मोहन भागवत बोले- बंटने की वजह से कमजोर हुए, भारत की एकता और सामाजिक सद्भाव पर दिया जोर

मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर नागपुर में शस्त्र पूजन किया। उन्होंने संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की समाधि पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। इस दौरान उन्होंने संघ के शताब्दी वर्ष

मोहन भागवत

मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर नागपुर में शस्त्र पूजन किया। उन्होंने संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की समाधि पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। इस दौरान उन्होंने संघ के शताब्दी वर्ष, भारत की एकता, सामाजिक सद्भाव और देश के सामने मौजूद चुनौतियों पर अपने विचार रखे।

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि जब भारत के लोग अपनी भावनात्मक एकता को भूलकर आपस में बंट गए, तब देश कमजोर हुआ। उन्होंने कहा कि भारतीय राष्ट्रीयता और एक-दूसरे के प्रति अपनापन हमारी सबसे बड़ी ताकत हैं। जब ये भावनाएं कमजोर पड़ती हैं, तो समाज में डर और असुरक्षा बढ़ने लगती है।

बंटने से कमजोर हुआ समाज: मोहन भागवत

मोहन भागवत ने कहा कि भारत की सनातन सोच सभी को साथ लेकर चलने की भावना सिखाती है। जब देश के लोगों ने इस विचार को अपनाया और भाषा, जाति, संप्रदाय तथा समुदाय से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता को महत्व दिया, तब भारत ने दुनिया के सामने एक आदर्श प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा कि जब समाज इस भावना को भूल गया, तो लोगों के बीच आपसी जुड़ाव और अपनेपन में कमी आई। इससे समाज बंट गया और उसकी ताकत कमजोर हुई। भागवत के मुताबिक, कमजोर होने के कारण लोगों के मन में डर पैदा हुआ और उन्होंने खुद को सीमित करना शुरू कर दिया।

संत रविदास के संदेश का किया जिक्र

संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में संत रविदास का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि संत रविदास ने कठिन परिस्थितियों में स्वधर्म के प्रति निष्ठा, सामाजिक समरसता और भक्ति का संदेश दिया था।

भागवत के अनुसार, संत रविदास ने अपने जीवन और विचारों से समाज का मनोबल बढ़ाया और लोगों को अपने मूल्यों से जुड़े रहने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि सामाजिक एकता और आपसी सद्भाव आज भी उतने ही जरूरी हैं।

दुनिया की नजर भारत पर, विकास के साथ पर्यावरण का संतुलन जरूरी

मोहन भागवत ने कहा कि भारत की तरक्की और दुनिया में बढ़ते उसके प्रभाव के कारण दूसरे देशों की दिलचस्पी भी भारत में बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देश भौतिक सुख-सुविधाओं और व्यक्तिगत हितों को अधिक महत्व देने वाली जीवनशैली के कारण अलग-अलग समस्याओं का सामना कर रहे हैं।

उन्होंने सवाल उठाया कि विविधता से भरी दुनिया में सभी को साथ लेकर कैसे चला जाए, विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए तथा परिवार और नई पीढ़ी में अच्छे संस्कारों को कैसे बनाए रखा जाए।

भागवत ने कहा कि भारत की परंपराओं और जीवन मूल्यों में इन सवालों के समाधान देने की क्षमता है। इसलिए देश को विकास के साथ अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक जिम्मेदारियों पर भी ध्यान देना चाहिए।

आंदोलनों का उद्देश्य समाधान होना चाहिए

संघ प्रमुख ने दुनिया के अलग-अलग देशों में हो रहे प्रदर्शनों और राजनीतिक बदलावों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत को बाहरी प्रभावों के प्रति सतर्क रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में आंदोलन होना सामान्य बात है, लेकिन उनका उद्देश्य समस्याओं का समाधान निकालना होना चाहिए।

भागवत ने आरोप लगाया कि कुछ लोग सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए लोगों को उकसाते हैं। उन्होंने कहा कि केवल सत्ता बदलने से सभी समस्याएं दूर नहीं होतीं। इसके लिए समाज में सकारात्मक बदलाव और समस्याओं के मूल कारणों को समझना जरूरी है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ ताकतें भारत, हिंदू समाज और RSS को कमजोर करने की कोशिश कर रही हैं। उनके अनुसार, राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित कुछ लोग भी ऐसी कोशिशों को समर्थन देते हैं।

भारत की एकता बिना किसी शर्त के है

मोहन भागवत ने कहा कि भारत के लोगों की एकता किसी समझौते या लेन-देन पर आधारित नहीं है, बल्कि यह दिल से आती है। उन्होंने कहा कि भारत हमें कुछ दे या न दे, देश के प्रति हमारा जुड़ाव और समर्पण बना रहना चाहिए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि RSS जिस संगठित और मजबूत हिंदू समाज की बात करता है, उसका अर्थ दूसरे धर्मों के प्रति सम्मान का विरोध करना नहीं है। भागवत के अनुसार, हिंदू विचार और परंपरा सभी को साथ लेकर चलने की भावना पर आधारित हैं।

उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता, आपसी सम्मान और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना देश के भविष्य के लिए जरूरी है।

Exit mobile version