भारत और स्विट्जरलैंड के बीच सोमवार को हुई बातचीत ऐसे समय में हुई है, जब भारत की एक दूसरी बड़ी व्यापार वार्ता—अमेरिका के साथ प्रस्तावित ट्रेड डील एक अहम मोड़ पर पहुंच गई है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता “प्लेटो” यानी ऐसे मुकाम पर पहुंच गई है, जहां आगे और रियायत देना या लेना दोनों पक्षों के लिए बेहद मुश्किल हो सकता है। हालांकि उन्होंने साफ किया कि बातचीत बंद नहीं हुई है और अगर आगे बढ़ने की गुंजाइश बनी तो दोनों देश उस पर काम करेंगे।
इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गाय पार्मेलिन की मुलाकात में निवेश, रोजगार, तकनीक, रिसर्च, युवाओं की आवाजाही, इंफ्रास्ट्रक्चर, रक्षा और परमाणु ऊर्जा तक सहयोग बढ़ाने की घोषणा हुई। सबसे बड़ा लक्ष्य है—अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर के निवेश और करीब 10 लाख प्रत्यक्ष रोजगार का रास्ता तैयार करना।
तो क्या अमेरिका के साथ अटकी बातचीत के बीच स्विट्जरलैंड की यह डील भारत के लिए नया आर्थिक रास्ता खोल रही है? और आखिर इस पूरे घटनाक्रम का मतलब क्या है?
अमेरिका से ट्रेड डील में अटका क्या है
भारत और अमेरिका फरवरी 2025 से द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। मकसद बाजार पहुंच बढ़ाना, व्यापार संबंधों को विस्तार देना और दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे व्यापार असंतुलन से जुड़े मुद्दों को सुलझाना है।
लेकिन बातचीत के दौरान टैरिफ, बाजार पहुंच और व्यापार संतुलन जैसे मुद्दे मुश्किल बने हुए हैं। अमेरिका भारत के साथ अपने व्यापार घाटे को कम करना चाहता है, जबकि भारत अपने बाजार को खोलने के बदले समान और व्यावहारिक बाजार पहुंच चाहता है। सीतारमण ने सोमवार को कहा कि बातचीत काफी कठिन और बेहद गंभीर तरीके से हुई है, लेकिन दोनों पक्ष अब ऐसे बिंदु पर पहुंच गए हैं जहां “give and take” यानी कुछ देने और कुछ हासिल करने की गुंजाइश सीमित हो गई है।
यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि भारत किसी भी कीमत पर जल्दबाजी में समझौता करने के बजाय अपने आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना चाहता है।
अमेरिका के साथ अड़चन, तो स्विट्जरलैंड क्यों महत्वपूर्ण?
यहीं भारत-स्विट्जरलैंड समझौते का महत्व बढ़ जाता है। स्विट्जरलैंड अकेले यूरोप का बाजार नहीं है। वह EFTA यानी European Free Trade Association का हिस्सा है। भारत और EFTA के बीच Trade and Economic Partnership Agreement यानी TEPA पिछले साल लागू हुआ था। इसमें स्विट्जरलैंड के साथ-साथ आइसलैंड, नॉर्वे और लिकटेंस्टीन भी शामिल हैं।
इस समझौते की खासियत यह है कि यह सिर्फ आयात-निर्यात तक सीमित नहीं है। इसके साथ निवेश और रोजगार का एक बड़ा लक्ष्य भी जुड़ा है। भारत का लक्ष्य अगले 15 वर्षों में EFTA देशों से 100 अरब डॉलर का निवेश आकर्षित करना और इससे करीब 10 लाख प्रत्यक्ष रोजगार पैदा करना है।
यानी भारत अब सिर्फ यह नहीं देख रहा कि किसी देश के साथ कितना सामान खरीदा-बेचा जा रहा है। फोकस यह भी है कि विदेशी समझौते से देश में पूंजी, कारखाने, तकनीक, रिसर्च और रोजगार कितना आता है।
100 अरब डॉलर सिर्फ एक निवेश आंकड़ा नहीं
यहां एक बात समझना जरूरी है। 100 अरब डॉलर का आंकड़ा तुरंत मिलने वाला निवेश नहीं, बल्कि अगले 15 वर्षों का लक्ष्य है। स्विट्जरलैंड की कंपनियां फार्मा, लाइफ साइंसेज, वित्तीय सेवाओं, मशीनरी, फूड प्रोसेसिंग, सस्टेनेबिलिटी और उन्नत तकनीक जैसे क्षेत्रों में मजबूत हैं। भारत चाहता है कि इन क्षेत्रों में ज्यादा निवेश और उत्पादन देश में आए।
इससे भारत को सिर्फ विदेशी पूंजी नहीं मिलेगी, बल्कि तकनीक और विशेषज्ञता के हस्तांतरण की भी संभावना बढ़ेगी। यही वजह है कि सोमवार की बातचीत में टेक्नोलॉजी, रिसर्च और इनोवेशन को व्यापार के बराबर महत्व दिया गया।
10 लाख नौकरियां कैसे आएंगी?
10 लाख रोजगार का लक्ष्य सीधे किसी एक कंपनी या परियोजना की भर्ती नहीं है। यह उस व्यापक निवेश से पैदा होने वाले प्रत्यक्ष रोजगार का दीर्घकालिक लक्ष्य है। अगर स्विस कंपनियां भारत में नई उत्पादन इकाइयां लगाती हैं, मौजूदा कारोबार बढ़ाती हैं या रिसर्च और टेक्नोलॉजी केंद्र स्थापित करती हैं, तो उनके साथ सप्लायर, सर्विस कंपनियां और दूसरे कारोबारी भी जुड़ सकते हैं। इसका असर इंजीनियरिंग, फार्मा, टेक्नोलॉजी, रिसर्च, लॉजिस्टिक्स और स्किल्ड प्रोफेशनल्स जैसे क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
सिर्फ निवेश नहीं, युवाओं के लिए भी रास्ता
भारत-स्विट्जरलैंड बातचीत में Migration and Mobility Partnership भी अहम है। इसके तहत भारतीय छात्रों, प्रोफेशनल्स और युवाओं के लिए आवाजाही और अवसरों को आसान बनाने पर जोर है। Young Professionals Scheme के तहत दोनों देशों से हर साल 300 युवा प्रोफेशनल्स के आदान-प्रदान का प्रावधान है, जिसे आपसी सहमति से 500 तक बढ़ाया जा सकता है। यानी समझौते का एक हिस्सा पैसा और कारोबार है, तो दूसरा हिस्सा प्रतिभा और लोगों की आवाजाही है।
EV से लेकर टनल और रोपवे तक टेक्नोलॉजी सहयोग
भारत और स्विट्जरलैंड ने परिवहन और इंफ्रास्ट्रक्चर टेक्नोलॉजी में भी सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है। EV, मोबिलिटी सिस्टम, रोपवे, टनल टेक्नोलॉजी और सर्कुलर इकोनॉमी जैसे क्षेत्रों में सहयोग भारत के लिए खास महत्व रखता है। पहाड़ी और कठिन भौगोलिक इलाकों में रोपवे और टनल तकनीक भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार में उपयोगी हो सकती है। इसके साथ तकनीक हस्तांतरण, उद्योग-अकादमिक साझेदारी और सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर भी जोर है।
रिसर्च और स्टार्टअप पर भी बड़ा फोकस
भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और Swiss National Science Foundation के बीच वैज्ञानिक सहयोग बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। वहीं, Zurich University of Applied Sciences के साथ स्टार्टअप, उद्यमिता और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को बढ़ावा देने की पहल की गई है। इसका मकसद सिर्फ विदेशी तकनीक भारत में लाना नहीं, बल्कि भारतीय स्टार्टअप और शोधकर्ताओं को अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जोड़ना भी है।
रक्षा और परमाणु ऊर्जा तक पहुंची साझेदारी
भारत-स्विट्जरलैंड संबंध अब सिर्फ कारोबार तक सीमित नहीं रह गए हैं। बातचीत में रक्षा उत्पादन, सैन्य आदान-प्रदान और परमाणु ऊर्जा में सहयोग बढ़ाने की संभावना भी सामने आई है। यह भारत की उस व्यापक रणनीति से जुड़ता है जिसमें आर्थिक साझेदारी के साथ महत्वपूर्ण तकनीक, ऊर्जा, रक्षा और रणनीतिक क्षेत्रों में भी भरोसेमंद साझेदारियां विकसित की जा रही हैं।
तो क्या स्विट्जरलैंड अमेरिका का विकल्प है?
सीधे तौर पर ऐसा कहना सही नहीं होगा।
अमेरिका भारत का एक बेहद बड़ा व्यापारिक साझेदार और भारतीय निर्यात के लिए महत्वपूर्ण बाजार है। इसलिए अमेरिका के साथ ट्रेड डील का महत्व अपनी जगह बना रहेगा। लेकिन मौजूदा घटनाक्रम यह जरूर दिखाता है कि भारत अपनी आर्थिक रणनीति को किसी एक बाजार या एक व्यापार समझौते तक सीमित नहीं रखना चाहता।
अमेरिका के साथ बातचीत में जहां टैरिफ, बाजार पहुंच और व्यापार असंतुलन जैसे मुद्दे अभी भी बातचीत का हिस्सा हैं, वहीं EFTA के साथ भारत ने निवेश, रोजगार, तकनीक और लोगों की आवाजाही को एक बड़े आर्थिक पैकेज के रूप में आगे बढ़ाया है।
असली संदेश क्या है?
भारत-अमेरिका ट्रेड डील में गतिरोध का मतलब यह नहीं है कि भारत-अमेरिका आर्थिक रिश्ते खत्म हो रहे हैं। सीतारमण ने भी साफ किया है कि बातचीत जारी है। लेकिन उनका “प्लेटो” वाला बयान बताता है कि फिलहाल समझौते के अगले चरण में पहुंचना आसान नहीं है।
ऐसे माहौल में स्विट्जरलैंड और EFTA के साथ भारत का 100 अरब डॉलर निवेश और 10 लाख रोजगार वाला लक्ष्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत की विविधीकृत व्यापार और निवेश रणनीति को दिखाता है।
यानी संदेश साफ है कि भारत वैश्विक बाजार चाहता है, लेकिन सिर्फ बाजार नहीं। उसे निवेश, नौकरियां, तकनीक, रिसर्च और उत्पादन क्षमता भी चाहिए। और इसी वजह से अमेरिका के साथ ट्रेड डील की मौजूदा अड़चन के बीच स्विट्जरलैंड के साथ हुआ यह समझौता महज एक द्विपक्षीय मुलाकात नहीं, बल्कि भारत की बदलती आर्थिक रणनीति की एक बड़ी तस्वीर पेश करता है।
