भारत की सेना के लिए अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की भूमिका केवल नई तकनीक के इस्तेमाल तक सीमित नहीं रहने वाली। असली चुनौती है—अलग-अलग सैन्य सेंसर, निगरानी प्रणालियों और सूचनाओं से मिले डेटा को एक साथ जोड़ना, उसका विश्लेषण करना और कमांडरों को तेजी से निर्णय लेने में मदद देना। इसी दिशा में भारतीय AI कंपनी सरवम (Sarvam AI) और रक्षा मंत्रालय के मुख्यालय इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (HQ IDS) के बीच हुआ समझौता अहम माना जा रहा है।
27 अक्टूबर 2026 को घोषित इस समझौते का दायरा थलसेना, नौसेना और वायुसेना—तीनों सेवाओं तक है। इसका उद्देश्य रक्षा क्षेत्र में AI के इस्तेमाल, शोध, ज्ञान प्रबंधन, प्रशिक्षण और निर्णय लेने में सहायता देने वाले समाधान विकसित करना है।
इससे एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है: क्या सरवम भारत के लिए वैसी भूमिका निभा सकती है, जैसी अमेरिका की कंपनी पालांटिर (Palantir) वहां के रक्षा और खुफिया तंत्र में निभाती है? और जब अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी भी अपनी सेनाओं में AI कंपनियों को शामिल कर रहे हैं, तो भारत की यह पहल वैश्विक रुझान से कैसे जुड़ती है?
सरवम के साथ समझौते में क्या है खास?
सरवम की स्थापना 2023 में हुई थी। कंपनी भारतीय भाषाओं और भारतीय जरूरतों के अनुरूप AI मॉडल विकसित करने पर काम करती है। रक्षा मंत्रालय के साथ समझौते के तहत कंपनी को तीनों सेनाओं और उनसे जुड़ी संयुक्त संस्थाओं के लिए AI आधारित समाधान विकसित करने का अवसर मिलेगा।
इस काम के लिए सरवम ने ‘चाणक्य’ (Chanakya) नाम से एक अलग, फायरवॉल-सुरक्षित डिवीजन बनाया है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र पर केंद्रित होगा। कंपनी के मुताबिक, इसमें उसके अपने AI मॉडल, जिनमें 105 अरब पैरामीटर वाला Sarvam 105B भी शामिल है, इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
यहां तीन क्षेत्रों पर खास ध्यान है।
पहला, सेंसर फ्यूजन। सैन्य अभियानों में रडार, ड्रोन, उपग्रह और दूसरे सेंसर लगातार बड़ी मात्रा में डेटा जुटाते हैं। AI इन अलग-अलग स्रोतों की जानकारी को एक साथ जोड़कर कमांडरों को स्थिति की ज्यादा व्यापक तस्वीर उपलब्ध कराने में मदद कर सकता है।
दूसरा, निर्णय लेने में सहायता। AI विभिन्न सूचनाओं का तेजी से विश्लेषण करके संभावित परिस्थितियों, जोखिमों और विकल्पों को समझने में मदद कर सकता है। इसका उद्देश्य निर्णय लेने की प्रक्रिया को तेज और अधिक सूचनापूर्ण बनाना है। हालांकि, सैन्य अभियानों में अंतिम निर्णय और जवाबदेही मानव अधिकारियों के पास रहना जरूरी है।
तीसरा, साझा AI ढांचा। थलसेना, नौसेना और वायुसेना के लिए अलग-अलग तकनीकी प्रणालियां विकसित करने के बजाय एक साझा ढांचे से काम करने की संभावना तलाशी जा सकती है। इससे सूचनाओं के आदान-प्रदान और संयुक्त अभियानों के समन्वय में मदद मिल सकती है।
‘सॉवरेन AI’ क्यों महत्वपूर्ण है?
रक्षा क्षेत्र में डेटा सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि रणनीतिक संपत्ति है। सैन्य तैनाती, परिचालन गतिविधियों, निगरानी और हथियार प्रणालियों से संबंधित डेटा संवेदनशील हो सकता है। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि ऐसे डेटा को कौन नियंत्रित करता है, उसका प्रसंस्करण कहां होता है और उस तक किसकी पहुंच है।
सरवम के साथ साझेदारी में भारत में विकसित AI और देश के नियंत्रण वाले बुनियादी ढांचे पर जोर इसी जरूरत से जुड़ा है। इसे सॉवरेन AI कहा जाता है—ऐसी AI क्षमता जिसमें महत्वपूर्ण तकनीक, डेटा और परिचालन व्यवस्था पर देश का नियंत्रण बना रहे।
हालांकि, केवल भारतीय कंपनी के मॉडल इस्तेमाल करने से संप्रभुता सुनिश्चित नहीं हो जाती। इसके लिए डेटा सुरक्षा, सर्वर और कंप्यूटिंग व्यवस्था, साइबर सुरक्षा, मॉडल की जांच और आपात स्थिति में प्रणाली को नियंत्रित करने जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना होगा।
यह पहल ऐसे समय आई है जब भारत रक्षा उपकरणों के स्वदेशी निर्माण के साथ रक्षा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर और AI क्षमता को भी देश में विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
क्या सरवम भारत की पालांटिर बन सकती है?
अमेरिकी कंपनी Palantir Technologies की तुलना यहां इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह बड़ी मात्रा में डेटा को जोड़ने, उसका विश्लेषण करने और सैन्य तथा सरकारी एजेंसियों को निर्णय लेने में मदद देने वाले सॉफ्टवेयर बनाती है।
पालांटिर की स्थापना 2003 में हुई थी। उसका Gotham प्लेटफॉर्म रक्षा और खुफिया क्षेत्र में इस्तेमाल होता है। उसका Maven Smart System सैन्य डेटा का विश्लेषण करने और संभावित लक्ष्यों की पहचान में सहायता देने के लिए बनाया गया है। मार्च 2026 में अमेरिकी रक्षा विभाग ने Maven को दीर्घकालिक आधिकारिक कार्यक्रम का दर्जा देने की दिशा में कदम उठाया।
जुलाई 2025 में अमेरिकी सेना ने पालांटिर के साथ दस साल तक के लिए अधिकतम 10 अरब डॉलर की सीमा वाला एंटरप्राइज समझौता किया। इसके तहत पहले से मौजूद 75 अनुबंधों को एक व्यापक व्यवस्था में समेटा गया, ताकि सेना को डेटा एकीकरण, विश्लेषण और AI टूल्स तक पहुंच आसान हो सके। यह 10 अरब डॉलर की अधिकतम संभावित सीमा है, तत्काल भुगतान या पूरी रकम खर्च करने की प्रतिबद्धता नहीं।
सरवम के सामने अभी तुलना का शुरुआती चरण है। उसके पास तीनों सेनाओं के साथ AI समाधान विकसित करने का समझौता है, जबकि पालांटिर वर्षों के अनुभव, तैनात प्रणालियों और बड़े सरकारी अनुबंधों के आधार पर काम करती है।
इसलिए फिलहाल सरवम को भारत की संभावित स्वदेशी रक्षा-AI साझेदार के रूप में देखना ज्यादा सटीक होगा। वह पालांटिर जैसी भूमिका हासिल कर पाएगी या नहीं, यह उसके समाधानों की विश्वसनीयता, सुरक्षा, सैन्य उपयोगिता और बड़े पैमाने पर तैनाती के नतीजों पर निर्भर करेगा।
भारत अकेला नहीं: अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस के उदाहरण
अमेरिका: बड़े पैमाने पर सैन्य AI
पालांटिर के साथ व्यापक एंटरप्राइज समझौते के अलावा, अमेरिकी रक्षा विभाग ने 2025 में OpenAI, Google, Anthropic और xAI जैसी कंपनियों के साथ सैन्य उपयोग के लिए AI क्षमताएं विकसित करने के समझौते किए। अमेरिकी मॉडल में व्यावसायिक AI कंपनियों की तकनीक को रक्षा जरूरतों के अनुरूप ढालने पर जोर है।
ब्रिटेन: सेना के लिए डेटा और AI
सितंबर 2025 में ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय ने पालांटिर के साथ रणनीतिक साझेदारी की घोषणा की। इसका उद्देश्य सैन्य योजना, खुफिया विश्लेषण और निर्णय लेने की क्षमता को बेहतर बनाना तथा ब्रिटेन में रक्षा तकनीक से जुड़े निवेश को बढ़ावा देना है।
फ्रांस: राष्ट्रीय AI कंपनी पर भरोसा
जनवरी 2026 में फ्रांस के सशस्त्र बल मंत्रालय ने Mistral AI के साथ फ्रेमवर्क समझौते की घोषणा की। इसके तहत फ्रांसीसी सैन्य संस्थाएं और संबंधित सरकारी निकाय कंपनी के AI मॉडल, सॉफ्टवेयर और सेवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं। समाधान फ्रांसीसी बुनियादी ढांचे पर चलाने और संवेदनशील डेटा पर देश का नियंत्रण बनाए रखने पर जोर है।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि सैन्य AI अब केवल अनुसंधान का विषय नहीं रहा। देश अपनी सेनाओं के लिए ऐसी कंपनियों के साथ साझेदारी कर रहे हैं, जो डेटा को उपयोगी जानकारी में बदल सकें और सैन्य प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बना सकें।
भारत के लिए अगली चुनौती क्या होगी?
सरवम और HQ IDS के बीच हुआ समझौता अभी एक महत्वपूर्ण शुरुआत है। इसकी वित्तीय शर्तें और अलग-अलग परियोजनाओं का विस्तृत बजट सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है। इसलिए इसे पालांटिर के अरबों डॉलर वाले अनुबंध के बराबर मानना उचित नहीं होगा।
आगे सफलता के तीन प्रमुख पैमाने होंगे। पहला, क्या सरवम के मॉडल वास्तविक सैन्य परिस्थितियों में भरोसेमंद प्रदर्शन कर पाते हैं? दूसरा, क्या वे तीनों सेनाओं की मौजूदा प्रणालियों के साथ सुरक्षित तरीके से काम कर सकते हैं? और तीसरा, क्या यह समझौता परीक्षण से आगे बढ़कर बजट, ठोस परियोजनाओं और नियमित सैन्य इस्तेमाल तक पहुंचता है?
