला अहिंसक आंदोलन है, दूसरी ओर भूमिगत क्रांतिकारी गतिविधियाँ हैं। हेमू का चरित्र इसी तनावपूर्ण राजनीतिक वातावरण में विकसित होता है। पुस्तक में जुलूस, प्रभात फेरियाँ, भूमिगत बैठकें, पर्चे और साहित्य का वितरण, पुलिस दमन, गिरफ्तारियाँ तथा जेल से साथियों को छुड़ाने के प्रयास जैसे अनेक प्रसंगों के माध्यम से उस समय की बेचैनी और संघर्ष को जीवंत किया गया है।
कथा का सबसे मार्मिक हिस्सा हेमू द्वारा अंग्रेजी सेना से भरी रेलगाड़ी को पटरी से उतारने की योजना, उसके बाद उसकी गिरफ्तारी, मुकदमा, जेल में यातनाएँ और अंततः फाँसी तक पहुँचता है। लेखक इन घटनाओं को अत्यंत मार्मिक और भावुक ढंग से प्रस्तुत करते हैं। पाठक को ऐसा अनुभव होता है जैसे घटनाएँ उसके सामने घट रही हों। यही कथा-शैली पुस्तक को किशोर और युवा पाठकों के लिए विशेष रूप से प्रभावी बनाती है।
लेकिन पुस्तक की वास्तविक भावनात्मक ऊँचाई उसके अंतिम हिस्से में आती है। हेमू की फाँसी से पहले माता-पिता से उसकी मुलाकात, माँ की ममता और पुत्र का अपने संकल्प पर अडिग रहना, फाँसी के दिन का वातावरण और अंतिम यात्रा के प्रसंग पुस्तक को व्यक्तिगत शोक से उठाकर सामूहिक स्मृति का रूप देते हैं। यहाँ हेमू केवल परिवार का पुत्र नहीं रह जाता, वह एक ऐसी स्मृति बन जाता है जिसे पूरा समाज अपने भीतर सँजोता है।
पुस्तक की एक और महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि कथा हेमू की मृत्यु पर समाप्त नहीं होती। लेखक उसके बाद की स्मृति-परंपरा को भी विस्तार से सामने लाते हैं। हेमू की श्रद्धांजलियों, स्मारकों, साहित्यिक रचनाओं, नाटकों, पुस्तिकाओं, डाक टिकट, लोकसभा में स्थापित प्रतिमा तथा सिंधी समाज में मनाए जाने वाले जन्मदिवस और बलिदान दिवस के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि किसी व्यक्ति का बलिदान उसके जीवनकाल से कहीं आगे तक किस प्रकार सामाजिक स्मृति में जीवित रहता है।
विशेष रूप से पुस्तक का ‘पंजाब माता-सिंध माता’ प्रसंग उल्लेखनीय है। यह प्रसंग हेमू और भगतसिंह की स्मृति को दो माताओं के माध्यम से जोड़ता है। यहाँ शहादत व्यक्तिगत वीरता से बढ़कर, विभाजन, विस्थापन और स्मृति से जुड़ा एक व्यापक मानवीय अनुभव बन जाती है। इसी क्रम में पुस्तक सिंधी समाज के विस्थापन और स्वतंत्र भारत में उसके पुनर्निर्माण की कथा को भी हेमू की स्मृति से जोड़ती है। इस अर्थ में यह पुस्तक जीवन, बलिदान और स्मृति, तीनों की कथा बन जाती है।
किशोर कान्त की पुस्तक का सबसे बड़ा योगदान यही है कि यह हेमू कालानी को केवल एक नाम या शहीद दिवस तक सीमित नहीं रहने देती। वह उसे एक जीवंत किशोर के रूप में सामने लाती है, जिसके भीतर खेल का उत्साह है, मित्रता है, परिवार के प्रति स्नेह है, शिक्षा का वातावरण है, अन्याय के प्रति आक्रोश है और अंततः देश के लिए अपना सर्वस्व देने का संकल्प है।
आज जब स्वतंत्रता आंदोलन की अनेक स्थानीय और क्षेत्रीय कथाएँ व्यापक राष्ट्रीय स्मृति से धीरे-धीरे दूर होती जा रही हैं, ‘बलिदानी हेमू कालानी’ जैसी पुस्तकें उस स्मृति को पुनः सामने लाने का काम करती हैं। इस पुस्तक का महत्त्व केवल हेमू कालानी की व्यक्तिगत वीरगाथा को सामने लाने में नहीं है। यह उस व्यापक इतिहास की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है, जिसमें अनेक ऐसे नाम हैं जिनका योगदान स्वतंत्रता की राष्ट्रीय स्मृति में अपेक्षित स्थान नहीं पा सका। हेमू कालानी की कथा उस पीढ़ी के साहस, त्याग और राष्ट्रनिष्ठा को समझने का अवसर देती है, जिसने स्वतंत्रता के लिए अपने जीवन की सबसे बड़ी कीमत चुकाई।
ऐसी वीरगाथाओं को स्मरण करना केवल अतीत को जानना नहीं है। यह उस राष्ट्रीय चेतना को समझना भी है, जिसने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष को व्यापक जनआंदोलन का स्वरूप दिया। जब इतिहास के इन अपेक्षाकृत कम चर्चित अध्यायों को पढ़ा जाता है, तब स्वतंत्रता की कीमत और उसके पीछे छिपे असंख्य अनाम तथा अल्पज्ञात बलिदानों का बोध और गहरा होता है। हेमू कालानी की कहानी इसी बोध को जीवंत करती है और आने वाली पीढ़ियों के सामने यह प्रश्न रखती है कि जिस स्वतंत्रता के लिए एक किशोर अपना जीवन न्योछावर कर सकता था, उसके मूल्य को हम आज किस तरह समझते और संजोते हैं।
