फरवरी 2024 से अक्टूबर 2026 तक भारत ने ₹7 लाख करोड़ से अधिक के रक्षा खरीद प्रस्तावों को मंजूरी दी है। यह आंकड़ा बताता है कि भारत अपनी सैन्य क्षमताओं को आधुनिक बनाने, पुराने उपकरणों की जगह नई तकनीक लाने और घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत करने पर कितना बड़ा जोर दे रहा है। इन प्रस्तावों में लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, तोपें, मिसाइलें, ड्रोन और आधुनिक निगरानी प्रणालियों जैसी क्षमताएं शामिल हैं।
26 अक्टूबर 2026 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने लगभग ₹2.12 लाख करोड़ के पूंजीगत रक्षा खरीद प्रस्तावों को मंजूरी दी। इनमें करीब 82 प्रतिशत खरीद मूल्य भारतीय उद्योग से हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। यह स्वदेशी रक्षा उत्पादन और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
लेकिन इन आंकड़ों को समझने के लिए एक सवाल का जवाब जानना जरूरी है—जब भी रक्षा मंत्रालय किसी बड़े रक्षा खरीद प्रस्ताव को मंजूरी देता है, तो उस प्रक्रिया की शुरुआत किस चरण से होती है? इसी चरण का नाम है AoN यानी Acceptance of Necessity।
AoN क्या है? रक्षा खरीद की पहली औपचारिक मंजूरी
AoN का पूरा नाम Acceptance of Necessity है, जिसका अर्थ है किसी सैन्य जरूरत को औपचारिक रूप से स्वीकार करना। जब सेना, नौसेना या वायुसेना को किसी नई क्षमता की जरूरत होती है, तो उस आवश्यकता का आकलन किया जाता है। इसके बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत खरीद प्रस्ताव को मंजूरी दी जाती है।
इसे रक्षा खरीद की शुरुआती हरी झंडी समझ सकते हैं। AoN के बाद संबंधित उपकरण की खरीद के लिए निविदा, तकनीकी मूल्यांकन, परीक्षण, कीमत पर बातचीत और अनुबंध जैसी प्रक्रियाएं आगे बढ़ती हैं। यानी यह मंजूरी किसी कंपनी को सीधे ऑर्डर देने के बजाय खरीद प्रक्रिया शुरू करने का आधार तैयार करती है।
इसलिए ₹7 लाख करोड़ से अधिक के AoN प्रस्तावों का मतलब यह नहीं है कि पूरी रकम खर्च हो चुकी है। इसका मतलब है कि इतनी अनुमानित कीमत के रक्षा प्रस्तावों को खरीद प्रक्रिया में आगे बढ़ाने की मंजूरी दी गई है।
26 अक्टूबर की मंजूरी में क्या-क्या शामिल है?
26 अक्टूबर 2026 को मंजूर लगभग ₹2.12 लाख करोड़ के प्रस्तावों का दायरा थलसेना, नौसेना और वायुसेना की अलग-अलग परिचालन जरूरतों तक फैला है।
थलसेना के लिए स्वचालित तोप प्रणालियां, हाई मोबिलिटी व्हीकल, कम दूरी की वायु रक्षा मिसाइलें, ड्रोन और ड्रोन-रोधी प्रणालियां प्रस्तावित हैं। इनका उद्देश्य सेना की मारक क्षमता, गतिशीलता और आधुनिक युद्धक्षेत्र में प्रतिक्रिया देने की क्षमता को मजबूत करना है।
नौसेना के लिए एक्टिव ऑफबोर्ड डिकॉय सिस्टम जैसी तकनीकें शामिल हैं। ऐसी प्रणालियां दुश्मन की एंटी-शिप मिसाइलों को युद्धपोत से दूर भटकाने में मदद करती हैं। समुद्री सुरक्षा में इस तरह की तकनीकें युद्धपोतों की रक्षा क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
वायुसेना और थलसेना के लिए हल्के बहुउद्देश्यीय हेलीकॉप्टरों की खरीद भी प्रस्तावित है। इनका इस्तेमाल निगरानी, परिवहन, खोज-बचाव और विभिन्न परिचालन जरूरतों में किया जा सकता है। पुराने चेतक और चीता हेलीकॉप्टर बेड़ों को आधुनिक विकल्पों से बदलने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जाती रही है।
इन प्रस्तावों में घरेलू उद्योग की भागीदारी पर जोर यह भी दर्शाता है कि रक्षा आधुनिकीकरण को भारत में विनिर्माण, तकनीकी विकास और रोजगार के अवसरों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
फरवरी 2024 से अक्टूबर 2026 तक: बड़ी रक्षा खरीद की तस्वीर
इस अवधि में कई महत्वपूर्ण रक्षा खरीद प्रस्तावों को AoN मिला। अलग-अलग चरणों में मंजूर प्रस्तावों में लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, तोपें, समुद्री निगरानी प्लेटफॉर्म, मिसाइलें और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियां शामिल रही हैं।
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फरवरी 2024: लगभग ₹84,560 करोड़ के प्रस्तावों को मंजूरी मिली।
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नवंबर 2024: लगभग ₹2.23 लाख करोड़ के प्रस्ताव मंजूर हुए, जिनमें 97 अतिरिक्त तेजस Mk1A लड़ाकू विमान और 156 प्रचंड हल्के लड़ाकू हेलीकॉप्टर जैसे बड़े प्रस्ताव शामिल थे।
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जुलाई 2025: लगभग ₹1.05 लाख करोड़ के प्रस्तावों में गश्ती पोत, एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियां शामिल रहीं।
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सितंबर 2026: लगभग ₹1.10 लाख करोड़ के प्रस्तावों में हवाई निगरानी, जैमिंग और बख्तरबंद प्लेटफॉर्म से जुड़ी क्षमताएं शामिल थीं।
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अक्टूबर 2026: लगभग ₹2.12 लाख करोड़ के प्रस्तावों को मंजूरी दी गई।
इन आंकड़ों को जोड़कर प्रस्तुत करते समय ध्यान रखना चाहिए कि अलग-अलग घोषणाओं में शामिल प्रस्तावों और उनके मूल्यांकन का दायरा अलग हो सकता है। इसलिए कुल राशि को संबंधित आधिकारिक मंजूरियों के आधार पर ही समझना चाहिए।
स्वदेशी रक्षा उद्योग के लिए क्यों अहम है AoN?
रक्षा उपकरणों का निर्माण लंबी योजना, बड़े निवेश, विशेष तकनीक और मजबूत आपूर्ति व्यवस्था की मांग करता है। कंपनियों को नई उत्पादन लाइन लगाने, कुशल कर्मचारियों को तैयार करने और अनुसंधान एवं विकास में निवेश करने के लिए भविष्य की मांग का अनुमान चाहिए।
AoN के बाद किसी प्रस्ताव के खरीद प्रक्रिया में आगे बढ़ने से उद्योग को संभावित जरूरतों का संकेत मिलता है। हालांकि, अंतिम ऑर्डर प्रतिस्पर्धा, तकनीकी उपयुक्तता, कीमत और अन्य निर्धारित शर्तों पर निर्भर करता है।
भारतीय कंपनियों के लिए यह अवसर रक्षा क्षेत्र में अपनी तकनीकी क्षमता बढ़ाने, स्वदेशी प्रणालियां विकसित करने और वैश्विक रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में बड़ी भूमिका हासिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है।
CAG की टिप्पणियां क्या बताती हैं?
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टें रक्षा खरीद की प्रक्रियाओं का मूल्यांकन करती हैं। उनका उद्देश्य यह देखना है कि सार्वजनिक धन का इस्तेमाल निर्धारित नियमों के अनुसार हो और सैन्य बलों को जरूरी उपकरण समय पर उपलब्ध हों।
वायुसेना की पूंजीगत खरीद पर CAG की 2019 की रिपोर्ट में तकनीकी आवश्यकताओं को व्यावहारिक बनाने, कीमत के आकलन को बेहतर करने और खरीद प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों के बीच समन्वय सुधारने जैसे मुद्दे सामने आए थे।
इन टिप्पणियों को रक्षा खरीद प्रणाली में सुधार के अवसर के रूप में देखा जा सकता है। आधुनिक हथियारों की खरीद में तकनीकी मानकों को परिचालन जरूरतों के अनुरूप रखना, कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करना और समयसीमा पर नजर बनाए रखना जरूरी है। इससे न केवल खरीद प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकती है, बल्कि सेना को सही समय पर बेहतर उपकरण उपलब्ध कराने में भी मदद मिल सकती है।
AoN से सैन्य क्षमता तक: आगे की राह
रक्षा खरीद की सफलता केवल मंजूर प्रस्तावों की राशि से नहीं मापी जाती। इसका आकलन इस आधार पर भी होना चाहिए कि प्रस्ताव कितनी तेजी से निविदा, परीक्षण और अनुबंध के चरणों से गुजरते हैं तथा उपकरण कब तक सैन्य बलों में शामिल होते हैं।
भारत के लिए यह प्रक्रिया इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सैन्य आधुनिकीकरण के साथ घरेलू विनिर्माण क्षमता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और रणनीतिक जरूरतों को एक साथ आगे बढ़ाना है।
₹7 लाख करोड़ से अधिक के रक्षा प्रस्ताव इस दिशा में बड़े पैमाने की पहल को दर्शाते हैं। अब इन मंजूरियों को समयबद्ध खरीद, स्वदेशी तकनीक और सैन्य बलों की वास्तविक परिचालन क्षमता में बदलना इस प्रयास का अगला महत्वपूर्ण चरण है।
